महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2019, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोले—'बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ'॥ ५६—५८ ॥
सुभद्रां द्रौपदीं चैव सभाजयत केशवः ।
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्माद् युधिष्ठिरसहायवान् ॥ ५९ ॥
कुन्तीकी आज्ञा ले श्रीकृष्ण सुभद्रा और द्रौपदीसे भी मिले और मीठे वचनोंसे उन दोनोंको प्रसन्न किया। तत्पश्चात् वे युधिष्ठिरके साथ अन्तःपुरसे बाहर निकले ॥ ५९ ॥
स्नातश्च कृतजप्यश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ।
ततो मेघवपुः प्रख्यं स्यन्दनं च सुकल्पितम् ।
योजयित्वा महाबाहुर्दारुकः समुपस्थितः ॥ ६० ॥
उपस्थितं रथं दृष्ट्वा तार्क्ष्यप्रवरकेतनम् ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्य महामनाः ॥ ६१ ॥
प्रययौ पुण्डरीकाक्षस्ततो द्वारवतीं पुरीम् ॥ ६२ ॥
फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े ॥ ६०—६२ ॥
(सात्यकिः कृतवर्मा च रथमारुह्य सत्वरौ ।
वीजयामासतुस्तत्र चामराभ्यां हरिं तथा ॥
बलदेवश्च देवेशो यादवाश्च सहस्रशः ।
प्रययू राजवत् सर्वे धर्मपुत्रेण पूजिताः ।
ततः स सम्मतं राजा हित्वा सौवर्णमासनम् ॥)
तं पद्भ्यामनुवव्राज धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् वासुदेवं महाबलम् ॥ ६३ ॥
सात्यकि और कृतवर्मा शीघ्रतापूर्वक उस रथपर आरूढ़ हो श्रीहरिकी सेवाके लिये चँवर डुलाने लगे। देवेश्वर बलदेवजी तथा सहस्रों यदुवंशी धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे पूजित हो राजाकी भाँति वहाँसे विदा हुए। तदनन्तर सोनेके श्रेष्ठ सिंहासनको छोड़कर भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर पैदल ही महाबली भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ ६३ ॥
ततो मुहूर्तं संगृह्य स्यन्दनप्रवरं हरिः ।
अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ६४ ॥