महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2006, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतानि तु परोक्षं मे यानि तानि निबोधत ॥ १३ ॥ 'आप सब लोग देख ही रहे हैं कि इस समय यह मेरे प्रति कैसा अभद्र बर्ताव कर रहा है। इसने परोक्षमें मेरे प्रति जो अपराध किये हैं, उन्हें भी आप अच्छी तरह जान लें ॥ १३ ॥ इमं त्वस्य न शक्ष्यामि क्षन्तुमद्य व्यतिक्रमम् । अवलेपाद् वधार्हस्य समग्रे राजमण्डले ॥ १४ ॥ 'परंतु आज इसने अहंकारवश समस्त राजाओंके सामने मेरे साथ जो दुर्व्यवहार किया है, उसे मैं कभी क्षमा न कर सकूँगा ॥ १४ ॥ रुक्मिण्यामस्य मूढस्य प्रार्थनाऽऽसीन्मुमूर्षतः । न च तां प्राप्तवान् मूढः शूद्रो वेदश्रुतीमिव ॥ १५ ॥ 'अब यह मरना ही चाहता है। इस मूर्खने पहले रुक्मिणीके लिये उसके बन्धु-बान्धवोंसे याचना की थी, परंतु जैसे शूद्र वेदकी ऋचाओंको श्रवण नहीं कर सकता, उसी प्रकार इस अज्ञानीको वह प्राप्त न हो सकी' ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमादि ततः सर्वे सहितास्ते नराधिपाः । वासुदेववचः श्रुत्वा चेदिराजं व्यगर्हयन् ॥ १६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी ये सब बातें सुनकर उन समस्त राजाओंने एक स्वरसे चेदिराज शिशुपालको धिक्कारा और उसकी निन्दा की ॥ १६ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शिशुपालः प्रतापवान् । जहास स्वनवद्ध्रासं वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १७ ॥ श्रीकृष्णका उपर्युक्त वचन सुनकर प्रतापी शिशुपाल खिलखिलाकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला— ॥ १७ ॥ मत्पूर्वां रुक्मिणीं कृष्ण संसत्सु परिकीर्तयन् । विशेषतः पार्थिवेषु व्रीडां न कुरुषे कथम् ॥ १८ ॥ 'कृष्ण! तुम इस भरी सभामें, विशेषतः सभी राजाओंके सामने रुक्मिणीको मेरी पहलेकी मनोनीत पत्नी बताते हुए लज्जाका अनुभव कैसे नहीं करते? ॥ १८ ॥ मन्यमानो हि कः सत्सु पुरुषः परिकीर्तयेत् । अन्यपूर्वां स्त्रियं जातु त्वदन्यो मधुसूदन ॥ १९ ॥ 'मधुसूदन! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनी स्त्रीको पहले दूसरेकी वाग्दत्ता पत्नी स्वीकार करते हुए सत्पुरुषोंकी सभामें इसका वर्णन करेगा? ॥ १९ ॥ क्षम वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण मम क्षम ।