महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अश्मसारमयं भाण्डं शुद्धदन्तत्सरूनसीन् । प्राग्ज्योतिषाधिपो दत्त्वा भगदत्तोऽव्रजत् तदा ॥ १६ ॥ उस समय प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त हीरे और पद्मराग आदि मणियोंके आभूषण तथा विशुद्ध हाथी-दाँतकी मूँठवाले खड्ग देकर भीतर गये थे ॥ १६ ॥
द्व्यक्षांस्त्र्यक्षाँल्ललाटाक्षान् नानादिग्भ्यः समागतान् । औष्णीकानन्तवासांश्च रोमकान् पुरुषादकान् ॥ १७ ॥ एकपादांश्च तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान् । राजानो बलिमादाय नानावर्णाननेकशः ॥ १८ ॥ कृष्णग्रीवान् महाकायान् रासभान् दूरपातिनः । आजह्रुर्दशसाहस्रान् विनीतान् दिक्षु विश्रुतान् ॥ १९ ॥ द्व्यक्ष, त्र्यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद—इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे ॥ १७—१९ ॥
प्रमाणरागसम्पन्नान् वङ्क्षुतीरसमुद्भवान् । बल्यर्थं ददतस्तस्मै हिरण्यं रजतं बहु ॥ २० ॥ दत्त्वा प्रवेशं प्राप्तास्ते युधिष्ठिरनिवेशने । उनकी लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई जैसी होनी चाहिये, वैसी ही थी। उनका रंग भी अच्छा था। वे समस्त रासभ वंक्षु नदीके तटपर उत्पन्न हुए थे। उक्त राजालोग युधिष्ठिरको भेंटके लिये बहुत-सा सोना और चाँदी देते थे और देकर युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट होते थे ॥ २० १/२ ॥
इन्द्रगोपकवर्णाभाञ्छुकवर्णान् मनोजवान् ॥ २१ ॥ तथैवेन्द्रायुधनिभान् संध्याभ्रसदृशानपि । अनेकवर्णानारण्यान् गृहीत्वाश्वान् महाजवान् ॥ २२ ॥ जातरूपमनर्घ्यं च ददुस्तस्यैकपादकाः । एकपाददेशीय राजाओंने इन्द्रगोप (बीरबहूटी)-के समान लाल, तोतेके समान हरे, मनके समान वेगशाली, इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगे, संध्याकालके बादलोंके सदृश लाल और अनेक वर्णवाले महावेगशाली जंगली घोड़े एवं बहुमूल्य सुवर्ण उन्हें भेंटमें दिये ॥ २१-२२ १/२ ॥
चीनाञ्छकांस्तथा चौड्रान् बर्बरान् वनवासिनः ॥ २३ ॥ वार्ष्णेयान् हारहूणांश्च कृष्णान् हैमवतांस्तथा ।
नीपानूपानधिगतान् विविधान् द्वारवारितान् ॥ २४ ॥ बल्यर्थं ददतस्तस्य नानारूपाननेकंशः । कृष्णग्रीवान् महाकायान् रासभाञ्छतपातिनः । अहार्षुर्दशसाहस्रान् विनीतान् दिक्षु विश्रुतान् ॥ २५ ॥ चीन, शक, ओड्र, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे ॥ २३—२५ ॥ प्रमाणरागस्पर्शाढ्यं बाह्लीचीनसमुद्भवम् । और्णं च राङ्कवं चैव कीटजं पट्टजं तथा ॥ २६ ॥ कुटीकृतं तथैवात्र कमलाभं सहस्रशः । श्लक्ष्णं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम् ॥ २७ ॥ निशितांश्चैव दीर्घासीनृष्टिशक्तिपरश्वधान् । अपरान्तसमुद्भूतांस्तथैव परशूञ्छितान् ॥ २८ ॥ रसान् गन्धांश्च विविधान् रत्नानि च सहस्रशः । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ २९ ॥ शकास्तुषाराः कङ्काश्च रोमशाः शृङ्गिणो नराः । जिनकी लंबाई-चौड़ाई पूरी थी, जिनका रंग सुन्दर और स्पर्श सुखद था, ऐसे बाह्लीक चीनके बने हुए, ऊनी, हिरनके रोमसमूहसे बने हुए, रेशमी, पाटके, विचित्र गुच्छेदार तथा कमलके तुल्य कोमल सहस्रों चिकने वस्त्र, जिनमें कपासका नाम भी नहीं था तथा मुलायम मृगचर्म—ये सभी वस्तुएँ भेंटके लिये प्रस्तुत थीं। तीखी और लंबी तलवारें, ऋष्टि, शक्ति, फरसे, अपरान्त (पश्चिम) देशके बने हुए तीखे परशु, भाँति-भाँतिके रस और गन्ध, सहस्रों रत्न तथा सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर शक, तुषार, कंक, रोमश तथा शृंगीदेशके लोग राजद्वारपर रोके जाकर खड़े थे ॥ २६—२९ १/२ ॥ महागजान् दूरगमान् गणितानर्बुदान् हयान् ॥ ३० ॥ शतशश्चैव बहुशः सुवर्णं पद्मसंमितम् । बलिमादाय विविधं द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ ३१ ॥ दूरतक जानेवाले बड़े-बड़े हाथी, जिनकी संख्या एक अर्बुद थी एवं घोड़े, जिनकी संख्या कई सौ अर्बुद थी और सुवर्ण जो एक पद्मकी लागतका था—इन सबको तथा भाँति-भाँतिकी दूसरी उपहार-सामग्रीको साथ लेकर कितने ही नरेश राजद्वारपर रोके जाकर भेंट देनेके लिये खड़े थे ॥ ३०-३१ ॥ आसनानि महार्हाणि यानानि शयनानि च ।
