भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2018

राजन्! सुबल और उनके पुत्रके साथ नकुल गये। द्रौपदीके पाँच पुत्रों तथा अभिमन्युने पर्वतीय महारथियोंको अपने राज्यकी सीमातक पहुँचाया ।। ४९ ।। अन्वगच्छंस्तथैवान्यान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभाः । एवं सुपूजिताः सर्वे जग्मुर्विप्राः सहस्रशः ।। ५० ।। गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु सर्वेषु ब्राह्मणेषु च । युधिष्ठिरमुवाचेदं वासुदेवः प्रतापवान् ।। ५१ ।। इसी प्रकार अन्य क्षत्रियशिरोमणियोंने दूसरे-दूसरे क्षत्रिय राजाओंका अनुगमन किया। इसी तरह सभी ब्राह्मण भी अत्यन्त पूजित हो सहस्रोंकी संख्यामें वहाँसे विदा हुए। राजाओं तथा ब्राह्मणोंके चले जानेपर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिरसे कहा— ।। ५०-५१ ।। आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तवानसि ।। ५२ ।। ‘कुरुनन्दन! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ, अब मैं द्वारकापुरीको जाऊँगा। सौभाग्यसे आपने सब यज्ञोंमें उत्तम राजसूयका सम्पादन कर लिया’ ।। ५२ ।। तमुवाचैवमुक्तस्तु धर्मराजो जनार्दनम् । तव प्रसादाद् गोविन्द प्राप्तः क्रतुवरो मया ।। ५३ ।। उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर जनार्दनसे बोले—‘गोविन्द! आपकी ही कृपासे मैंने यह श्रेष्ठ यज्ञ सम्पन्न किया है ।। ५३ ।। क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद् वशे स्थितम् । उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम् ।। ५४ ।। ‘तथा सारा क्षत्रियमण्डल भी आपके ही प्रसादसे मेरे अधीन हुआ और उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट ले मेरे पास आया ।। ५४ ।। कथं त्वद्गमनार्थं मे वाणी वितरतेऽनघ । न ह्यहं त्वामृते वीर रतिं प्राप्नोमि कर्हिचित् ।। ५५ ।। ‘अनघ! आपको जानेके लिये मेरी वाणी कैसे कह सकती है? वीर! मैं आपके बिना कभी प्रसन्न नहीं रह सकूँगा ।। ५५ ।। अवश्यं चैव गन्तव्या भवता द्वारकापुरी । एवमुक्तः स धर्मात्मा युधिष्ठिरसहायवान् ।। ५६ ।। अभिगम्याब्रवीत् प्रीतः पृथां पृथुयशा हरिः । साम्राज्यं समनुप्राप्ताः पुत्रास्तेऽद्य पितृष्वसः ।। ५७ ।। सिद्धार्था वसुमन्तश्च सा त्वं प्रीतिमवाप्नुहि । अनुज्ञातस्त्वया चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे ।। ५८ ।। ‘परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक