महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1994, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएष ते नृपते पुत्रः श्रीमान् जातो बलाधिकः । तस्मादस्मान्न भेतव्यमव्यग्रः पाहि वै शिशुम् ॥ ४ ॥ ‘राजन्! तुम्हारा यह पुत्र श्रीसम्पन्न और महाबली है, अतः तुम्हें इससे डरना नहीं चाहिये। तुम शान्तचित्त होकर इस शिशुका पालन करो ॥ ४ ॥ न च वै तस्य मृत्युर्वै न कालः प्रत्युपस्थितः । मृत्युर्हन्तास्य शस्त्रेण स चोत्पन्नो नराधिप ॥ ५ ॥ ‘नरेश्वर! अभी इसकी मृत्यु नहीं आयी है और न काल ही उपस्थित हुआ है। जो इसकी मृत्युका कारण है तथा जो शस्त्रद्वारा इसका वध करेगा, वह अन्यत्र उत्पन्न हो चुका है’ ॥ ५ ॥ संश्रुत्योदाहृतं वाक्यं भूतमन्तर्हितं ततः । पुत्रस्नेहाभिसंतप्ता जननी वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ तदनन्तर यह आकाशवाणी सुनकर उस अन्तर्हित भूतको लक्ष्य करके पुत्रस्नेहसे संतप्त हुई इसकी माता बोली— ॥ ६ ॥ येनेदमीरितं वाक्यं ममैतं तनयं प्रति । प्राञ्जलिस्तं नमस्यामि ब्रवीतु स पुनर्वचः ॥ ७ ॥ याथातथ्येन भगवान् देवो वा यदि वेतरः । श्रोतुमिच्छामि पुत्रस्य कोऽस्य मृत्युर्भविष्यति ॥ ८ ॥ ‘मेरे इस पुत्रके विषयमें जिन्होंने यह बात कही है, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ। चाहे वे कोई देवता हों अथवा और कोई प्राणी? वे फिर मेरे प्रश्नका उत्तर दें। मैं यह यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ कि मेरे इस पुत्रकी मृत्युमें कौन निमित्त बनेगा?’ ॥ ७-८ ॥ अन्तर्भूतं ततो भूतमुवाचेदं पुनर्वचः । यस्योत्सङ्गे गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ ॥ ९ ॥ पतिष्यतः क्षितितले पञ्चशीर्षाविवोरगौ । तृतीयमेतद् बालस्य ललाटस्थं तु लोचनम् ॥ १० ॥ निमज्जिष्यति यं दृष्ट्वा सोऽस्य मृत्युर्भविष्यति । तब पुनः उसी अदृश्य भूतने यह उत्तर दिया—‘जिसके द्वारा गोदमें लिये जानेपर पाँच सिरवाले दो सर्पोंकी भाँति इसकी पाँचों अँगुलियोंसे युक्त दो अधिक भुजाएँ पृथ्वीपर गिर जायँगी और जिसे देखकर इस बालकका ललाटवर्ती तीसरा नेत्र भी ललाटमें लीन हो जायगा, वही इसकी मृत्युमें निमित्त बनेगा’ ॥ ९-१० १/२ ॥ त्र्यक्षं चतुर्भुजं श्रुत्वा तथा च समुदाहृतम् ॥ ११ ॥ पृथिव्यां पार्थिवाः सर्वे अभ्यागच्छन् दिदृक्षवः । चार बाँह और तीन आँखवाले बालकके जन्मका समाचार सुनकर भूमण्डलके सभी नरेश उसे देखनेके लिये आये ॥ ११ १/२ ॥