मणिकाञ्चनचित्राणि गजदन्तमयानि च ॥ ३२ ॥ कवचानि विचित्राणि शस्त्राणि विविधानि च । रथांश्च विविधाकाराञ्जातरूपपरिष्कृतान् ॥ ३३ ॥ हयैर्विनीतैः सम्पन्नान् वैयाघ्रपरिवारितान् । विचित्रांश्च परिस्तोमान् रत्नानि विविधानि च ॥ ३४ ॥ नाराचानर्धनाराचाञ्छस्त्राणि विविधानि च । एतद् दत्त्वा महद् द्रव्यं पूर्वदेशाधिपा नृपाः ॥ प्रविष्टा यज्ञसदनं पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥
बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र—इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे ॥ ३२—३५ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ६१ श्लोक हैं)
युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन
दुर्योधन उवाच दायं तु विविधं तस्मै शृणु मे गदतोऽनघ । यज्ञार्थं राजभिर्दत्तं महान्तं धनसंचयम् ॥ १ ॥ दुर्योधन बोला—अनघ! राजाओं द्वारा युधिष्ठिरके यज्ञके लिये दिये हुए जिस महान् धनका संग्रह वहाँ हुआ था, वह अनेक प्रकारका था। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥
मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ २ ॥ खसा एकासना ह्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः । पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ॥ ३ ॥ तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः । जातरूपं द्रोणमेयमहार्षुः पुञ्जशो नृपाः ॥ ४ ॥ मेरु और मन्दराचलके बीचमें प्रवाहित होनेवाली शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर छिद्रोंमें वायुके भर जानेसे वेणुकी तरह बजनेवाले बाँसोंकी रमणीय छायामें जो लोग बैठते और विश्राम करते हैं, वे खस, एकासन, अर्ह, प्रदर, दीर्घवेणु, पारद, पुलिन्द, तंगण और परतंगण आदि नरेश भेंटमें देनेके लिये पिपीलिकाओं (चींटियों)-द्वारा निकाले हुए पिपीलिक नामवाले सुवर्णके ढेर-के-ढेर उठा लाये थे। उसका माप द्रोणसे किया जाता था ॥ २—४ ॥
कृष्णाँल्ललामांश्रमराञ्छुक्लांश्चान्याञ्छशिप्रभान् । हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादु क्षौद्रं तथा बहु ॥ ५ ॥ उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्चाप्यपोढं माल्यमम्बुभिः । उत्तरादपि कैलासादोषधीः सुमहाबलाः ॥ ६ ॥ पर्वतीया बलिं चान्यमाहृत्य प्रणताः स्थिताः । अजातशत्रोर्नृपतेर्द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ ७ ॥ इतना ही नहीं, वे सुन्दर काले रंगके चँवर तथा चन्द्रमाके समान श्वेत दूसरे चामर एवं हिमालयके पुष्पोंसे उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट मधु भी प्रचुर मात्रामें लाये थे। उत्तरकुरुदेशसे गंगाजल और मालाके योग्य रत्न तथा उत्तर कैलाससे प्राप्त हुई अतीव बलसम्पन्न औषधियाँ एवं अन्य भेंटकी सामग्री साथ लेकर आये हुए पर्वतीय भूपालगण अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरके द्वारपर रोके जाकर विनीतभावसे खड़े थे ॥
ये परार्धे हिमवतः सूर्योदयगिरौ नृपाः ।
कारूषे च समुद्रान्ते लौहित्यमभितश्च ये ॥ ८ ॥
फलमूलाresource: फलमूलाresource -> फलमूलाशना ये च किराताश्चर्मवाससः ।
क्रूरशस्त्राः क्रूरकृतस्तांश्च पश्याम्यहं प्रभो ॥ ९ ॥
पिताजी! मैंने देखा कि जो राजा हिमालयके परार्धभागमें निवास करते हैं, जो उदयगिरिके निवासी हैं, जो समुद्र-तटवर्ती कारूषदेशमें रहते हैं तथा जो लौहित्यपर्वतके दोनों ओर वास करते हैं, फल और मूल ही जिनका भोजन है, वे चर्मवस्त्रधारी क्रूरतापूर्वक शस्त्र चलानेवाले और क्रूरकर्मा किरातनरेश भी वहाँ भेंट लेकर आये थे ॥ ८-९ ॥
चन्दनागुरुकाष्ठानां भारान् कालीयकस्य च ।
चर्मरत्नसुवर्णानां गन्धानां चैव राशयः ॥ १० ॥
कैरातकीनामयुतं दासीनां च विशाम्पते ।
आहृत्य रमणीयार्थान् दूरजान् मृगपक्षिणः ॥ ११ ॥
