महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1991, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्य भीमस्य भीष्मेण वार्यमाणस्य भारत । गुरुणा विविधैर्वाक्यैः क्रोधः प्रशममागतः ॥ १४ ॥ भारत! पितामह भीष्मके द्वारा अनेक प्रकारकी बातें कहकर रोके जानेपर भीमसेनका क्रोध शान्त हो गया ॥ १४ ॥
नातिचक्राम भीष्मस्य स हि वाक्यमरिंदमः । समुद्वृत्तो घनापाये वेलामिव महोदधिः ॥ १५ ॥ शत्रुदमन भीम भीष्मजीकी आज्ञाका उल्लंघन उसी प्रकार न कर सके, जैसे वर्षाके अन्तमें उमड़ा हुआ होनेपर भी महासागर अपनी तटभूमिसे आगे नहीं बढ़ता है ॥ १५ ॥
शिशुपालस्तु संक्रुद्धे भीमसेने जनाधिप । नाकम्पत तदा वीरः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ॥ १६ ॥ राजन्! भीमसेनके कुपित होनेपर भी वीर शिशुपाल भयभीत नहीं हुआ। उसे अपने पुरुषार्थका पूरा भरोसा था ॥ १६ ॥
उत्पतन्तं तु वेगेन पुनः पुनररिंदमः । न स तं चिन्तयामास सिंहः क्रुद्धो मृगं यथा ॥ १७ ॥ भीमको बार-बार वेगसे उछलते देख शत्रुदमन शिशुपालने उनकी कुछ भी परवाह नहीं की, जैसे क्रोधमें भरा हुआ सिंह मृगको कुछ भी नहीं समझता ॥ १७ ॥
प्रहसंश्चाब्रवीद् वाक्यं चेदिराजः प्रतापवान् । भीमसेनमभिक्रुद्धं दृष्ट्वा भीमपराक्रमम् ॥ १८ ॥ उस समय भयानक पराक्रमी भीमसेनको कुपित देख प्रतापी चेदिराज हँसते हुए बोला— ॥ १८ ॥
मुञ्चैनं भीष्म पश्यन्तु यावदेनं नराधिपाः । मत्प्रभावविनिर्दग्धं पतङ्गमिव वह्निना ॥ १९ ॥ ‘भीष्म! छोड़ दो इसे, ये सभी राजा देख लें कि यह भीम मेरे प्रभावसे उसी प्रकार दग्ध हो जायगा जैसे फतिंगा आगके पास जाते ही भस्म हो जाता है' ॥ १९ ॥
ततश्चेदिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा तत् कुरुसत्तमः । भीमसेनमुवाचेदं भीष्मो मतिमतां वरः ॥ २० ॥ तब चेदिराजकी वह बात सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुरुकुलतिलक भीष्मने भीमसे यह कहा ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीमक्रोधे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें भीमक्रोधविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