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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

क्रुद्धाद् वापि प्रसन्नाद् वा किं मे त्वत्तो भविष्यति ॥ २० ॥ ‘कृष्ण! यदि अपनी बुआकी बातोंपर तुम्हें श्रद्धा हो तो मेरे अपराध क्षमा करो या न भी करो, तुम्हारे कुपित होने या प्रसन्न होनेसे मेरा क्या बनने-बिगड़ने-वाला है?’ ॥ २० ॥ तथा ब्रुवत एवास्य भगवान् मधुसूदनः । मनसाचिन्तयच्चक्रं दैत्यवर्गनिषूदनम् ॥ २१ ॥ शिशुपाल इस तरहकी बातें कर ही रहा था कि भगवान् मधुसूदनने मन-ही-मन दैत्यवर्गविनाशक सुदर्शन चक्रका स्मरण किया ॥ २१ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु चक्रे हस्तगते सति । उवाच भगवानुच्चैर्वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ २२ ॥ चिन्तन करते ही तत्काल चक्र हाथमें आ गया। तब बोलनेमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णने उच्च स्वरसे यह वचन कहा— ॥ २२ ॥ शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत् क्षमितं मया । अपराधशतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने ॥ २३ ॥ दत्तं मया याचितं च तानि पूर्णानि पार्थिवाः । अधुना वधयिष्यामि पश्यतां वो महीक्षिताम् ॥ २४ ॥ ‘यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते-देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ’ ॥ २३-२४ ॥ एवमुक्त्वा यदुश्रेष्ठश्चेदिराजस्य तत्क्षणात् । व्यपाहरच्छिरः क्रुद्धश्चक्रेणामित्रकर्षणः ॥ २५ ॥ ऐसा कहकर कुपित हुए शत्रुहन्ता यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णने चक्रसे उसी क्षण चेदिराज शिशुपालका सिर उड़ा दिया ॥ २५ ॥

स पपात महाबाहुर्वज्राहत इवाचलः ।
ततश्चैदिपतेर्देहात् तेजोऽग्र्यं ददृशुर्नृपाः ॥ २६ ॥
उत्पतन्तं महाराज गगनादिव भास्करम् ।
ततः कमलपत्राक्षं कृष्णं लोकनमस्कृतम् ।
ववन्दे तत् तदा तेजो विवेश च नराधिप ॥ २७ ॥
महाबाहु शिशुपाल वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति धराशायी हो गया। महाराज! तदनन्तर सभी नरेशोंने देखा; चेदिराजके शरीरसे एक उत्कृष्ट तेज निकलकर ऊपर उठ रहा है; मानो आकाशसे सूर्य उदित हुआ हो। नरेश्वर! उस तेजने विश्ववन्दित कमलदललोचन श्रीकृष्णको नमस्कार किया और उसी समय उनके भीतर प्रविष्ट हो गया ॥ २६-२७ ॥

तदद्भुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षितः ।
यद् विवेश महाबाहुं तत् तेजः पुरुषोत्तमम् ॥ २८ ॥
यह देखकर सभी राजाओंको बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसका तेज महाबाहु पुरुषोत्तममें प्रविष्ट हो गया ॥ २८ ॥

अनभ्रे प्रववर्ष द्यौः पपात ज्वलिताशनिः ।
कृष्णेन निहते चैद्ये चचाल च वसुंधरा ॥ २९ ॥
श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालके मारे जानेपर सारी पृथ्वी हिलने लगी, बिना बादलोंके ही आकाशसे वर्षा होने लगी और प्रज्वलित बिजली टूट-टूटकर गिरने लगी ॥ २९ ॥

ततः केचिन्महीपाला नाब्रुवंस्तत्र किंचन ।
अतीतवाक्पथे काले प्रेक्षमाणा जनार्दनम् ॥ ३० ॥

वह समय वाणीकी पहुँचके परे था। उसका वर्णन करना कठिन था। उस समय कोई भूपाल वहाँ इस विषयमें कुछ भी न बोल सके—मौन रह गये। वे बार-बार केवल श्रीकृष्णके मुखकी ओर देखते रहे ॥ ३० ॥

हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन्नमर्षिताः ।
अपरे दशनैरोष्ठानदशन् क्रोधमूर्च्छिताः ॥ ३१ ॥
कुछ अन्य नरेश अत्यन्त अमर्षमें भरकर हाथोंसे हाथ मसलने लगे तथा दूसरे लोग क्रोधसे मूर्च्छित होकर दाँतोंसे ओठ चबाने लगे ॥ ३१ ॥

रहश्च केचिद् वार्ष्णेयं प्रशशंसुर्नराधिपाः ।
केचिदेव सुसंरब्धा मध्यस्थास्त्वपरेऽभवन् ॥ ३२ ॥
कुछ राजा एकान्तमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रशंसा करने लगे। कुछ ही भूपाल अत्यन्त क्रोधके वशीभूत हो रहे थे तथा कुछ लोग तटस्थ थे ॥ ३२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2010)

⬅ विषय-सूची (TOC)

