महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1995, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतान् पूजयित्वा सम्प्राप्तान् यथार्हं स महीपतिः ॥ १२ ॥
एकैकस्य नृपस्याङ्के पुत्रमारोपयत् तदा ।
चेदिराजने अपने घर पधारे हुए उन सभी नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके अपने पुत्रको हर एककी गोदमें रखा ॥ १२ १/२ ॥
एवं राजसहस्राणां पृथक्त्वेन यथाक्रमम् ॥ १३ ॥
शिशुरङ्कसमारूढो न तत् प्राप निदर्शनम् ।
इस प्रकार वह शिशु क्रमशः सहस्रों राजाओंकी गोदमें अलग-अलग रखा गया, परन्तु मृत्युसूचक लक्षण कहीं भी प्राप्त नहीं हुआ ॥ १३ १/२ ॥
एतदेव तु संश्रुत्य द्वारवत्यां महाबलौ ॥ १४ ॥
ततश्चेदिपुरं प्राप्तौ संकर्षणजनार्दनौ ।
यादवौ यादवीं द्रष्टुं स्वसारं तौ पितुस्तदा ॥ १५ ॥
द्वारकामें यही समाचार सुनकर महाबली बलराम और श्रीकृष्ण दोनों यदुवंशी वीर अपनी बुआसे मिलनेके लिये उस समय चेदिराज्यकी राजधानीमें गये ॥ १४-१५ ॥
अभिवाद्य यथान्यायं यथाश्रेष्ठं नृपं च ताम् ।
कुशलानामयं पृष्ट्वा निषण्णौ रामकेशवौ ॥ १६ ॥
वहाँ बलराम और श्रीकृष्णने बड़े-छोटेके क्रमसे सबको यथायोग्य प्रणाम किया एवं राजा दमघोष और अपनी बुआ श्रुतश्रवासे कुशल और आरोग्यविषयक प्रश्न किया। तत्पश्चात् दोनों भाई एक उत्तम आसनपर विराजमान हुए ॥ १६ ॥
साभ्यर्च्य तौ तदा वीरौ प्रीत्या चाभ्यधिकं ततः ।
पुत्रं दामोदरोत्सङ्गे देवी संन्यदधात् स्वयम् ॥ १७ ॥
महादेवी श्रुतश्रवाने बड़े प्रेमसे उन दोनों वीरोंका सत्कार किया और स्वयं ही अपने पुत्रको श्रीकृष्णकी गोदमें डाल दिया ॥ १७ ॥
न्यस्तमात्रस्य तस्याङ्के भुजावभ्यधिकावुभौ ।
पेततुस्तच्च नयनं न्यमज्जत ललाटजम् ॥ १८ ॥
उनकी गोदमें रखते ही बालककी वे दोनों बाँहें गिर गयीं और ललाटवर्ती नेत्र भी वहीं विलीन हो गया ॥ १८ ॥
तद् दृष्ट्वा व्यथिता त्रस्ता वरं कृष्णमयाचत ।
ददस्व मे वरं कृष्ण भयार्त्ताया महाभुज ॥ १९ ॥
यह देखकर बालककी माता भयभीत हो मन-ही-मन व्यथित हो गयी और श्रीकृष्णसे वर माँगती हुई बोली—‘महाबाहु श्रीकृष्ण! मैं भयसे व्याकुल हो रही हूँ। मुझे इस पुत्रकी जीवनरक्षाके लिये कोई वर दो ॥ १९ ॥
त्वं ह्यार्तानां समाश्वासो भीतानामभयप्रदः ।
एवमुक्तस्ततः कृष्णः सोऽब्रवीद् यदुनन्दनः ॥ २० ॥