महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1988, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः प्रक्षीयमाणेषु तेषु तेष्वण्डजोऽपरः । अशङ्कत महाप्राज्ञः स कदाचिद् ददर्श ह ॥ ३५ ॥ वे बेचारे पक्षी असावधान थे और वह अपना काम बनानेके लिये सदा चौकन्ना रहता था। तदनन्तर जब वे अण्डे नष्ट होने लगे, तब एक बुद्धिमान् पक्षीको हंसपर कुछ संदेह हुआ और एक दिन उसने उसकी सारी करतूत देख भी ली ॥ ३५ ॥
ततः स कथयामास दृष्ट्वा हंसस्य किल्बिषम् । तेषां परमदुःखार्तः स पक्षी सर्वपक्षिणाम् ॥ ३६ ॥ हंसका यह पापपूर्ण कृत्य देखकर वह पक्षी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो उठा और उसने अन्य सब पक्षियोंसे सारा हाल कह सुनाया ॥ ३६ ॥
ततः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा पक्षिणस्ते समीपगाः । निजघ्नुस्तं तदा हंसं मिथ्यावृत्तं कुरूद्वह ॥ ३७ ॥ कुरुवंशी भीष्म! तब उन पक्षियोंने निकट जाकर सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया और धर्मात्माका मिथ्या ढोंग बनाये हुए उस हंसको मार डाला ॥ ३७ ॥
ते त्वां हंससधर्माणमपीमे वसुधाधिपाः । निहन्युर्भीष्म संक्रुद्धाः पक्षिणस्तं यथाण्डजम् ॥ ३८ ॥ गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । भीष्म यां तां च ते सम्यक् कथयिष्यामि भारत ॥ ३९ ॥ तुम भी उस हंसके ही समान हो, अतः ये सब नरेश अत्यन्त कुपित होकर आज तुम्हें उसी तरह मार डालेंगे, जैसे उन पक्षियोंने हंसकी हत्या कर डाली थी। भीष्म! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान् एक गाथा गाया करते हैं। भरतकुलभूषण! मैं उसे भी तुमको भलीभाँति सुनाये देता हूँ ॥ ३८-३९ ॥
अन्तरात्मन्यभिहते रौषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मैतत् तव वाचमतीयते ॥ ४० ॥ ‘हंस! तुम्हारी अन्तरात्मा रागादि दोषोंसे दूषित है, तुम्हारा यह अण्डभक्षणरूप अपवित्र कर्म तुम्हारी इस धर्मोपदेशमयी वाणीके सर्वथा विरुद्ध है’ ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते समापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवाक्ये एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवाक्यविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४१ श्लोक हैं)