शिशुपालके वधके लिये भगवान्‌का हाथमें चक्र ग्रहण करना

दुर्योधनका स्थलके भ्रमसे जलमें गिरना

प्रहृष्टाः केशवं जग्मुः संस्तुवन्तो महर्षयः ।
ब्राह्मणाश्च महात्मानः पार्थिवाश्च महाबलाः ॥ ३३ ॥
शशंसुर्निर्वृताः सर्वे दृष्ट्वा कृष्णस्य विक्रमम् ।
बड़े-बड़े ऋषि, महात्मा ब्राह्मणों तथा महाबली भूमिपालोंने भगवान् श्रीकृष्णका वह पराक्रम देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो उनकी स्तुति करते हुए उन्हींकी शरण ली ॥ ३३ ½ ॥
पाण्डवस्त्वब्रवीद् भ्रातॄन् सत्कारेण महीपतिम् ॥ ३४ ॥
दमघोषात्मजं वीरं संस्कारयत मा चिरम् ।
तथा च कृतवन्तस्ते भ्रातुर्वै शासनं तदा ॥ ३५ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने भाइयोंसे कहा—'दमघोष-पुत्र वीर राजा शिशुपालका अन्त्येष्टि संस्कार बड़े सत्कारके साथ करो, इसमें देर न लगाओ।' पाण्डवोंने भाईकी उस आज्ञाका यथार्थरूपसे पालन किया ॥ ३४-३५ ॥
चेदीनामाधिपत्ये च पुत्रमस्य महीपतेः ।
अभ्यषिञ्चत् तदा पार्थः सह तैर्वसुधाधिपैः ॥ ३६ ॥
उस समय कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ आये हुए सभी भूमिपालोंके साथ चेदिदेशके राजसिंहासनपर शिशुपालके पुत्रको अभिषिक्त कर दिया ॥ ३६ ॥
ततः स कुरुराजस्य क्रतुः सर्वसमृद्धिमान् ।
यूनां प्रीतिकरो राजन् स बभौ विपुलौजसः ॥ ३७ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी कुरुराज युधिष्ठिरका वह सम्पूर्ण समृद्धियोंसे भरा-पूरा राजसूययज्ञ तरुण राजाओंकी प्रसन्नताको बढ़ाता हुआ अनुपम शोभा पाने लगा ॥ ३७ ॥
शान्तविघ्नः सुखारम्भः प्रभूतधनधान्यवान् ।
अन्नवान् बहुभक्ष्यश्च केशवेन सुरक्षितः ॥ ३८ ॥
उस यज्ञका विघ्न शान्त हो गया था; अतः उसका सुखपूर्वक आरम्भ हुआ। उसमें अपरिमित धन-धान्यका संग्रह एवं सदुपयोग किया गया था। भगवान् श्रीकृष्णसे सुरक्षित होनेके कारण उस यज्ञमें कभी अन्नकी कमी नहीं होने पायी। उसमें सदा पर्याप्तमात्रामें भक्ष्य-भोज्य आदिकी सामग्री प्रस्तुत रहती थी ॥ ३८ ॥
(ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् ।
उपेन्द्रबुद्ध्या विहितं सहदेवेन भारत ॥
भरतनन्दन! राजाओंने सहदेवके द्वारा विष्णु-बुद्धिसे भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले उस यज्ञका उत्तम विधि-विधान देखा।
ददृशुस्तोरणान्यत्र हेमतालमयानि च ।
दीप्तभास्करतुल्यानि प्रदीप्तानीव तेजसा ।
स यज्ञस्तोरणैस्तैश्च ग्रहैर्द्यौरिव सम्बभौ ॥

उस यज्ञमण्डपमें सुवर्णमय तालके बने हुए फाटक दिखायी देते थे, जो अपनी प्रभासे तेजस्वी सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे। उन तेजस्वी द्वारोंसे वह विशाल यज्ञमण्डप ग्रहोंसे आकाशकी भाँति प्रकाशित हो रहा था।

शय्यासनविहारांश्च सुबहून् वित्तसम्भृतान् । घटान् पात्रीः कटाहानि कलशानि समन्ततः । न ते किञ्चिदसौवर्णमपश्यंस्तत्र पार्थिवाः ॥

वहाँ शय्या, आसन और क्रीडाभवनोंकी संख्या बहुत थी। उनके निर्माणमें प्रचुर धन लगा था। चारों ओर घड़े, भाँति भाँतिके पात्र, कड़ाहे और कलश आदि सुवर्णनिर्मित सामान दृष्टिगोचर हो रहे थे। वहाँ राजाओंने कोई ऐसी वस्तु नहीं देखी, जो सोनेकी बनी हुई न हो।

ओदनानां विकाराणि स्वादूनि विविधानि च । सुबहूनि च भक्ष्याणि पेयानि मधुराणि च । ददुर्द्विजानां सततं राजप्रेष्या महाध्वरे ॥

उस महान् यज्ञमें राजसेवकगण ब्राह्मणोंके आगे सदा नाना प्रकारके स्वादिष्ट भात तथा चावलकी बनी हुई बहुत-सी दूसरी भोज्य वस्तुएँ परोसते रहते थे। वे उनके लिये मधुर पेय पदार्थ भी अर्पण करते थे।

पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां भुञ्जतां तदा । स्थापिता तत्र संज्ञाभूच्छङ्खोऽध्मायत नित्यशः ॥

भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंकी संख्या जब एक लाख पूरी हो जाती थी, तब वहाँ प्रतिदिन शंख बजाया जाता था।

मुहुर्मुहुः प्रणादस्तु तस्य शङ्खस्य भारत । उत्तमं शङ्खशब्दं तं श्रुत्वा विस्मयमागताः ॥

जनमेजय! दिनमें कई बार इस तरहकी शंख-ध्वनि होती थी। वह उत्तम शंखनाद सुनकर लोगोंको बड़ा विस्मय होता था।

एवं प्रवृत्ते यज्ञे तु तुष्टपुष्टजनायुते । अन्नस्य बहवो राजन्नुत्सेधाः पर्वतोपमाः । दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषां च हृदाञ्जनाः ॥

इस प्रकार सहस्रों हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञका कार्य चलने लगा। राजन्! उसमें अन्नके बहुत-से ऊँचे ढेर लगाये गये थे, जो पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। लोगोंने देखा, वहाँ दहीकी नहरें बह रही थीं तथा घीके कितने ही कुण्ड भरे हुए थे।

जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायूतः । राजन्नदृश्यतैकस्थो राजंस्तस्मिन् महाक्रतौ ॥

राजन्! महाराज युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें नाना जनपदोंसे युक्त सारा जम्बूद्वीप ही एकत्र हुआ-सा दिखायी देता था। राजानः स्रग्विणस्तत्र सुमृष्टमणिकुण्डलाः। विविधान्यन्नपानानि लेह्यानि विविधानि च। तेषां नृपोपभोग्यानि ब्राह्मणेभ्यो ददुः स्म ते॥ वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल तथा हार धारण किये नरेश ब्राह्मणोंको राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य नाना प्रकारके अन्न-पान और भाँति-भाँतिकी चटनी परोसते थे। एतानि सततं भुक्त्वा तस्मिन् यज्ञे द्विजातयः। परां प्रीतिं ययुः सर्वे मोदमानास्तदा भृशम्॥ उस यज्ञमें निरन्तर उपर्युक्त पदार्थ भोजन करके सब ब्राह्मण आनन्दमग्न हो बड़ी तृप्ति और प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एवं समुदितं सर्वं बहुगोधनधान्यवत्। यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययुः॥ इस प्रकार बहुत-सी गायों तथा धन-धान्यसे सम्पन्न उस समृद्धिशाली यज्ञमण्डपको देखकर सब राजाओंको बड़ा आश्चर्य होता था। ऋत्विजश्च यथाशास्त्रं राजसूयं महाक्रतुम्। पाण्डवस्य यथाकालं जुहुवुः सर्वयाजकाः॥ ऋत्विज्लोग शास्त्रीय विधिके अनुसार राजा युधिष्ठिरके उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते थे और समस्त याजक ठीक समयपर अग्निमें आहुतियाँ देते थे। व्यासधौम्यादयः सर्वे विधिवत् षोडशर्त्विजः। स्वस्वकर्माणि चक्रुस्ते पाण्डवस्य महाक्रतौ॥ व्यास और धौम्य आदि जो सोलह ऋत्विज् थे, वे युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें विधिपूर्वक अपने-अपने निश्चित कार्योंका सम्पादन करते थे। नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यो नाबहुश्रुतः। नाव्रतो नानुपाध्यायो नपापो नाक्षमो द्विजः॥ उस यज्ञमण्डपमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो वेदके छहों अंगोंका ज्ञाता, बहुश्रुत, व्रतशील, अध्यापक, पापरहित, क्षमाशील एवं सामर्थ्यशील न हो। न तत्र कृपणः कश्चिद् दरिद्रो न बभूव ह। क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानुषः॥ उस यज्ञमें कोई भी मनुष्य दीन, दरिद्र, दुःखी, भूखा-प्यासा अथवा मूढ़ नहीं था। भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास सर्वदा। सहदेवो महातेजाः सततं राजशासनात्॥

महातेजस्वी सहदेव महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको सदा भोजन दिलाया करते थे।

सस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकर्माणि याजकाः । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रार्थचक्षुषः ॥ शास्त्रोक्त अर्थपर दृष्टि रखनेवाले यज्ञकुशल याजक प्रतिदिन सब कार्योंको विधिवत् सम्पन्न करते थे।

ब्राह्मणा वेदशास्त्रज्ञाः कथाश्चक्रुश्च सर्वदा । रेमिरे च कथान्ते तु सर्वे तस्मिन् महाक्रतौ ॥ वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण वहाँ सदा कथा-प्रवचन किया करते थे। उस महायज्ञमें सब लोग कथाके अन्तमें बड़े सुखका अनुभव करते थे।

देवैरन्यैश्च यक्षैश्च उरगैर्दिव्यमानुषैः । विद्याधरगणैः कीर्णः पाण्डवस्य महात्मनः ॥ स राजसूयः शुशुभे धर्मराजस्य धीमतः । देवता, असुर, यक्ष, नाग, दिव्य मानव तथा विद्याधरगणोंसे भरा हुआ बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन महात्मा धर्मराजका वह राजसूययज्ञ बड़ी शोभा पाता था।

गन्धर्वगणसंकीर्णः शोभितोऽप्सरसां गणैः ॥ देवैर्मुनिगणैर्यक्षैर्देवलोक इवापरः । स किम्पुरुषगीतैश्च किन्नरैरुपशोभितः ॥ वह यज्ञमण्डप गन्धर्वों, अप्सरा-समूहों, देवताओं, मुनिगणों तथा यक्षोंसे सुशोभित हो दूसरे देवलोकके समान जान पड़ता था। किम्पुरुषोंके गीत तथा किन्नरगण उस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे थे।

नारदश्च जगौ तत्र तुम्बुरुश्च महाद्युतिः । विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदाः । रमयन्ति स्म तान् सर्वान् यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ॥ नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा दूसरे गीतकुशल गन्धर्व वहाँ गीत गाकर यज्ञकार्योंके बीच-बीचमें अवकाश मिलनेपर सब लोगोंका मनोरंजन करते थे।

इतिहासपुराणानि आख्यानानि च सर्वशः । ऊचुर्वै शब्दशास्त्रज्ञा नित्यं कर्मान्तरेष्वथ ॥ यज्ञसम्बन्धी कर्मोंके बीचमें अवसर मिलनेपर व्याकरणशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् पुरुष इतिहास, पुराण तथा सब प्रकारके उपाख्यान सुनाया करते थे।

