भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1996

‘क्योंकि तुम संकटमें पड़े हुए प्राणियोंके सबसे बड़े सहारे और भयभीत मनुष्योंको अभय देनेवाले हो।' अपनी बुआके ऐसा कहनेपर यदुनन्दन श्रीकृष्णने कहा— ।। २० ।।
मा भैस्त्वं देवि धर्मज्ञे न मत्तोऽस्ति भयं तव ।
ददामि कं वरं किं च करवाणि पितृष्वसः ।। २१ ।।
‘देवि! धर्मज्ञे! तुम डरो मत। तुम्हें मुझसे कोई भय नहीं है। बुआ! तुम्हीं कहो, मैं तुम्हें कौन-सा वर दूँ? तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध कर दूँ? ।। २१ ।।
शक्यं वा यदि वाशक्यं करिष्यामि वचस्तव ।
एवमुक्ता ततः कृष्णमब्रवीद् यदुनन्दनम् ।। २२ ।।
‘सम्भव हो या असम्भव, तुम्हारे वचनका मैं अवश्य पालन करूँगा।' इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर श्रुतश्रवा यदुनन्दन श्रीकृष्णसे बोली— ।। २२ ।।
शिशुपालस्यापराधान् क्षमेथास्त्वं महाबल ।
मत्कृते यदुशार्दूल विद्धयेनं मे वरं प्रभो ।। २३ ।।
‘महाबली यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण! तुम मेरे लिये शिशुपालके सब अपराध क्षमा कर देना। प्रभो! यही मेरा मनोवांछित वर समझो' ।। २३ ।।

श्रीकृष्ण उवाच
अपराधशतं क्षाम्यं मया ह्यस्य पितृष्वसः ।
पुत्रस्य ते वधार्हस्य मा त्वं शोके मनः कृथाः ।। २४ ।।
श्रीकृष्णने कहा— बुआ! तुम्हारा पुत्र अपने दोषोंके कारण मेरे द्वारा यदि वधके योग्य होगा, तो भी मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूँगा। तुम अपने मनमें शोक न करो ।। २४ ।।

भीष्म उवाच
एवमेष नृपः पापः शिशुपालः सुमन्दधीः ।
त्वां समाह्वयते वीर गोविन्दवरदर्पितः ।। २५ ।।
भीष्मजी कहते हैं— वीरवर भीमसेन! इस प्रकार यह मन्दबुद्धि पापी राजा शिशुपाल भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए वरदानसे उन्मत्त होकर तुम्हें युद्धके लिये ललकार रहा है ।। २५ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवृत्तान्तकथने
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें
शिशुपालवृत्तान्तवर्णनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४३ ।।