निचितं पर्वतेभ्यश्च हिरण्यं भूरिवर्चसम् ।
बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ १२ ॥
राजन्! चन्दन और अगुरुकाष्ठ तथा कृष्णागुरुकाष्ठके अनेक भार, चर्म, रत्न, सुवर्ण तथा सुगन्धित पदार्थोंकी राशि और दस हजार किरातदेशीय दासियाँ, सुन्दर-सुन्दर पदार्थ, दूर देशोंके मृग और पक्षी तथा पर्वतोंसे संगृहीत तेजस्वी सुवर्ण एवं सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर आये हुए राजालोग द्वारपर रोके जानेके कारण खड़े थे ॥ १०—१२ ॥
कैराता दरदा दर्वाः शूरा वै यमकास्तथा ।
औदुम्बरा दुर्विभागाः पारदा बाह्लिकैः सह ॥ १३ ॥
काश्मीराश्च कुमाराश्च घोरका हंसकायनाः ।
शिबित्रिगर्तयौधेया राजन्या भद्रकेकयाः ॥ १४ ॥
अम्बष्ठाः कौकुरास्तार्क्ष्या वस्त्रपाः पह्लवैः सह ।
वशातलाश्च मौलेयाः सह क्षुद्रकमालवैः ॥ १५ ॥
शौण्डिकाः कुकुराश्चैव शकाश्चैव विशाम्पते ।
अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च शाणवत्या गयास्तथा ॥ १६ ॥
सुजातयः श्रेणिमन्तः श्रेयांसः शस्त्रधारिणः ।
अहार्षुः क्षत्रिया वित्तं शतशोऽजातशत्रवे ॥ १७ ॥
किरात, दरद, दर्व, शूर, यमक, औदुम्बर, दुर्विभाग, पारद, बाह्लिक, काश्मीर, कुमार, घोरक, हंसकायन, शिबि, त्रिगर्त, यौधेय, भद्र, केकय, अम्बष्ठ, कौकुर, तार्क्ष्य, वस्त्रप, पह्लव, वशातल, मौलेय, क्षुद्रक, मालव, शौण्डिक, कुक्कुर, शक, अंग, वंग, पुण्ड्र, शाणवत्य तथा गय—ये उत्तम कुलमें उत्पन्न श्रेष्ठ एवं शस्त्रधारी क्षत्रिय राजकुमार सैकड़ोंकी संख्यामें पंक्तिबद्ध खड़े होकर अजातशत्रु युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित कर रहे थे ॥ १३—१७ ॥
वङ्गाः कलिङ्गा मगधास्ताम्रलिप्ताः सपुण्ड्रकाः । दौवालिकाः सागरकाः पत्रोर्णाः शैशवास्तथा ॥ १८ ॥ कर्णप्रावरणाश्चैव बहवस्तत्र भारत । तत्रस्था द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात् । कृतकालाः सुबलयस्ततो द्वारमवाप्स्यथ ॥ १९ ॥ भारत! वंग, कलिंग, मगध, ताम्रलिप्त, पुण्ड्रक, दौवालिक, सागरक, पत्रोर्ण, शैशव तथा कर्णप्रावरण आदि बहुत-से क्षत्रियनरेश वहाँ दरवाजेपर खड़े थे तथा राजाज्ञासे द्वारपालगण उन सबको यह संदेश देते थे कि आपलोग अपने लिये समय निश्चित कर लें। फिर उत्तम भेंट-सामग्री अर्पित करें। इसके बाद आपलोगोंको भीतर जानेका मार्ग मिल सकेगा ॥ १८-१९ ॥
ईषादन्तान् हेमकक्षान् पद्मवर्णान् कुथावृतान् । शैलाभान् नित्यमत्तांश्चाप्यभितः काम्यकं सरः ॥ २० ॥ दत्त्वैकैको दश शतान् कुञ्जरान् कवचावृतान् । क्षमावन्तः कुलीनाश्च द्वारेण प्राविशंस्तदा ॥ २१ ॥ तदनन्तर एक-एक क्षमाशील और कुलीन राजाने काम्यक सरोवरके निकट उत्पन्न हुए एक-एक हजार हाथियोंकी भेंट देकर द्वारके भीतर प्रवेश किया। उन हाथियोंके दाँत हलदण्डके समान लंबे थे। उनको बाँधनेकी रस्सी सोनेकी बनी हुई थी। उन हाथियोंका रंग कमलके समान सफेद था। उनकी पीठपर झूल पड़ा हुआ था। वे देखनेमें पर्वताकार और उन्मत्त प्रतीत होते थे ॥ २०-२१ ॥
एते चान्ये च बहवो गणा दिग्भ्यः समागताः । अन्यैश्चोपाहृतान्यत्र रत्नानीह महात्मभिः ॥ २२ ॥ ये तथा और भी बहुत-से भूपालगण अनेक दिशाओंसे भेंट लेकर आये थे। दूसरे-दूसरे महामना नरेशोंने भी वहाँ रत्नोंकी भेंट अर्पित की थी ॥ २२ ॥
राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुगः । शतानि चत्वार्यददद्धयानां वातरंहसाम् ॥ २३ ॥ इन्द्रके अनुगामी गन्धर्वराज चित्ररथने चार सौ दिव्य अश्व दिये, जो वायुके समान वेगशाली थे ॥ २३ ॥
तुम्बुरुस्तु प्रमुदितो गन्धर्वो वाजिनां शतम् । आम्रपत्रसवर्णानामददाद्धेममालिनाम् ॥ २४ ॥ तुम्बुरु नामक गन्धर्वराजने प्रसन्नतापूर्वक सौ घोड़े भेंट किये, जो आमके पत्तेके समान हरे रंगवाले तथा सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित थे ॥ २४ ॥
कृती राजा च कौरव्य शूकराणां विशाम्पते । अददाद् गजरत्नानां शतानि सुबहून्यथ ॥ २५ ॥