भेर्यश्च मुरजाश्चैव मड्डुका गोमुखाश्च ये । शृङ्गवंशाम्बुजाश्चैव श्रूयन्ते स्म सहस्रशः ॥

वहाँ सहस्रों भेरी, मृदंग, मड्डुक, गोमुख, शृंग, वंशी और शंखोंके शब्द सुनायी पड़ते थे।

लोकेऽस्मिन् सर्वविप्राश्च वैश्याः शूद्राश्च सर्वशः ।
सर्वे म्लेच्छाः सर्ववर्णाः सादिमध्यान्तजास्तथा ॥
नानादेशसमुद्भूतैर्नानाजातिभिरागतैः ।
पर्याप्त इव लोकोऽयं युधिष्ठिरनिवेशने ॥
इस जगत्में रहनेवाले समस्त ब्राह्मण, (क्षत्रिय,) वैश्य, शूद्र, सब प्रकारके म्लेच्छ तथा अग्रज, मध्यज और अन्त्यज आदि सभी वर्णोंके लोग उस यज्ञमें उपस्थित हुए थे। अनेक देशोंमें उत्पन्न विभिन्न जातिके लोगोंके शुभागमनसे युधिष्ठिरके उस राजभवनमें ऐसा जान पड़ता था कि यह समस्त लोक वहाँ उपस्थित हो गया है।

भीष्मद्रोणादयः सर्वे कुरवः ससुयोधनाः ।
वृष्णयश्च समग्राश्च पञ्चालाश्चापि सर्वशः ।
यथार्हं सर्वकर्माणि चक्रुर्दासा इव क्रतौ ॥
उस राजसूययज्ञमें भीष्म, द्रोण और दुर्योधन आदि समस्त कौरव, सारे वृष्णिवंशी तथा सम्पूर्ण पांचाल भी सेवकोंकी भाँति यथायोग्य सभी कार्य अपने हाथों करते थे।

एवं प्रवृत्तो यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः ।
शुशुभे च महाबाहो सोमस्येव क्रतुर्यथा ॥
महाबाहु जनमेजय! इस प्रकार बुद्धिमान् युधिष्ठिरका वह यज्ञ चन्द्रमाके राजसूययज्ञकी भाँति शोभा पाता था।

वस्त्राणि कम्बलांश्चैव प्रावारांश्चैव सर्वदा ।
निष्कहेमजभाण्डानि भूषणानि च सर्वशः ।
प्रददौ तत्र सततं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
धर्मराज युधिष्ठिर उस यज्ञमें हर समय वस्त्र, कम्बल, चादर, स्वर्णपदक, सोनेके बर्तन और सब प्रकारके आभूषणोंका दान करते रहते थे।

यानि तत्र महीपेभ्यो लब्धं वा धनमुत्तमम् ।
तानि रत्नानि सर्वाणि विप्राणां प्रददौ तदा ॥
वहाँ राजाओंसे जो-जो रत्न अथवा उत्तम धन भेंटके रूपमें प्राप्त हुए, उन सबको युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंकी सेवामें समर्पित कर दिया।

कोटीसहस्रं प्रददौ ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।
उन्होंने महात्मा ब्राह्मणोंको दक्षिणाके रूपमें सहस्र कोटि स्वर्णमुद्राएँ प्रदान कीं।

न करिष्यति तं लोके कश्चिदन्यो महीपतिः ॥
याजकाः सर्वकामैश्च सततं ततृपुर्धनैः ।

उन्होंने संसारमें वह कार्य किया जिसे दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुएँ और प्रचुर धन पाकर सदाके लिये तृप्त हो गये।

व्यासं धौम्यं च प्रयतो नारदं च महामतिम् ।।
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ।
याज्ञवल्क्यं कठं चैव कलापं च महौजसम् ।
सर्वांश्च विप्रप्रवरान् पूजयामास सत्कृतान् ।।
फिर राजा युधिष्ठिरने व्यास, धौम्य, महामति नारद, सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, याज्ञवल्क्य, कठ तथा महातेजस्वी कलाप—इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूर्ण मनोयोगके साथ सत्कार एवं पूजन किया।

युधिष्ठिर उवाच

युष्मत्प्रभावात् प्राप्तोऽयं राजसूयो महाक्रतुः ।
जनार्दनप्रभावाच्च सम्पूर्णो मे मनोरथः ।।
युधिष्ठिर उनसे बोले— महर्षियो! आपलोगोंके प्रभावसे यह राजसूय महायज्ञ सांगोपांग सम्पन्न हुआ। भगवान् श्रीकृष्णके प्रतापसे मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया।

वैशम्पायन उवाच

अथ यज्ञं समाप्यान्ते पूजयामास माधवम् ।
बलदेवं च देवेशं भीष्माद्यांश्च कुरुत्तमान् ।।)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार यज्ञसमाप्तिके समय राजा युधिष्ठिरने अन्तमें लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण, देवेश्वर बलदेव तथा कुरुश्रेष्ठ भीष्म आदिका पूजन किया।

समापयामास च तं राजसूयं महाक्रतुम् ।
तं तु यज्ञं महाबाहुरासमाप्तेर्जनार्दनः ।
ररक्ष भगवाञ्छौरिः शार्ङ्गचक्रगदाधरः ।। ३९ ।।
तदनन्तर उस राजसूय महायज्ञको विधिपूर्वक समाप्त किया। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने आरम्भसे लेकर अन्ततक उस यज्ञकी रक्षा की ।। ३९ ।।

ततस्त्ववभृथस्नातं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
समस्तं पार्थिवं क्षत्रमुपगम्येदमब्रवीत् ।। ४० ।।
तदनन्तर धर्मात्मा युधिष्ठिर जब अवभृथस्नान कर चुके, उस समय समस्त क्षत्रियराजाओंका समुदाय उनके पास जाकर बोला— ।। ४० ।।

