महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंन स पुत्राञ्जनयितुं दारान् मूढश्चिकीर्षति । तेन लम्बामहे गर्ते संतानस्य क्षयादिह ॥ २० ॥ अनाथास्तेन नाथेन यया दुष्कृतिनस्तथा । कस्त्वं बन्धुरिवास्माकमनुशोचसि सत्तम ॥ २१ ॥ ज्ञातुमिच्छामहे ब्रह्मन् को भवानिह नः स्थितः । किमर्थं चैव नः शोच्याननुशोचसि सत्तम ॥ २२ ॥ वह मूढ पुत्र उत्पन्न करनेके लिये किसी स्त्रीसे विवाह करना नहीं चाहता है। अतः वंशपरम्पराका विनाश होनेसे हम यहाँ इस गड्ढेमें लटक रहे हैं। हमारी रक्षा करनेवाला वह वंशधर मौजूद है, तो भी पापकमीं मनुष्योंकी भाँति हम अनाथ हो गये हैं। साधुशिरोमणे! तुम कौन हो जो हमारे बन्धु-बान्धवोंकी भाँति हमलोगोंकी इस दयनीय दशाके लिये शोक कर रहे हो? ब्रह्मन्! हम यह जानना चाहते हैं कि तुम कौन हो जो आत्मीयकी भाँति यहाँ हमारे पास खड़े हो? सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! हम शोचनीय प्राणियोंके लिये तुम क्यों शोकमग्न होते हो ॥ २०—२२ ॥
जरत्कारुरुवाच
मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः । ब्रूत किं करवाण्यद्य जरत्कारुरहं स्वयम् ॥ २३ ॥ **जरत्कारुने कहा—**महात्माओ! आपलोग मेरे ही पितामह और पूर्वज पितृगण हैं। स्वयं मैं ही जरत्कारु हूँ। बताइये, आज आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ २३ ॥
पितर ऊचुः
यतस्व यत्नवांस्तात संतानाय कुलस्य नः । आत्मनोऽर्थेऽस्मदर्थे च धर्म इत्येव वा विभो ॥ २४ ॥ **पितर बोले—**तात! तुम हमारे कुलकी संतान-परम्पराको बनाये रखनेके लिये निरन्तर यत्नशील रहकर विवाहके लिये प्रयत्न करो। प्रभो! तुम अपने लिये, हमारे लिये अथवा धर्मका पालन हो, इस उद्देश्यसे पुत्रकी उत्पत्तिके लिये यत्न करो ॥ २४ ॥
न हि धर्मफलैस्तात न तपोभिः सुसंचितैः । तां गतिं प्राप्नुवन्तीह पुत्रिणो यां व्रजन्ति वै ॥ २५ ॥ तात! पुत्रवाले मनुष्य इस लोकमें जिस उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं, उसे अन्य लोग धर्मानुकूल फल देनेवाले भलीभाँति संचित किये हुए तपसे भी नहीं पाते ॥ २५ ॥