महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमुद्रनिष्कूटे जाताः पारेसिन्धु च मानवाः ।। ११ ।। ते वैरामाः पारदाश्च आभीराः कितवैः सह । विविधं बलिमादाय रत्नानि विविधानि च ।। १२ ।। अजाविकं गोहिरण्यं खरोष्ट्रं फलजं मधु । कम्बलान् विविधांश्चैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ।। १३ ।। जो समुद्रतटवर्ती गृहोद्यानमें तथा सिन्धुके उस पार रहते हैं, वर्षाद्वारा इन्द्रके पैदा किये हुए तथा नदीके जलसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके धान्योंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं, वे वैराम, पारद, आभीर तथा कितव जातिके लोग नाना प्रकारके रत्न एवं भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री—बकरी, भेड़, गाय, सुवर्ण, गधे, ऊँट, फलसे तैयार किया हुआ मधु तथा अनेक प्रकारके कम्बल लेकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण (बाहर ही) खड़े थे और भीतर नहीं जाने पाते थे ।। ११—१३ ।।
प्राग्ज्योतिषाधिपः शूरो म्लेच्छानामधिपो बली । यवनैः सहितो राजा भगदत्तो महारथः ।। १४ ।। आजानेयान् हयाञ्छीघ्रानादायानिलरंहसः । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठति वारितः ।। १५ ।। प्राग्ज्योतिषपुरके अधिपति तथा म्लेच्छोंके स्वामी शूरवीर एवं बलवान् महारथी राजा भगदत्त यवनोंके साथ पधारे थे और वायुके समान वेगवाले अच्छी जातिके शीघ्रगामी घोड़े तथा सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर राजद्वारपर खड़े थे। (अधिक भीड़के कारण) उनका प्रवेश भी रोक दिया गया था ।। १४-१५ ।।