दिष्ट्या वर्धसि धर्मज्ञ साम्राज्यं प्राप्तवानसि ।

आजमीढाजमीढानां यशः संवर्धितं त्वया ॥ ४१ ॥ कर्मणैतेन राजेन्द्र धर्मश्च सुमहान् कृतः । आपृच्छामो नरव्याघ्र सर्वकामैः सुपूजिताः ॥ ४२ ॥ ‘धर्मज्ञ! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने सम्राटका पद प्राप्त कर लिया। अजमीढकुलनन्दन राजाधिराज! आपने इस कर्मद्वारा अजमीढवंशी क्षत्रियोंके यशका विस्तार तो किया ही है, महान् धर्मका भी सम्पादन किया है। नरव्याघ्र! आपने हमारे लिये सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थ सुलभ करके हमारा बड़ा सम्मान किया है। अब हम आपसे जानेकी अनुमति लेना चाहते हैं ॥ ४१-४२ ॥ स्वराष्ट्राणि गमिष्यामस्तदनुज्ञातुमर्हसि । श्रुत्वा तु वचनं राज्ञां धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४३ ॥ यथार्हं पूज्य नृपतीन् भ्रातॄन् सर्वानुवाच ह । राजानः सर्व एवैते प्रीत्यास्मान् समुपागताः ॥ ४४ ॥ प्रस्थिताः स्वानि राष्ट्राणि मामापृच्छ्य परंतपाः । अनुव्रजत भद्रं वो विषयान्तं नृपोत्तमान् ॥ ४५ ॥ ‘हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।' राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा—‘ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ' ॥ ४३—४५ ॥ भ्रातुर्वचनमाज्ञाय पाण्डवा धर्मचारिणः । यथार्हं नृपतीन् सर्वानैकैकं समनुव्रजन् ॥ ४६ ॥ भाईकी बात मानकर वे धर्मात्मा पाण्डव एक-एक करके यथायोग्य सभी राजाओंके साथ गये ॥ ४६ ॥ विराटमन्वयात् तूर्णं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । धनंजयो यज्ञसेनं महात्मानं महारथम् ॥ ४७ ॥ प्रतापी धृष्टद्युम्न तुरंत ही राजा विराटके साथ गया। धनंजयने महारथी महात्मा द्रुपदका अनुसरण किया ॥ ४७ ॥ भीष्मं च धृतराष्ट्रं च भीमसेनो महाबलः । द्रोणं च ससुतं वीरं सहदेवो युधाम्पतिः ॥ ४८ ॥ महाबली भीमसेन भीष्म और धृतराष्ट्रके साथ गये। योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने द्रोणाचार्य तथा उनके वीर पुत्र अश्वत्थामाको पहुँचाया ॥ ४८ ॥ नकुलः सुबलं राजन् सहपुत्रं समन्वयात् । द्रौपदेयाः ससौभद्राः पर्वतीयान् महारथान् ॥ ४९ ॥

राजन्! सुबल और उनके पुत्रके साथ नकुल गये। द्रौपदीके पाँच पुत्रों तथा अभिमन्युने पर्वतीय महारथियोंको अपने राज्यकी सीमातक पहुँचाया ।। ४९ ।। अन्वगच्छंस्तथैवान्यान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभाः । एवं सुपूजिताः सर्वे जग्मुर्विप्राः सहस्रशः ।। ५० ।। गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु सर्वेषु ब्राह्मणेषु च । युधिष्ठिरमुवाचेदं वासुदेवः प्रतापवान् ।। ५१ ।। इसी प्रकार अन्य क्षत्रियशिरोमणियोंने दूसरे-दूसरे क्षत्रिय राजाओंका अनुगमन किया। इसी तरह सभी ब्राह्मण भी अत्यन्त पूजित हो सहस्रोंकी संख्यामें वहाँसे विदा हुए। राजाओं तथा ब्राह्मणोंके चले जानेपर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिरसे कहा— ।। ५०-५१ ।। आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तवानसि ।। ५२ ।। ‘कुरुनन्दन! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ, अब मैं द्वारकापुरीको जाऊँगा। सौभाग्यसे आपने सब यज्ञोंमें उत्तम राजसूयका सम्पादन कर लिया’ ।। ५२ ।। तमुवाचैवमुक्तस्तु धर्मराजो जनार्दनम् । तव प्रसादाद् गोविन्द प्राप्तः क्रतुवरो मया ।। ५३ ।। उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर जनार्दनसे बोले—‘गोविन्द! आपकी ही कृपासे मैंने यह श्रेष्ठ यज्ञ सम्पन्न किया है ।। ५३ ।। क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद् वशे स्थितम् । उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम् ।। ५४ ।। ‘तथा सारा क्षत्रियमण्डल भी आपके ही प्रसादसे मेरे अधीन हुआ और उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट ले मेरे पास आया ।। ५४ ।। कथं त्वद्गमनार्थं मे वाणी वितरतेऽनघ । न ह्यहं त्वामृते वीर रतिं प्राप्नोमि कर्हिचित् ।। ५५ ।। ‘अनघ! आपको जानेके लिये मेरी वाणी कैसे कह सकती है? वीर! मैं आपके बिना कभी प्रसन्न नहीं रह सकूँगा ।। ५५ ।। अवश्यं चैव गन्तव्या भवता द्वारकापुरी । एवमुक्तः स धर्मात्मा युधिष्ठिरसहायवान् ।। ५६ ।। अभिगम्याब्रवीत् प्रीतः पृथां पृथुयशा हरिः । साम्राज्यं समनुप्राप्ताः पुत्रास्तेऽद्य पितृष्वसः ।। ५७ ।। सिद्धार्था वसुमन्तश्च सा त्वं प्रीतिमवाप्नुहि । अनुज्ञातस्त्वया चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे ।। ५८ ।। ‘परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक

