भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1989

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना

शिशुपाल उवाच

स मे बहुमतो राजा जरासंधो महाबलः । योऽनेन युद्धं नेयेष दासोऽयमिति संयुगे ॥ १ ॥ शिशुपाल बोला—महाबली राजा जरासंध मेरे लिये बड़े ही सम्माननीय थे। वे कृष्णको दास समझकर इसके साथ युद्धमें लड़ना ही नहीं चाहते थे ॥ १ ॥

केशवेन कृतं कर्म जरासंधवधे तदा । भीमसेनार्जुनाभ्यां च कस्तत् साध्विति मन्यते ॥ २ ॥ तब इस केशवने जरासंधके वधके लिये भीमसेन और अर्जुनको साथ लेकर जो नीच कर्म किया है, उसे कौन अच्छा मान सकता है? ॥ २ ॥

अद्वारेण प्रविष्टेन छद्मना ब्रह्मवादिना । दृष्टः प्रभावः कृष्णेन जरासंधस्य भूपतेः ॥ ३ ॥ पहले तो (चैत्यकगिरिके शिखरको तोड़कर) बिना दरवाजेके ही इसने नगरमें प्रवेश किया। उसपर भी छद्मवेष बना लिया और अपनेको ब्राह्मण प्रसिद्ध कर दिया। इस प्रकार इस कृष्णने भूपाल जरासंधका प्रभाव देखा ॥ ३ ॥

येन धर्मात्मनाऽऽत्मानं ब्रह्मण्यमविजानता । नेषितं पाद्यमस्मै तद् दातुमग्रे दुरात्मने ॥ ४ ॥ उस धर्मात्मा जरासंधने जब इस दुरात्माके आगे ब्राह्मण अतिथिके योग्य पाद्य आदि प्रस्तुत किये, तब इसने यह जानकर कि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, उसे ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४ ॥

भुज्यतामिति तेनोक्ताः कृष्णभीमधनंजयाः । जरासंधेन कौरव्य कृष्णेन विकृतं कृतम् ॥ ५ ॥ कौरव्य भीष्म! तत्पश्चात् जब उन्होंने कृष्ण, भीम और अर्जुन तीनोंसे भोजन करनेका आग्रह किया, तब इस कृष्णने ही उसका निषेध किया था ॥ ५ ॥

यद्ययं जगतः कर्ता यथैनं मूर्ख मन्यसे । कस्मान्न ब्राह्मणं सम्यगात्मानमवगच्छति ॥ ६ ॥ मूर्ख भीष्म! यदि यह कृष्ण सम्पूर्ण जगत्‌का कर्ता-धर्ता है, जैसा कि तुम इसे मानते हो तो यह अपनेको भलीभाँति ब्राह्मण भी क्यों नहीं मानता? ॥ ६ ॥