महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2063, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन
दुर्योधन उवाच दायं तु विविधं तस्मै शृणु मे गदतोऽनघ । यज्ञार्थं राजभिर्दत्तं महान्तं धनसंचयम् ॥ १ ॥ दुर्योधन बोला—अनघ! राजाओं द्वारा युधिष्ठिरके यज्ञके लिये दिये हुए जिस महान् धनका संग्रह वहाँ हुआ था, वह अनेक प्रकारका था। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥
मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ २ ॥ खसा एकासना ह्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः । पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ॥ ३ ॥ तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः । जातरूपं द्रोणमेयमहार्षुः पुञ्जशो नृपाः ॥ ४ ॥ मेरु और मन्दराचलके बीचमें प्रवाहित होनेवाली शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर छिद्रोंमें वायुके भर जानेसे वेणुकी तरह बजनेवाले बाँसोंकी रमणीय छायामें जो लोग बैठते और विश्राम करते हैं, वे खस, एकासन, अर्ह, प्रदर, दीर्घवेणु, पारद, पुलिन्द, तंगण और परतंगण आदि नरेश भेंटमें देनेके लिये पिपीलिकाओं (चींटियों)-द्वारा निकाले हुए पिपीलिक नामवाले सुवर्णके ढेर-के-ढेर उठा लाये थे। उसका माप द्रोणसे किया जाता था ॥ २—४ ॥
कृष्णाँल्ललामांश्रमराञ्छुक्लांश्चान्याञ्छशिप्रभान् । हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादु क्षौद्रं तथा बहु ॥ ५ ॥ उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्चाप्यपोढं माल्यमम्बुभिः । उत्तरादपि कैलासादोषधीः सुमहाबलाः ॥ ६ ॥ पर्वतीया बलिं चान्यमाहृत्य प्रणताः स्थिताः । अजातशत्रोर्नृपतेर्द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ ७ ॥ इतना ही नहीं, वे सुन्दर काले रंगके चँवर तथा चन्द्रमाके समान श्वेत दूसरे चामर एवं हिमालयके पुष्पोंसे उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट मधु भी प्रचुर मात्रामें लाये थे। उत्तरकुरुदेशसे गंगाजल और मालाके योग्य रत्न तथा उत्तर कैलाससे प्राप्त हुई अतीव बलसम्पन्न औषधियाँ एवं अन्य भेंटकी सामग्री साथ लेकर आये हुए पर्वतीय भूपालगण अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरके द्वारपर रोके जाकर विनीतभावसे खड़े थे ॥
ये परार्धे हिमवतः सूर्योदयगिरौ नृपाः ।