बोले—'बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ'॥ ५६—५८ ॥

सुभद्रां द्रौपदीं चैव सभाजयत केशवः ।
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्माद् युधिष्ठिरसहायवान् ॥ ५९ ॥
कुन्तीकी आज्ञा ले श्रीकृष्ण सुभद्रा और द्रौपदीसे भी मिले और मीठे वचनोंसे उन दोनोंको प्रसन्न किया। तत्पश्चात् वे युधिष्ठिरके साथ अन्तःपुरसे बाहर निकले ॥ ५९ ॥

स्नातश्च कृतजप्यश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ।
ततो मेघवपुः प्रख्यं स्यन्दनं च सुकल्पितम् ।
योजयित्वा महाबाहुर्दारुकः समुपस्थितः ॥ ६० ॥
उपस्थितं रथं दृष्ट्वा तार्क्ष्यप्रवरकेतनम् ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्य महामनाः ॥ ६१ ॥
प्रययौ पुण्डरीकाक्षस्ततो द्वारवतीं पुरीम् ॥ ६२ ॥
फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े ॥ ६०—६२ ॥

(सात्यकिः कृतवर्मा च रथमारुह्य सत्वरौ ।
वीजयामासतुस्तत्र चामराभ्यां हरिं तथा ॥
बलदेवश्च देवेशो यादवाश्च सहस्रशः ।
प्रययू राजवत् सर्वे धर्मपुत्रेण पूजिताः ।
ततः स सम्मतं राजा हित्वा सौवर्णमासनम् ॥)
तं पद्भ्यामनुवव्राज धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् वासुदेवं महाबलम् ॥ ६३ ॥
सात्यकि और कृतवर्मा शीघ्रतापूर्वक उस रथपर आरूढ़ हो श्रीहरिकी सेवाके लिये चँवर डुलाने लगे। देवेश्वर बलदेवजी तथा सहस्रों यदुवंशी धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे पूजित हो राजाकी भाँति वहाँसे विदा हुए। तदनन्तर सोनेके श्रेष्ठ सिंहासनको छोड़कर भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर पैदल ही महाबली भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ ६३ ॥

ततो मुहूर्तं संगृह्य स्यन्दनप्रवरं हरिः ।
अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ६४ ॥

तब कमललोचन भगवान् श्रीहरिने दो घड़ीतक अपने श्रेष्ठ रथको रोककर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ६४ ॥

अप्रमत्तः स्थितो नित्यं प्रजाः पाहि विशाम्पते ।
पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजाः ॥ ६५ ॥
बान्धवास्त्वोपजीवन्तु सहस्राक्षमिवामराः ।
कृत्वा परस्परेणैवं संविदं कृष्णपाण्डवौ ॥ ६६ ॥
अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान् प्रति ।

‘राजन्! आप सदा सावधान रहकर प्रजाजनोंके पालनमें लगे रहें। जैसे सब प्राणी मेघको, पक्षी महान् वृक्षको और सम्पूर्ण देवता इन्द्रको अपने जीवनका आधार मानकर उनका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार सभी बन्धु-बान्धव जीवन-निर्वाहके लिये आपका आश्रय लें।' श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर आपसमें इस प्रकार बातें करके एक दूसरेकी आज्ञा ले अपने-अपने स्थानको चल दिये ॥ ६५-६६ १/२ ॥

गते द्वारवतीं कृष्णे सात्वतप्रवरे नृप ॥ ६७ ॥
एको दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबलः ।
तस्यां सभायां दिव्यायामूषतुस्तौ नरर्षभौ ॥ ६८ ॥

राजन्! यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर भी राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि—ये दोनों नरश्रेष्ठ उस दिव्य सभाभवनमें ही रहे ॥ ६७-६८ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवधे
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवधविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४२ श्लोक मिलाकर कुल ११० श्लोक हैं)

(द्यूतपर्व)

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(द्यूतपर्व)

षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा

वैशम्पायन उवाच

समाप्ते राजसूये तु क्रतुश्रेष्ठे सुदुर्लभे ।
शिष्यैः परिवृतो व्यासः पुरस्तात् समपद्यत ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यज्ञोंमें श्रेष्ठ परम दुर्लभ राजसूययज्ञके समाप्त हो जानेपर शिष्योंसे घिरे हुए भगवान् व्यास राजा युधिष्ठिरके पास आये ॥ १ ॥
सोऽभ्ययादासनात् तूर्णं भ्रातृभिः परिवारितः ।
पाद्येनासनदानेन पितामहमपूजयत् ॥ २ ॥
उन्हें देखकर भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर तुरंत आसनसे उठकर खड़े हो गये और आसन एवं पाद्य आदि समर्पण करके उन्होंने पितामह व्यासजीका यथावत् पूजन किया ॥ २ ॥

