महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसके सिवा, उन्होंने दूसरे भूपालोंसे दक्षिण समुद्रके निकटसे सैकड़ों उत्तरीय वस्त्र,
शंख, रत्न तथा अन्य उपहार-सामग्री लेकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको समर्पित की।
दार्दुरं चन्दनं मुख्यं भारान् षण्णवतिं ध्रुवम् ।
पाण्डवाय ददौ पाण्ड्यः शङ्खांस्तावत् एव च ॥
पाण्ड्यनरेशने मलय और दर्दुरपर्वतके श्रेष्ठ चन्दनके छियानबे भार युधिष्ठिरको भेंट
किये। फिर उतने ही शंख भी समर्पित किये।
चन्दनागरु चानन्तं मुक्तावैदूर्यचित्रकाः ।
चोलश्च केरलश्चोभौ ददतुः पाण्डवाय वै ॥
चोल और केरलदेशके नरेशोंने असंख्य चन्दन, अगुरु तथा मोती, वैदूर्य तथा चित्रक
नामक रत्न धर्मराज युधिष्ठिरको अर्पित किये।
अश्मको हेमशृङ्गीश्च दोग्ध्रीर्हेमविभूषिताः ।
सवत्साः कुम्भदोहाश्च गाः सहस्राण्यदाद् दश ॥
राजा अश्मकने बछड़ोंसहित दस हजार दुधारू गौएँ भेंट कीं, जिनके सींगोंमें सोना
मढ़ा हुआ था और गलेमें सोनेके आभूषण पहनाये गये थे। उनके थन घड़ोंके समान
दिखायी देते थे।
सैन्धवानां सहस्राणि हयानां पञ्चविंशतिम् ।
अददात् सैन्धवो राजा हेममाल्यैरलंकृतान् ॥
सिन्धुनरेशने सुवर्णमालाओंसे अलंकृत पचीस हजार सिन्धुदेशीय घोड़े उपहारमें दिये
थे।
सौवीरो हस्तिभिर्युक्तान् रथांश्च त्रिशतावरान् ।
जातरूपपरिष्कारान् मणिरत्नविभूषितान् ॥
मध्यांदिनार्कप्रतिमांस्तेजसाप्रतिमानिव ।
बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत् ॥
सौवीरराजने हाथी जुते हुए रथ प्रदान किये, जो तीन सौसे कम न रहे होंगे। उन रथोंको
सुवर्ण, मणि तथा रत्नोंसे सजाया गया था। वे दोपहरके सूर्यकी भाँति जगमगा रहे थे। उनसे
जो प्रभा फैल रही थी, उसकी कहीं भी उपमा न थी। इन रथोंके सिवा, उन्होंने अन्य सब
प्रकारकी भी उपहार-सामग्री युधिष्ठिरको भेंट की थी।
अवन्तिराजो रत्नानि विविधानि सहस्रशः ।
हाराङ्गदांश्च मुख्यान् वै विविधं च विभूषणम् ॥
दासीनामयुतं चैव बलिमादाय भारत ।
सभाद्वारि नरश्रेष्ठ दिदृक्षुरवतिष्ठते ॥
नरश्रेष्ठ भरतनन्दन! अवन्तीनरेश नाना प्रकारके सहस्रों रत्न, हार, श्रेष्ठ अंगद
(बाजूबंद), भाँति-भाँतिके अन्यान्य आभूषण, दस हजार दासियों तथा अन्यान्य उपहार-