महाराज! शूकरदेशके पुण्यात्मा राजाने कई सौ गजरत्न भेंट किये ॥ २५ ॥ विराटेन तु मत्स्येन बल्यर्थं हेममालिनाम् । कुञ्जराणां सहस्रे द्वे मत्तानां समुपाहृते ॥ २६ ॥ मत्स्यदेशके राजा विराटने सुवर्णमालाओंसे विभूषित दो हजार मतवाले हाथी उपहारके रूपमें दिये ॥ २६ ॥ पांशुराष्ट्राद् वसुदानो राजा षड्विंशतिं गजान् । अश्वानां च सहस्रे द्वे राजन् काञ्चनमालिनाम् ॥ २७ ॥ जवसत्त्वोपपन्नानां वयस्थानां नराधिप । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवेभ्यो न्यवेदयत् ॥ २८ ॥ राजन्! राजा वसुदानने पांशुदेशसे छब्बीस हाथी, वेग और शक्तिसे सम्पन्न दो हजार सुवर्णमालाभूषित जवान घोड़े और सब प्रकारकी दूसरी भेंट-सामग्री भी पाण्डवोंको समर्पित की ॥ २७-२८ ॥ यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश । दासानामयुतं चैव सदाराणां विशाम्पते । गजयुक्ता महाराज रथाः षड्विंशतिस्तथा ॥ २९ ॥ राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थं वै निवेदितम् । राजन्! राजा द्रुपदने चौदह हजार दासियाँ, दस हजार सपत्नीक दास, हाथी जुते हुए छब्बीस रथ तथा अपना सम्पूर्ण राज्य कुन्तीपुत्रोंको यज्ञके लिये समर्पित किया था ॥ वासुदेवोऽपि वार्ष्णेयो मानं कुर्वन् किरीटिनः ॥ ३० ॥ अददाद् गजमुख्यानां सहस्राणि चतुर्दश । आत्मा हि कृष्णः पार्थस्य कृष्णस्यात्मा धनंजयः ॥ ३१ ॥ वृष्णिकुलभूषण वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने भी अर्जुनका आदर करते हुए चौदह हजार उत्तम हाथी दिये। श्रीकृष्ण अर्जुनके आत्मा हैं और अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं ॥ यद् ब्रूयादर्जुनः कृष्णं सर्वं कुर्यादसंशयम् । कृष्णो धनंजयस्यार्थे स्वर्गलोकमपि त्यजेत् ॥ ३२ ॥ अर्जुन श्रीकृष्णसे जो कह देंगे, वह सब वे निःसंदेह पूर्ण करेंगे। श्रीकृष्ण अर्जुनके लिये परमधामको भी त्याग सकते हैं ॥ ३२ ॥ तथैव पार्थः कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत् । सुरभींश्चन्दनरसान् हेमकुम्भसमास्थितान् ॥ ३३ ॥ मलयाद् दर्दुरारच्चैव चन्दनागुरुसंचयान् । इसी प्रकार अर्जुन भी श्रीकृष्णके लिये अपने प्राणोंतकका त्याग कर सकते हैं। मलय तथा दर्दुरपर्वतसे वहाँके राजालोग सोनेके घड़ोंमें रखे हुए सुगन्धित चन्दन-रस तथा चन्दन एवं अगुरुके ढेर भेंटके लिये लेकर आये थे ॥ ३३ १/२ ॥
मणिरत्नानि भास्वन्ति काञ्चनं सूक्ष्मवस्त्रकम् ॥ ३४ ॥
चोलपाण्ड्यावपि द्वारं न लेभाते ह्युपस्थितौ ।
चोल और पाण्ड्यदेशोंके नरेश चमकीले मणि-रत्न, सुवर्ण तथा महीन वस्त्र लेकर उपस्थित हुए थे; परंतु उन्हें भी भीतर जानेके लिये रास्ता नहीं मिला ॥ ३४ १/२ ॥
समुद्रसारं वैदूर्य मुक्तासङ्घांस्तथैव च ॥ ३५ ॥
शतशश्च कुथांस्तत्र सिंहलाः समुपाहरन् ।
सिंहलदेशके क्षत्रियोंने समुद्रका सारभूत वैदूर्य, मोतियोंके ढेर तथा हाथियोंके सैकड़ों झूल अर्पित किये ॥
संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचनाः ॥ ३६ ॥
ता गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ।
प्रीत्यर्थं ब्राह्मणाश्चैव क्षत्रियाश्च विनिर्जिताः ॥ ३७ ॥
उपाजहुर्विशश्चैव शूद्राः शुश्रूषवस्तथा ।
वे सिंहलदेशीय वीर मणियुक्त वस्त्रोंसे अपने शरीरोंको ढके हुए थे। उनके शरीरका रंग काला था और उनकी आँखोंके कोने लाल दिखायी देते थे। उन भेंट-सामग्रियोंको लेकर वे सब लोग दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मण, विजित क्षत्रिय, वैश्य तथा सेवाकी इच्छावाले शूद्र प्रसन्नता-पूर्वक वहाँ उपहार अर्पित करते थे ॥ ३६-३७ १/२ ॥
प्रीत्या च बहुमानाच्चाप्युपागच्छन् युधिष्ठिरम् ॥ ३८ ॥
सर्वे म्लेच्छाः सर्ववर्णा आदिमध्यान्तजास्तथा ।
सभी म्लेच्छ तथा आदि, मध्य और अन्तमें उत्पन्न सभी वर्णके लोग विशेष प्रेम और आदरके साथ युधिष्ठिरके पास भेंट लेकर आये थे ॥ ३८ १/२ ॥
नानादेशसमुत्थैश्च नानाजातिभिरेव च ॥ ३९ ॥
पर्यस्त इव लोकोऽयं युधिष्ठिरनिवेशने ।
अनेक देशोंमें उत्पन्न और विभिन्न जातिके लोगोंके आगमनसे युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें मानो यह सम्पूर्ण लोक ही एकत्र हुआ जान पड़ता था ॥ ३९ १/२ ॥