अथोपविश्य भगवान् काञ्चने परमासने । आस्यतामिति चोवाच धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् सुवर्णमय उत्तम आसनपर बैठकर भगवान् व्यासने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—‘बैठ जाओ’ ॥ ३ ॥ अथोपविष्टं राजानं भ्रातृभिः परिवारितम् । उवाच भगवान् व्यासस्तत्तद्वाक्यविशारदः ॥ ४ ॥ भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरके बैठ जानेपर बातचीतमें कुशल भगवान् व्यासने उनसे कहा— ॥ ४ ॥ दिष्ट्या वर्धसि कौन्तेय साम्राज्यं प्राप्य दुर्लभम् । वर्धिताः कुरवः सर्वे त्वया कुरुकुलोद्वह ॥ ५ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! बड़े आनन्दकी बात है कि तुम परम दुर्लभ सम्राटका पद पाकर सदा उन्नतिशील हो रहे हो। कुरुकुलका भार वहन करनेवाले नरेश! तुमने समस्त कुरुवंशियोंको समृद्धिशाली बना दिया ॥ ५ ॥ आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पूजितोऽस्मि विशाम्पते । एवमुक्तः स कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥ अभिवाद्योपसंगृह्य पितामहमथाब्रवीत् ।

‘राजन्! अब मैं जाऊँगा। इसके लिये तुम्हारी अनुमति चाहता हूँ। तुमने मेरा अच्छी तरह सम्मान किया है।’ महात्मा कृष्णद्वैपायन व्यासके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पितामहके दोनों चरणोंको पकड़कर प्रणाम किया और कहा ।। ६ १/३ ।।

युधिष्ठिर उवाच

संशयो द्विपदां श्रेष्ठ ममोत्पन्नः सुदुर्लभः ।। ७ ।।
तस्य नान्योऽस्ति वक्ता वै त्वामृते द्विजपुङ्गव ।
**युधिष्ठिर बोले—**नरश्रेष्ठ! मेरे मनमें एक भारी संशय उत्पन्न हो गया है। विप्रवर! आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उसका समाधान कर सके ।। ७ १/३ ।।
उत्पातांस्त्रिविधान् प्राह नारदो भगवानृषिः ।। ८ ।।
दिव्यांश्चैवान्तरिक्षांश्च पार्थिवांश्च पितामह ।
अपि चैद्यस्य पतनाच्छन्नमौत्पातिकं महत् ।। ९ ।।
पितामह! देवर्षि भगवान् नारदने स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथिवीविषयक तीन प्रकारके उत्पात बताये हैं। क्या शिशुपालके मारे जानेसे वे महान् उत्पात शान्त हो गये? ।।

वैशम्पायन उवाच

राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः ।
कृष्णद्वैपायनो व्यास इदं वचनमब्रवीत् ।। १० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर पराशरनन्दन कृष्णद्वैपायन भगवान् व्यासने इस प्रकार कहा— ।। १० ।।
त्रयोदश समा राजन्नुत्पातानां फलं महत् ।
सर्वक्षत्रविनाशाय भविष्यति विशाम्पते ।। ११ ।।
‘राजन्! उत्पातोंका महान् फल तेरह वर्षोंतक हुआ करता है। इस समय जो उत्पात प्रकट हुआ था, वह समस्त क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला होगा ।। ११ ।।
त्वामेकं कारणं कृत्वा कालेन भरतर्षभ ।
समेतं पार्थिवं क्षत्रं क्षयं यास्यति भारत ।
दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ।। १२ ।।
‘भरतकुलतिलक! एकमात्र तुम्हींको निमित्त बनाकर यथासमय समस्त भूमिपालोंका समुदाय आपसमें लड़कर नष्ट हो जायगा। भारत! क्षत्रियोंका यह विनाश दुर्योधनके अपराधसे तथा भीमसेन और अर्जुनके पराक्रमद्वारा सम्पन्न होगा ।। १२ ।।
स्वप्ने द्रक्ष्यसि राजेन्द्र क्षपान्ते त्वं वृषध्वजम् ।
नीलकण्ठं भवं स्थाणुं कपालिं त्रिपुरान्तकम् ।। १३ ।।
उग्रं रुद्रं पशुपतिं महादेवमुमापतिम् ।
हरं शर्वं वृषं शूलं पिनाकिं कृत्तिवाससम् ।। १४ ।।

'राजेन्द्र! तुम रातके अन्तमें स्वप्नमें उन वृषभध्वज भगवान् शंकरका दर्शन करोगे, जो नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी तथा कृत्तिवासा कहलाते हैं।। १३-१४ ।। कैलासकूटप्रतिमं वृषभेऽवस्थितं शिवम् ।
निरीक्षमाणं सततं पितृराजाश्रितां दिशम् ।। १५ ।।
'उन भगवान् शिवकी कान्ति कैलासशिखरके समान उज्ज्वल होगी। वे वृषभपर आरूढ़ हुए सदा दक्षिण दिशाकी ओर देख रहे होंगे ।। १५ ।।
एवमीदृशकं स्वप्नं द्रक्ष्यसि त्वं विशाम्पते ।
मा तत्कृते ह्यनुध्याहि कालो हि दुरतिक्रमः ।। १६ ।।
'राजन्! तुम्हें इस प्रकार ऐसा स्वप्न दिखायी देगा, किंतु उसके लिये तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि काल सबके लिये दुर्लङ्घ्य है ।। १६ ।।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कैलासं पर्वतं प्रति ।
अप्रमत्तः स्थितो दान्तः पृथिवीं परिपालय ।। १७ ।।
'तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं कैलासपर्वतपर जाऊँगा। तुम सावधान एवं जितेन्द्रिय होकर पृथ्वीका पालन करो' ।। १७ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा स भगवान् कैलासं पर्वतं ययौ ।
कृष्णद्वैपायनो व्यासः सह शिष्यैः श्रुतानुगैः ।। १८ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान् कृष्ण द्वैपायन व्यास वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले अपने शिष्योंके साथ कैलासपर्वतपर चले गये ।। १८ ।।
गते पितामहे राजा चिन्ताशोकसमन्वितः ।
निःश्वसन्नुष्णमसकृत् तमेवार्थं विचिन्तयन् ।। १९ ।।
कथं नु दैवं शक्येत पौरुषेण प्रबाधितुम् ।
अवश्यमेव भविता यदुक्तं परमर्षिणा ।। २० ।।
अपने पितामह व्यासजीके चले जानेपर चिन्ता और शोकसे युक्त राजा युधिष्ठिर बारंबार गरम साँसें लेते हुए उसी बातका चिन्तन करते रहे। अहो! दैवका विधान पुरुषार्थसे किस प्रकार टाला जा सकता है? महर्षिने जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही होगा ।। १९-२० ।।
ततोऽब्रवीन्महातेजाः सर्वान् भ्रातॄन् युधिष्ठिरः ।
श्रुतं वै पुरुषव्याघ्रा यन्मां द्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २१ ।।
तदा तद्वचनं श्रुत्वा मरणे निश्चिता मतिः ।
सर्वक्षत्रस्य निधने यद्यहं हेतुरीप्सितः ।। २२ ।।

