भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2058

सामग्री साथ लेकर राजसभाके द्वारपर खड़े थे और भीतर जाकर युधिष्ठिरका दर्शन पानेके लिये उत्सुक हो रहे थे। दशार्णश्चेदिराजश्च शूरसेनश्च वीर्यवान् । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत् ।। दशार्णनरेश, चेदिराज तथा पराक्रमी राजा शूरसेनने सब प्रकारकी उपहार-सामग्री लाकर युधिष्ठिरको समर्पित की। काशिराजेन हृष्टेन बली राजन् निवेदितः ।। अशीतिगोसहस्राणि शतान्‍यष्टौ च दन्तिनाम् । विविधानि च रत्नानि काशिराजो बलिं ददौ ।। राजन्! काशीनरेशने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अस्सी हजार गौएँ, आठ सौ गजराज तथा नाना प्रकारके रत्न भेंट किये। कृतक्षणश्च वैदेहः कौसलश्च बृहद्बलः । ददतुर्वाजिमुख्यांश्च सहस्राणि चतुर्दश ।। विदेहराज कृतक्षण तथा कोसलनरेश बृहद्वलने चौदह-चौदह हजार उत्तम घोड़े दिये थे। शैब्यो वसादिभिः सार्धं त्रिगर्तों मालवैः सह । तस्मै रत्नानि ददतुरेकैको भूमिपोऽमितम् ।। हारांस्तु मुक्तान् मुख्यांश्च विविधं च विभूषणम् ।) वस आदि नरेशोंसहित राजा शैब्य तथा मालवोंसहित त्रिगर्तराजने युधिष्ठिरको बहुत-से रत्न भेंट किये, उनमेंसे एक-एक भूपालने असंख्य हार, श्रेष्ठ मोती तथा भाँति-भाँतिके आभूषण समर्पित किये थे। शतं दासीसहस्राणां कार्पासिकनिवासिनाम् ।। ८ ।। श्यामास्तन्व्यो दीर्घकेश्यो हेमाभरणभूषिताः । कार्पासिक देशमें निवास करनेवाली एक लाख दासियाँ उस यज्ञमें सेवा कर रही थीं। वे सब-की-सब श्यामा तथा तन्वंगी थीं। उन सबके केश बड़े-बड़े थे और वे सभी सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थीं ।। ८ १/२ ।। शूद्रा विप्रोत्तमार्हाणि राङ्कवाण्यजिनानि च ।। ९ ।। बलिं च कृत्स्नमादाय भरुकच्छनिवासिनः । उपनिन्युर्महाराज हयान् गान्धारदेशजान् ।। १० ।। महाराज! भरुकच्छ (भड़ौँच)-निवासी शूद्र श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके उपयोगमें आनेयोग्य रांकुमृगके चर्म तथा अन्य सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर उपस्थित हुए थे। वे अपने साथ गान्धारदेशके बहुत-से घोड़े भी लाये थे ।। ९-१० ।। इन्द्रकृष्टैर्वर्तयन्ति धान्यैर्यै च नदीमुखैः ।