उच्चावचानुपग्राहान् राजभिः प्रापितान् बहून् ॥ ४० ॥
शत्रूणां पश्यतो दुःखान्मुमूर्षा मे व्यजायत ।
भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि पार्थिव ॥ ४१ ॥
येषामामं च पक्वं च संविधत्ते युधिष्ठिरः ।
मेरे शत्रुओंके घरमें राजाओंद्वारा लाये हुए बहुत-से छोटे-बड़े उपहारोंको देखकर दुःखसे मुझे मरनेकी इच्छा होती थी। राजन्! पाण्डवोंके वहाँ जिन लोगोंका भरण-पोषण होता है, उनकी संख्या मैं आपको बता रहा हूँ। राजा युधिष्ठिर उन सबके लिये कच्चे-पक्के भोजनकी व्यवस्था करते हैं ॥ ४०-४१ १/२ ॥
अयुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहाः ससादिनः ।। ४२ ।।
रथानामर्बुदं चापि पादाता बहवस्तथा ।
युधिष्ठिरके यहाँ तीन पद्म दस हजार हाथीसवार और घुड़सवार, एक अर्बुद (दस करोड़) रथारोही तथा असंख्य पैदल सैनिक हैं ।। ४२ ½ ।।
प्रमीयमाणमामं च पच्यमानं तथैव च ।। ४३ ।।
विसृज्यमानं चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च ।
युधिष्ठिरके यज्ञमें कहीं कच्चा अन्न तौला जा रहा था, कहीं पक रहा था, कहीं परोसा जाता था और कहीं ब्राह्मणोंके पुण्याहवाचनकी ध्वनि सुनायी पड़ती थी ।। ४३ ½ ।।
नाभुक्तवन्तं नापीतं नालङ्कृतमसत्कृतम् ।। ४४ ।।
अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने ।
मैंने युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें सभी वर्णके लोगोंमेंसे किसीको ऐसा नहीं देखा, जो खा-पीकर आभूषणोंसे विभूषित और सत्कृत न हुआ हो ।। ४४ ½ ।।
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।। ४५ ।।
त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ।
राजा युधिष्ठिर घरमें बसनेवाले जिन अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं, उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दास-दासी उपस्थित रहते हैं ।। ४५ ½ ।।
सुप्रीताः परितुष्टाश्च ते ह्याशंसन्त्यरिक्षयम् ।। ४६ ।।
वे सब ब्राह्मण भोजनसे अत्यन्त तृप्त एवं संतुष्ट हो राजा युधिष्ठिरको उनके (काम-क्रोधादि) शत्रुओंके विनाशके लिये आशीर्वाद देते हैं ।। ४६ ।।
दशान्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ।। ४७ ।।
इसी प्रकार युधिष्ठिरके महलमें दूसरे दस हजार ऊर्ध्वरेता यति भी सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ।। ४७ ।।
अभुक्तं भुक्तवद् वापि सर्वमाकुब्जवामनम् । अभुञ्जाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद् विशाम्पते ॥ ४८ ॥ राजन्! उस यज्ञमें द्रौपदी प्रतिदिन स्वयं पहले भोजन न करके इस बातकी देखभाल करती थी कि कुबड़े और बौनोंसे लेकर सब मनुष्योंमें किसने खाया है और किसने अभीतक भोजन नहीं किया है ॥ ४८ ॥ द्वौ करौ न प्रयच्छेतां कुन्तीपुत्राय भारत । सम्बन्धिकेन पञ्चालाः सख्येनान्धकवृष्णयः ॥ ४९ ॥ भारत! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको दो ही कुलके लोग कर नहीं देते थे। सम्बन्धके कारण पांचाल और मित्रताके कारण अन्धक एवं वृष्णि ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन
दुर्योधन उवाच
आर्यास्तु ये वै राजानः सत्यसंधा महाव्रताः ।
पर्याप्तविद्या वक्तारो वेदोक्तावभृथप्लुताः ॥ १ ॥
धृतिमन्तो ह्रीनिषेवा धर्मात्मानो यशस्विनः ।
मूर्धाभिषिक्तास्ते चैनं राजानः पर्युपासते ॥ २ ॥
दक्षिणार्थं समानीता राजभिः कांस्यदोहनाः ।
आरण्या बहुसाहस्रा अपश्यंस्तत्र तत्र गाः ॥ ३ ॥
दुर्योधन बोला— पिताजी! जो राजा आर्य, सत्यप्रतिज्ञ, महाव्रती, विद्वान्, वक्ता, वेदोक्त यज्ञोंके अन्तमें अवभृथ-स्नान करनेवाले, धैर्यवान्, लज्जाशील, धर्मात्मा, यशस्वी तथा मूर्धाभिषिक्त थे, वे सभी इन धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे। राजाओंने दक्षिणामें देनेके लिये जो गौएँ मँगवायी थीं, उन सबको मैंने जहाँ-तहाँ देखा। उनके दुग्धपात्र काँसेके थे। वे सब-की-सब जंगलोंमें खुली चरनेवाली थीं तथा उनकी संख्या कई हजार थी ॥
