महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतद् दारग्रहणे यत्नं संतत्यां च मनः कुरु । पुत्रकास्मन्नियोगात् त्वमेतन्नः परमं हितम् ॥ २६ ॥ अतः बेटा! तुम हमारी आज्ञासे विवाह करनेका प्रयत्न करो और संतानोत्पादनकी ओर ध्यान दो। यही हमारे लिये सर्वोत्तम हितकी बात होगी ॥ २६ ॥
जरत्कारुरुवाच
न दारान् वै करिष्येऽहं न धनं जीवितार्थतः । भवतां तु हितार्थाय करिष्ये दारसंग्रहम् ॥ २७ ॥ जरत्कारुने कहा—पितामहगण! मैंने अपने मनमें यह निश्चय कर लिया था कि मैं जीवनके सुख-भोगके लिये कभी न तो पत्नीका परिग्रह करूँगा और न धनका संग्रह ही; परंतु यदि ऐसा करनेसे आपलोगोंका हित होता है तो उसके लिये अवश्य विवाह कर लूँगा ॥ २७ ॥
समयेन च कर्ताहमनेन विधिपूर्वकम् । तथा यद्युपलप्स्यामि करिष्ये नान्यथा ह्यहम् ॥ २८ ॥ किंतु एक शर्तके साथ मुझे विधिपूर्वक विवाह करना है। यदि उस शर्तके अनुसार किसी कुमारी कन्याको पाऊँगा, तभी उससे विवाह करूँगा, अन्यथा विवाह करूँगा ही नहीं ॥ २८ ॥
सनाम्नी या भवित्री मे दित्सिता चैव बन्धुभिः । भैक्ष्यवत्तामहं कन्यामुपयंस्ये विधानतः ॥ २९ ॥ (वह शर्त यों है—) जिस कन्याका नाम मेरे नामके ही समान हो, जिसे उसके भाई-बन्धु स्वयं मुझे देनेकी इच्छासे रखते हों और जो भिक्षाकी भाँति स्वयं प्राप्त हुई हो, उसी कन्याका मैं शास्त्रीय विधिके अनुसार पाणिग्रहण करूँगा ॥ २९ ॥
दरिद्राय हि मे भार्या को दास्यति विशेषतः । प्रतिग्रहीष्ये भिक्षां तु यदि कश्चित् प्रदास्यति ॥ ३० ॥ विशेष बात तो यह है कि मैं दरिद्र हूँ, भला मुझे माँगनेपर भी कौन अपनी कन्या पत्नीरूपमें प्रदान करेगा? इसलिये मेरा विचार है कि यदि कोई भिक्षाके तौरपर अपनी कन्या देगा तो उसे ग्रहण करूँगा ॥ ३० ॥
एवं दारक्रियाहेतोः प्रयतिष्ये पितामहाः । अनेन विधिना शश्वन्न करिष्येऽहमन्यथा ॥ ३१ ॥ पितामहो! मैं इसी प्रकार, इसी विधिसे विवाहके लिये सदा प्रयत्न करता रहूँगा। इसके विपरीत कुछ नहीं करूँगा ॥ ३१ ॥