भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2013

राजन्! महाराज युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें नाना जनपदोंसे युक्त सारा जम्बूद्वीप ही एकत्र हुआ-सा दिखायी देता था। राजानः स्रग्विणस्तत्र सुमृष्टमणिकुण्डलाः। विविधान्यन्नपानानि लेह्यानि विविधानि च। तेषां नृपोपभोग्यानि ब्राह्मणेभ्यो ददुः स्म ते॥ वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल तथा हार धारण किये नरेश ब्राह्मणोंको राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य नाना प्रकारके अन्न-पान और भाँति-भाँतिकी चटनी परोसते थे। एतानि सततं भुक्त्वा तस्मिन् यज्ञे द्विजातयः। परां प्रीतिं ययुः सर्वे मोदमानास्तदा भृशम्॥ उस यज्ञमें निरन्तर उपर्युक्त पदार्थ भोजन करके सब ब्राह्मण आनन्दमग्न हो बड़ी तृप्ति और प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एवं समुदितं सर्वं बहुगोधनधान्यवत्। यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययुः॥ इस प्रकार बहुत-सी गायों तथा धन-धान्यसे सम्पन्न उस समृद्धिशाली यज्ञमण्डपको देखकर सब राजाओंको बड़ा आश्चर्य होता था। ऋत्विजश्च यथाशास्त्रं राजसूयं महाक्रतुम्। पाण्डवस्य यथाकालं जुहुवुः सर्वयाजकाः॥ ऋत्विज्लोग शास्त्रीय विधिके अनुसार राजा युधिष्ठिरके उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते थे और समस्त याजक ठीक समयपर अग्निमें आहुतियाँ देते थे। व्यासधौम्यादयः सर्वे विधिवत् षोडशर्त्विजः। स्वस्वकर्माणि चक्रुस्ते पाण्डवस्य महाक्रतौ॥ व्यास और धौम्य आदि जो सोलह ऋत्विज् थे, वे युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें विधिपूर्वक अपने-अपने निश्चित कार्योंका सम्पादन करते थे। नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यो नाबहुश्रुतः। नाव्रतो नानुपाध्यायो नपापो नाक्षमो द्विजः॥ उस यज्ञमण्डपमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो वेदके छहों अंगोंका ज्ञाता, बहुश्रुत, व्रतशील, अध्यापक, पापरहित, क्षमाशील एवं सामर्थ्यशील न हो। न तत्र कृपणः कश्चिद् दरिद्रो न बभूव ह। क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानुषः॥ उस यज्ञमें कोई भी मनुष्य दीन, दरिद्र, दुःखी, भूखा-प्यासा अथवा मूढ़ नहीं था। भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास सर्वदा। सहदेवो महातेजाः सततं राजशासनात्॥