आजहुस्तत्र सत्कृत्य स्वयमुद्यम्य भारत ।
अभिषेकार्थमव्यग्रा भाण्डमुच्चावचं नृपाः ॥ ४ ॥
बाह्लीको रथमहार्षीज्जाम्बूनदविभूषितम् ।
सुदक्षिणस्तु युयुजे श्वेतैः काम्बोजजैर्हयैः ॥ ५ ॥
भारत! राजालोग युधिष्ठिरके अभिषेकके लिये स्वयं ही प्रयत्न करके शान्तचित्त हो सत्कारपूर्वक छोटे-बड़े पात्र उठा-उठाकर ले आये थे। बाह्लीकनरेश रथ ले आये, जो सुवर्णसे सजाया गया था। सुदक्षिणने उस रथमें काम्बोजदेशके सफेद घोड़े जोत दिये ॥ ४-५ ॥
सुनीथः प्रीतिमांश्चैव ह्यनुकर्षं महाबलः ।
ध्वजं चेदिपतिश्चैवमहार्षीत् स्वयमुद्यतम् ॥ ६ ॥
दाक्षिणात्यः संहननं स्रगुष्णीषे च मागधः ।
वसुदानो महेष्वासो गजेन्द्रं षष्टिहायनम् ॥ ७ ॥
मत्स्यस्त्वक्षान् हेमनद्धानेकव्य उपानहौ ।
आवन्त्यस्त्वभिषेकार्थमापो बहुविधास्तथा ॥ ८ ॥
चेकितान उपासङ्गे धनुः काश्य उपाहरत् ।
असिं च सुत्सरुं शल्यः शैक्यं काञ्चनभूषणम् ॥ ९ ॥
महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान् धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितनाने तूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया ।। ६—९ ।।
अभ्यषिञ्चत् ततो धौम्यो व्यासश्च सुमहातपाः । नारदं च पुरस्कृत्य देवलं चासितं मुनिम् ।। १० ।। तदनन्तर धौम्य तथा महातपस्वी व्यासने देवर्षि नारद, देवल और असित मुनिको आगे करके युधिष्ठिरका अभिषेक किया ।। १० ।।
प्रीतिमन्त उपातिष्ठन्नभिषेकं महर्षयः । जामदग्न्येन सहितास्तथान्ये वेदपारगाः ।। ११ ।। परशुरामजीके साथ वेदके पारंगत दूसरे विद्वान् महर्षियोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा युधिष्ठिरका अभिषेक किया ।। ११ ।।
अभिजग्मुर्महात्मानो मन्त्रवद् भूरिदक्षिणम् । महेन्द्रमिव देवेन्द्रं दिवि सप्तर्षयो यथा ।। १२ ।। जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्रके पास सप्तर्षि पधारते हैं, उसी प्रकार पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले महाराज युधिष्ठिरके पास बहुत-से महात्मा मन्त्रोच्चारण करते हुए पधारे थे ।।
अधारयच्छत्रमस्य सात्यकिः सत्यविक्रमः । धनंजयश्च व्यजने भीमसेनश्च पाण्डवः ।। १३ ।। सत्यपराक्रमी सात्यकिने युधिष्ठिरके लिये छत्र धारण किया तथा अर्जुन और भीमसेनने व्यजन डुलाये ।।
चामरे चापि शुभ्रे द्वे यमौ जगृहतुस्तथा । उपागृह्णाद् यमिन्द्राय पुराकल्पे प्रजापतिः ।। १४ ।। तमस्मै शङ्खमाहार्षीद् वारुणं कलशोदधिः । शैक्यं निष्कसहस्रेण सुकृतं विश्वकर्मणा ।। १५ ।। तेनाभिषिक्तः कृष्णेन तत्र मे कश्मलोऽभवत् । तथा नकुल और सहदेवने दो विशुद्ध चँवर हाथमें ले लिये। पूर्वकालमें प्रजापतिने इन्द्रके लिये जिस शंखको धारण किया था, वही वरुणदेवताका शंख समुद्रने युधिष्ठिरको भेंट किया था। विश्वकर्माने एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे जिस शैक्यपात्र (छींकेपर रखे हुए सुवर्णकलश)-का निर्माण किया था, उसमें स्थित समुद्रजलको शंखमें लेकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरका अभिषेक किया। उस समय वहाँ मुझे मूर्च्छा आ गयी थी ।।
गच्छन्ति पूर्वादपरं समुद्रं चापि दक्षिणम् ॥ १६ ॥ पिताजी! लोग जल लानेके लिये पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक जाते हैं, दक्षिण समुद्रकी भी यात्रा करते हैं ।। उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिभिः । तत्र स्म दध्मुः शतशः शङ्खान् मङ्गलकारकान् ॥ १७ ॥ प्राणदन्त समाध्मातास्ततो रोमाणि मेऽहृषन् । प्रापतन् भूमिपालाश्च ये तु हीनाः स्वतेजसा ॥ १८ ॥ परंतु उत्तर समुद्रतक पक्षियोंके सिवा और कोई नहीं जाता; (किंतु वहाँ भी अर्जुन पहुँच गये।) वहाँ अभिषेकके समय सैकड़ों मंगलकारी शंख एक साथ ही जोर-जोरसे बजने लगे, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ जो तेजोहीन भूपाल थे, वे भयके मारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े ।। १७-१८ ।। धृष्टद्युम्नः पाण्डवाश्च सात्यकिः केशवोऽष्टमः । सत्त्वस्था वीर्यसम्पन्ना ह्यन्योन्यप्रियदर्शनाः ।। १९ ।। धृष्टद्युम्न, पाँचों पाण्डव, सात्यकि और आठवें श्रीकृष्ण—ये ही धैर्यपूर्वक स्थिर रहे। ये सभी पराक्रमसम्पन्न तथा एक-दूसरेका प्रिय करनेवाले हैं ।। १९ ।।
