महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2061, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीपानूपानधिगतान् विविधान् द्वारवारितान् ॥ २४ ॥ बल्यर्थं ददतस्तस्य नानारूपाननेकंशः । कृष्णग्रीवान् महाकायान् रासभाञ्छतपातिनः । अहार्षुर्दशसाहस्रान् विनीतान् दिक्षु विश्रुतान् ॥ २५ ॥ चीन, शक, ओड्र, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे ॥ २३—२५ ॥ प्रमाणरागस्पर्शाढ्यं बाह्लीचीनसमुद्भवम् । और्णं च राङ्कवं चैव कीटजं पट्टजं तथा ॥ २६ ॥ कुटीकृतं तथैवात्र कमलाभं सहस्रशः । श्लक्ष्णं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम् ॥ २७ ॥ निशितांश्चैव दीर्घासीनृष्टिशक्तिपरश्वधान् । अपरान्तसमुद्भूतांस्तथैव परशूञ्छितान् ॥ २८ ॥ रसान् गन्धांश्च विविधान् रत्नानि च सहस्रशः । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ २९ ॥ शकास्तुषाराः कङ्काश्च रोमशाः शृङ्गिणो नराः । जिनकी लंबाई-चौड़ाई पूरी थी, जिनका रंग सुन्दर और स्पर्श सुखद था, ऐसे बाह्लीक चीनके बने हुए, ऊनी, हिरनके रोमसमूहसे बने हुए, रेशमी, पाटके, विचित्र गुच्छेदार तथा कमलके तुल्य कोमल सहस्रों चिकने वस्त्र, जिनमें कपासका नाम भी नहीं था तथा मुलायम मृगचर्म—ये सभी वस्तुएँ भेंटके लिये प्रस्तुत थीं। तीखी और लंबी तलवारें, ऋष्टि, शक्ति, फरसे, अपरान्त (पश्चिम) देशके बने हुए तीखे परशु, भाँति-भाँतिके रस और गन्ध, सहस्रों रत्न तथा सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर शक, तुषार, कंक, रोमश तथा शृंगीदेशके लोग राजद्वारपर रोके जाकर खड़े थे ॥ २६—२९ १/२ ॥ महागजान् दूरगमान् गणितानर्बुदान् हयान् ॥ ३० ॥ शतशश्चैव बहुशः सुवर्णं पद्मसंमितम् । बलिमादाय विविधं द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ ३१ ॥ दूरतक जानेवाले बड़े-बड़े हाथी, जिनकी संख्या एक अर्बुद थी एवं घोड़े, जिनकी संख्या कई सौ अर्बुद थी और सुवर्ण जो एक पद्मकी लागतका था—इन सबको तथा भाँति-भाँतिकी दूसरी उपहार-सामग्रीको साथ लेकर कितने ही नरेश राजद्वारपर रोके जाकर भेंट देनेके लिये खड़े थे ॥ ३०-३१ ॥ आसनानि महार्हाणि यानानि शयनानि च ।