भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 2007, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2007

क्रुद्धाद् वापि प्रसन्नाद् वा किं मे त्वत्तो भविष्यति ॥ २० ॥ ‘कृष्ण! यदि अपनी बुआकी बातोंपर तुम्हें श्रद्धा हो तो मेरे अपराध क्षमा करो या न भी करो, तुम्हारे कुपित होने या प्रसन्न होनेसे मेरा क्या बनने-बिगड़ने-वाला है?’ ॥ २० ॥ तथा ब्रुवत एवास्य भगवान् मधुसूदनः । मनसाचिन्तयच्चक्रं दैत्यवर्गनिषूदनम् ॥ २१ ॥ शिशुपाल इस तरहकी बातें कर ही रहा था कि भगवान् मधुसूदनने मन-ही-मन दैत्यवर्गविनाशक सुदर्शन चक्रका स्मरण किया ॥ २१ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु चक्रे हस्तगते सति । उवाच भगवानुच्चैर्वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ २२ ॥ चिन्तन करते ही तत्काल चक्र हाथमें आ गया। तब बोलनेमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णने उच्च स्वरसे यह वचन कहा— ॥ २२ ॥ शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत् क्षमितं मया । अपराधशतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने ॥ २३ ॥ दत्तं मया याचितं च तानि पूर्णानि पार्थिवाः । अधुना वधयिष्यामि पश्यतां वो महीक्षिताम् ॥ २४ ॥ ‘यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते-देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ’ ॥ २३-२४ ॥ एवमुक्त्वा यदुश्रेष्ठश्चेदिराजस्य तत्क्षणात् । व्यपाहरच्छिरः क्रुद्धश्चक्रेणामित्रकर्षणः ॥ २५ ॥ ऐसा कहकर कुपित हुए शत्रुहन्ता यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णने चक्रसे उसी क्षण चेदिराज शिशुपालका सिर उड़ा दिया ॥ २५ ॥

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व · पृष्ठ 2007, कुल 2256 में से · BharatKosha