विसंज्ञान् भूमिपान् दृष्ट्वा मां च ते प्राहसंस्तदा । ततः प्रहृष्टो बीभत्सुः प्रादाद्धेमविषाणिनाम् ॥ २० ॥ शतान्यनडुहां पञ्च द्विजमुख्येषु भारत ।
न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च ।। २१ ।।
न च राजा पृथुर्वैन्यो न चाप्यासीद् भगीरथः ।
ययातिर्नहुषो वापि यथा राजा युधिष्ठिरः ।। २२ ।।
वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे।
भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ
था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँट दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु,
न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट् थे,
जैसे कि आज राजा युधिष्ठिर हैं ।। २०—२२ ।।
यथातिमात्रं कौन्तेयः श्रिया परमया युतः ।
राजसूयमवाप्यैवं हरिश्चन्द्र इव प्रभुः ।। २३ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर राजसूययज्ञ पूर्ण करके अत्यन्त उच्चकोटिकी राजलक्ष्मीसे
सम्पन्न हो गये हैं। ये शक्तिशाली महाराज हरिश्चन्द्रकी भाँति सुशोभित होते हैं ।। २३ ।।
एतां दृष्ट्वा श्रियं पार्थे हरिश्चन्द्रे यथा विभो ।
कथं तु जीवितं श्रेयो मम पश्यसि भारत ।। २४ ।।
भारत! हरिश्चन्द्रकी भाँति कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी इस राजलक्ष्मीको देखकर मेरा
जीवित रहना आप किस दृष्टिसे अच्छा समझते हैं? ।। २४ ।।
अन्धेनेव युगं नद्धं विपर्यस्तं नराधिप ।
कनीयांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीयन्त एव च ।। २५ ।।
राजन्! यह युग अंधे विधातासे बँधा हुआ है। इसीलिये इसमें सब बातें उलटी हो रही
हैं। छोटे बढ़ रहे हैं और बड़े हीन दशामें गिरते जा रहे हैं ।। २५ ।।
एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामि शर्म
समीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर ।
तेनाहमेवं कृशतां गतश्च
विवर्णतां चैव सशोकतां च ।। २६ ।।
कुरुप्रवीर! ऐसा देखकर अच्छी तरह विचार करनेपर भी मुझे चैन नहीं पड़ता। इसीसे
मैं दुर्बल, कान्तिहीन और शोकमग्न हो रहा हूँ ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।
५३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक तिरपनवाँ
अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2074)
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं वै ज्येष्ठो ज्यैष्ठिनेयः पुत्र मा पाण्डवान् द्विषः ।
द्वेष्टा ह्यसुखमादत्ते यथैव निधनं तथा ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**दुर्योधन! तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो, जेठी रानीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो। बेटा! पाण्डवोंसे द्वेष मत करो; क्योंकि द्वेष करनेवाला मनुष्य मृत्युके समान कष्ट पाता है॥ १ ॥
अव्युत्पन्नं समानार्थं तुल्यमित्रं युधिष्ठिरम् ।
अद्विषन्तं कथं द्विष्यात् त्वादृशो भरतर्षभ ॥ २ ॥
युधिष्ठिर किसीके साथ छल नहीं करते, उनका धन तुम्हारे ही जैसा है। जो तुम्हारे मित्र हैं, वे उनके भी मित्र हैं और युधिष्ठिर तुमसे कभी द्वेष नहीं करते। भरतकुलतिलक! फिर तुम्हारे-जैसे पुरुषको उनसे द्वेष क्यों करना चाहिये? ॥ २ ॥
तुल्याभिजनवीर्यश्च कथं भ्रातुः श्रियं नृप ।
पुत्र कामयसे मोहान्मैवं भूः शाम्य मा शुचः ॥ ३ ॥
राजन्! तुम्हारा और युधिष्ठिरका कुल एवं पराक्रम एक-सा है। बेटा! तुम मोहवश अपने भाईकी लक्ष्मीकी इच्छा क्यों करते हो? ऐसे अधम न बनो; शान्तभावसे रहो। शोक न करो ॥ ३ ॥
अथ यज्ञविभूतिं तां काङ्क्षसे भरतर्षभ ।
