महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2060, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअश्मसारमयं भाण्डं शुद्धदन्तत्सरूनसीन् । प्राग्ज्योतिषाधिपो दत्त्वा भगदत्तोऽव्रजत् तदा ॥ १६ ॥ उस समय प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त हीरे और पद्मराग आदि मणियोंके आभूषण तथा विशुद्ध हाथी-दाँतकी मूँठवाले खड्ग देकर भीतर गये थे ॥ १६ ॥
द्व्यक्षांस्त्र्यक्षाँल्ललाटाक्षान् नानादिग्भ्यः समागतान् । औष्णीकानन्तवासांश्च रोमकान् पुरुषादकान् ॥ १७ ॥ एकपादांश्च तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान् । राजानो बलिमादाय नानावर्णाननेकशः ॥ १८ ॥ कृष्णग्रीवान् महाकायान् रासभान् दूरपातिनः । आजह्रुर्दशसाहस्रान् विनीतान् दिक्षु विश्रुतान् ॥ १९ ॥ द्व्यक्ष, त्र्यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद—इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे ॥ १७—१९ ॥
प्रमाणरागसम्पन्नान् वङ्क्षुतीरसमुद्भवान् । बल्यर्थं ददतस्तस्मै हिरण्यं रजतं बहु ॥ २० ॥ दत्त्वा प्रवेशं प्राप्तास्ते युधिष्ठिरनिवेशने । उनकी लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई जैसी होनी चाहिये, वैसी ही थी। उनका रंग भी अच्छा था। वे समस्त रासभ वंक्षु नदीके तटपर उत्पन्न हुए थे। उक्त राजालोग युधिष्ठिरको भेंटके लिये बहुत-सा सोना और चाँदी देते थे और देकर युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट होते थे ॥ २० १/२ ॥
इन्द्रगोपकवर्णाभाञ्छुकवर्णान् मनोजवान् ॥ २१ ॥ तथैवेन्द्रायुधनिभान् संध्याभ्रसदृशानपि । अनेकवर्णानारण्यान् गृहीत्वाश्वान् महाजवान् ॥ २२ ॥ जातरूपमनर्घ्यं च ददुस्तस्यैकपादकाः । एकपाददेशीय राजाओंने इन्द्रगोप (बीरबहूटी)-के समान लाल, तोतेके समान हरे, मनके समान वेगशाली, इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगे, संध्याकालके बादलोंके सदृश लाल और अनेक वर्णवाले महावेगशाली जंगली घोड़े एवं बहुमूल्य सुवर्ण उन्हें भेंटमें दिये ॥ २१-२२ १/२ ॥
चीनाञ्छकांस्तथा चौड्रान् बर्बरान् वनवासिनः ॥ २३ ॥ वार्ष्णेयान् हारहूणांश्च कृष्णान् हैमवतांस्तथा ।