महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1990, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंइदं त्वाश्चर्यभूतं मे यदिमे पाण्डवास्त्वया । अपकृष्टाः सतां मार्गान्मन्यन्ते तच्च साध्विति ॥ ७ ॥ मुझे सबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात तो यह जान पड़ती है कि ये पाण्डव भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्गसे दूर हटा दिये गये हैं; इसलिये ये भी कृष्णके इस कार्यको ठीक समझते हैं ॥ ७ ॥ अथ वा नैतदाश्चर्यं येषां त्वमसि भारत । स्त्रीसधर्मा च वृद्धश्च सर्वार्थानां प्रदर्शकः ॥ ८ ॥ अथवा भारत! स्त्रीके समान धर्मवाले (नपुंसक) और बूढ़े तुम-जैसे लोग जिनके सभी कार्योंमें पथ-प्रदर्शन करते हैं, उनका ऐसा समझना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रूक्षं रूक्षाक्षरं बहु । चुकोप बलिनां श्रेष्ठो भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शिशुपालकी बातें बड़ी रूखी थीं। उनका एक-एक अक्षर कटुतासे भरा हुआ था। उन्हें सुनकर बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रतापी भीमसेन क्रोधाग्निसे जल उठे ॥ ९ ॥ तथा पद्मप्रतीकाशे स्वभावायतविस्तृते । भूयः क्रोधाभिताम्राक्षे रक्ते नेत्रे बभूवतुः ॥ १० ॥ उनकी आँखें स्वभावतः बड़ी-बड़ी और कमलके समान सुन्दर थीं। वे क्रोधके कारण अधिक लाल हो गयीं; मानो उनमें खून उतर आया हो ॥ १० ॥ त्रिशिखां भ्रुकुटीं चास्य ददृशुः सर्वपार्थिवाः । ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥ ११ ॥ सब राजाओंने देखा, उनके ललाटमें तीन रेखाओंसे युक्त भ्रुकुटी तन गयी है; मानो त्रिकूटपर्वतपर त्रिपथगामिनी गंगा लहरा उठी हों ॥ ११ ॥ दन्तान् संदशतस्तस्य कोपाद् ददृशुराननम् । युगान्ते सर्वभूतानि कालस्येव जिघत्सतः ॥ १२ ॥ वे दाँतोंसे दाँत पीसने लगे, रोषकी अधिकतासे उनका मुख ऐसा भयंकर दिखायी देने लगा; मानो प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको निगल जानेकी इच्छावाला विकराल काल ही प्रकट हो गया हो ॥ १२ ॥ उत्पतन्तं तु वेगेन जग्राहैनं मनस्विनम् । भीष्म एव महाबाहुर्महासेनमिवेश्वरः ॥ १३ ॥ वे उछलकर शिशुपालके पास पहुँचना ही चाहते थे कि महाबाहु भीष्मने बड़े वेगसे उठकर उन मनस्वी भीमको पकड़ लिया, मानो महेश्वरने कार्तिकेयको रोक लिया हो ॥ १३ ॥