भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2062

मणिकाञ्चनचित्राणि गजदन्तमयानि च ॥ ३२ ॥ कवचानि विचित्राणि शस्त्राणि विविधानि च । रथांश्च विविधाकाराञ्जातरूपपरिष्कृतान् ॥ ३३ ॥ हयैर्विनीतैः सम्पन्नान् वैयाघ्रपरिवारितान् । विचित्रांश्च परिस्तोमान् रत्नानि विविधानि च ॥ ३४ ॥ नाराचानर्धनाराचाञ्छस्त्राणि विविधानि च । एतद् दत्त्वा महद् द्रव्यं पूर्वदेशाधिपा नृपाः ॥ प्रविष्टा यज्ञसदनं पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥

बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र—इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे ॥ ३२—३५ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ६१ श्लोक हैं)