महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2005, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसात्वतानां नृशंसात्मा न हितोऽनपकारिणाम् ॥ ६ ॥ ‘भूमिपालो! यह है तो यदुकुलकी कन्याका पुत्र, परंतु हमलोगोंसे अत्यन्त शत्रुता रखता है। यद्यपि यादवोंने इसका कभी कोई अपराध नहीं किया है, तो भी यह क्रूरात्मा उनके अहितमें ही लगा रहता है ॥ ६ ॥
प्राग्ज्योतिषपुरं यातानस्मान् ज्ञात्वा नृशंसकृत् । अदहद् द्वारकामेष स्वस्रीयः सन् नराधिपाः ॥ ७ ॥ ‘नरेश्वरो! हम प्राग्ज्योतिषपुरमें गये थे, यह बात जब इसे मालूम हुई, तब इस क्रूरकर्माने मेरे पिताजीका भानजा होकर भी द्वारकामें आग लगवा दी ॥ ७ ॥
क्रीडतो भोजराजस्य एष रैवतके गिरौ । हत्वा बद्ध्वा च तान् सर्वानुपायात् स्वपुरं पुरा ॥ ८ ॥ ‘एक बार भोजराज (उग्रसेन) रैवतक पर्वतपर क्रीड़ा कर रहे थे। उस समय यह वहीं जा पहुँचा और उनके सेवकोंको मारकर तथा शेष व्यक्तियोंको कैद करके उन सबको अपने नगरमें ले गया ॥ ८ ॥
अश्वमेधे हयं मेध्यमुत्सृष्टं रक्षिभिर्वृतम् । पितुर्मे यज्ञविघ्नार्थमहरत् पापनिश्चयः ॥ ९ ॥ ‘मेरे पिताजी अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ले चुके थे। उसमें रक्षकोंसे घिरा हुआ पवित्र अश्व छोड़ा गया था। इस पापपूर्ण विचारवाले दुष्टात्माने पिताजीके यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये उस अश्वको भी चुरा लिया था ॥ ९ ॥
सौवीरान् प्रति यातां च बभ्रोरेष तपस्विनः । भार्यामभ्यहरन्मोहादकामां तामितो गताम् ॥ १० ॥ ‘इतना ही नहीं, इसने तपस्वी बभ्रुकी पत्नीका, जो यहाँसे द्वारका जाते समय सौवीरदेश पहुँची थी और इसके प्रति जिसके मनमें तनिक भी अनुराग नहीं था, मोहवश अपहरण कर लिया ॥ १० ॥
एष मायाप्रतिच्छन्नः करूषार्थे तपस्विनीम् । जहार भद्रां वैशालीं मातुलस्य नृशंसकृत् ॥ ११ ॥ ‘इस क्रूरकर्माने मायासे अपने असली रूपको छिपाकर करूषराजकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेवाली अपने मामा विशालानरेशकी कन्या भद्राका (करूषराजके ही वेषमें उपस्थित हो उसे धोखा देकर) अपहरण कर लिया ॥ ११ ॥
पितृष्वसुः कृते दुःखं सुमहन्मर्षयाम्यहम् । दिष्ट्या हीदं सर्वराज्ञां संनिधावद्य वर्तते ॥ १२ ॥ ‘मैं अपनी बुआके संतोषके लिये ही इसके बड़े दुःखद अपराधोंको सहन कर रहा हूँ; सौभाग्यकी बात है कि आज यह समस्त राजाओंके समीप मौजूद है ॥ १२ ॥
पश्यन्ति हि भवन्तोऽद्य मय्यतीव व्यतिक्रमम् ।