कालेन निर्मितस्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः ।
एवं ब्रुवन्तं राजानं फाल्गुनः प्रत्यभाषत ॥ २३ ॥

यही सोचते-सोचते महातेजस्वी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे कहा—'पुरुषसिंहो! महर्षि व्यासने मुझसे जो कहा है, उसे तुमलोगोंने सुना है न? उनकी वह बात सुनकर मैंने मरनेका निश्चय कर लिया है। तात! यदि समस्त क्षत्रियोंके विनाशमें विधाताने मुझे ही निमित्त बनानेकी इच्छा की है, कालने मुझे ही इस अनर्थका कारण बनाया है तो मेरे जीवनका क्या प्रयोजन है?' राजाकी ऐसी बातें सुनकर अर्जुनने उत्तर दिया— ॥ २१—२३ ॥

मा राजन् कश्मलं घोरं प्रविशो बुद्धिनाशनम् ।
सम्प्रधार्य महाराज यत् क्षेमं तत् समाचर ॥ २४ ॥

'राजन्! इस भयंकर मोहमें न पड़िये, यह बुद्धिको नष्ट करनेवाला है। महाराज! अच्छी तरह सोच-विचारकर आपको जो कल्याणप्रद जान पड़े, वह कीजिये' ॥ २४ ॥

ततोऽब्रवीत् सत्यधृतिर्भ्रातॄन् सर्वान् युधिष्ठिरः ।
द्वैपायनस्य वचनं ह्येवं समनुचिन्तयन् ॥ २५ ॥

तब सत्यवादी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे व्यासजीकी बातोंपर विचार करते हुए कहा— ॥ २५ ॥

अद्यप्रभृति भद्रं वः प्रतिज्ञां मे निबोधत ।
त्रयोदश समास्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः ॥ २६ ॥

'तात! तुमलोगोंका कल्याण हो, भाइयोंके विनाशका कारण बननेके लिये मुझे तेरह वर्षोंतक जीवित रहनेसे क्या लाभ? यदि जीना ही है तो आजसे मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो— ॥ २६ ॥

न प्रवक्ष्यामि परुषं भ्रातॄन्यांश्च पार्थिवान् ।
स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत् समुदाहरन् ॥ २७ ॥

'मैं अपने भाइयों तथा दूसरे राजाओंसे कभी कड़वी बात नहीं बोलूँगा। बन्धु-बान्धवोंकी आज्ञामें रहकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ लानेमें संलग्न रहूँगा' ॥ २७ ॥

एवं मे वर्तमानस्य स्वसुतेष्वितरेषु च ।
भेदो न भविता लोके भेदमूलो हि विग्रहः ॥ २८ ॥

'इस प्रकार समतापूर्ण बर्ताव करते हुए मेरा अपने पुत्रों तथा दूसरोंके प्रति भेदभाव न होगा; क्योंकि जगत्में लड़ाई-झगड़ेका मूल कारण भेदभाव ही है ॥ २८ ॥

विग्रहं दूरतो रक्षन् प्रियाण्येव समाचरन् ।
वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभाः ॥ २९ ॥

‘नररत्न! विग्रह या वैर-विरोधको अपनेसे दूर ही रखकर सबका प्रिय करते हुए मैं संसारमें निन्दाका पात्र नहीं हो सकूँगा’ ॥ २९ ॥ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वचनं पाण्डवाः संनिशम्य तत् । तमेव समवर्तन्त धर्मराजहिते रताः ॥ ३० ॥ अपने बड़े भाईकी वह बात सुनकर सब पाण्डव उन्हींके हितमें तत्पर हो सदा उनका ही अनुसरण करने लगे ॥ ३० ॥ संसत्सु समयं कृत्वा धर्मराड् भ्रातृभिः सह । पितॄंस्तर्प्य यथान्यायं देवतांश्च विशाम्पते ॥ ३१ ॥ राजन्! धर्मराजने अपने भाइयोंके साथ भरी सभामें यह प्रतिज्ञा करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण किया ॥ ३१ ॥ कृतमङ्गलकल्याणो भ्रातृभिः परिवारितः । गतेषु क्षत्रियेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥ ३२ ॥ युधिष्ठिरः सहामात्यः प्रविवेश पुरोत्तमम् । दुर्योधनो महाराज शकुनिश्चापि सौबलः । सभायां रमणीयायां तत्रैवास्ते नराधिप ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ जनमेजय! समस्त क्षत्रियोंके चले जानेपर कल्याणमय मांगलिक कृत्य पूर्ण करके भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने मन्त्रियोंके साथ अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया। महाराज! दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ये दोनों उस रमणीय सभामें ही रह गये ॥ ३२-३३ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसमये षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिर-प्रतिज्ञाविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