ऋत्विजस्तव तन्वन्तु सप्ततन्तुं महाध्वरम् ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! यदि तुम उस यज्ञ-वैभवको पानेकी अभिलाषा रखते हो तो ऋत्विजलोग तुम्हारे लिये भी गायत्री आदि सात छन्दरूपी तन्तुओंसे युक्त राजसूय महायज्ञका अनुष्ठान करा देंगे ॥ ४ ॥
आहरिष्यन्ति राजानस्तवापि विपुलं धनम् ।
प्रीत्या च बहुमानाच्च रत्नान्याभरणानि च ॥ ५ ॥
उसमें देश-देशके राजालोग तुम्हारे लिये भी बड़े प्रेम और आदरसे रत्न, आभूषण तथा बहुत धन ले आयेंगे ॥ ५ ॥
(मही कामदुघा सा हि वीरपत्नीति चोच्यते ।
तथा वीर्याश्रिता भूमिस्तनुते हि मनोरथम् ॥
तवाप्यस्ति हि चेद् वीर्यं भोक्ष्यसे हि महीमिमाम् ॥)
बेटा! यह पृथ्वी कामधेनु है। इसे वीरपत्नी भी कहते हैं। अपने पराक्रमसे जीती हुई भूमि मनोवांछित फल प्रदान करती है। यदि तुममें भी बल और पराक्रम हो तो तुम इस पृथ्वीका यथेष्ट उपभोग कर सकते हो।
अनार्याचरितं तात परस्वस्पृहणं भृशम् ।
स्वसंतुष्टः स्वधर्मस्थो यः स वै सुखमेधते ॥ ६ ॥
अव्यापारः परार्थेषु नित्योद्योगः स्वकर्मसु ।
रक्षणं समुपात्तानामेतद् वैभवलक्षणम् ॥ ७ ॥
तात! दूसरेके धनकी स्पृहा रखना नीच पुरुषोंका काम है। जो भलीभाँति अपने धनसे संतुष्ट तथा अपने धर्ममें ही स्थित है, वही सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। दूसरेके धनको हड़पनेकी कोई चेष्टा न करना, अपने कर्तव्यको पूरा करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहना और अपनेको जो कुछ प्राप्त है, उसकी रक्षा करना—यही उत्तम वैभवका लक्षण है ॥
विपत्तिष्वव्यथो दक्षो नित्यमुत्थानवान् नरः ।
अप्रमत्तो विनीतात्मा नित्यं भद्राणि पश्यति ॥ ८ ॥
जो विपत्तिमें व्यथित नहीं होता, सदा उद्योगशील बना रहता है, जिसमें प्रमादका अभाव है तथा जिसके हृदयमें विनयरूप सद्गुण है, वह चतुर मनुष्य सदा कल्याण ही देखता है ॥ ८ ॥
बाहूनिवैतान् मा छेत्सीः पाण्डुपुत्रांस्तथैव ते ।
भ्रातॄणां तद्धनार्थं वै मित्रद्रोहं च मा कुरु ॥ ९ ॥
ये पाण्डुपुत्र तुम्हारी भुजाओंके समान हैं, इन्हें काटो मत। इसी प्रकार तुम भाइयोंके धनके लिये मित्रद्रोह न करो ॥ ९ ॥
पाण्डोः पुत्रान् मा द्विष्वेह राजं-
स्तथैव ते भ्रातृधनं समग्रम् ।
मित्रद्रोहे तात महानधर्मः
पितामहा ये तव तेऽपि तेषाम् ॥ १० ॥
राजन्! तुम पाण्डवोंसे द्वेष न करो। वे तुम्हारे भाई हैं और भाइयोंका सारा धन तुम्हारा ही है। तात! मित्रद्रोहसे बहुत बड़ा पाप होता है। देखो, जो तुम्हारे बाप-दादे हैं, वे ही उनके भी हैं ॥ १० ॥
अन्तर्वेद्यां ददद् वित्तं कामाननुभवन् प्रियान् ।
क्रीडन् स्त्रीभिर्निरातङ्कः प्रशाम्य भरतर्षभ ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! तुम यज्ञमें धन दान करो, मनको प्रिय लगनेवाले भोग भोगो और निर्भय होकर स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करते हुए शान्त रहो ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १⅓ श्लोक मिलाकर कुल १२⅓ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 2077)
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना
दुर्योधन उवाच
यस्य नास्ति निजा प्रज्ञा केवलं तु बहुश्रुतः ।
न स जानाति शास्त्रार्थं दर्वी सूपरसानिव ॥ १ ॥
दुर्योधन बोला— पिताजी! जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं है, जिसने केवल बहुत-से शास्त्रोंका श्रवणभर किया है, वह शास्त्रके तात्पर्यको नहीं समझ सकता; ठीक उसी तरह, जैसे कलछी दालके रसको नहीं जानती ॥ १ ॥
जानन् वै मोहयसि मां नावि नौरिव संयता ।
स्वार्थे किं नावधानं ते उताहो द्वेष्टि मां भवान् ॥ २ ॥
एक नौकामें बँधी हुई दूसरी नौकाके समान आप विदुरकी बुद्धिके आश्रित हैं। जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालते हैं, स्वार्थसाधनके लिये क्या आपमें तनिक भी सावधानी नहीं है अथवा आप मुझसे द्वेष रखते हैं? ॥ २ ॥
न सन्तीमे धार्तराष्ट्रा येषां त्वमनुशासिता ।
भविष्यमर्थमाख्यासि सर्वदा कृत्यमात्मनः ॥ ३ ॥
आप जिनके शासक हैं, वे धार्तराष्ट्र नहींके बराबर हैं (क्योंकि आप उन्हें स्वेच्छासे उन्नतिके पथपर बढ़ने नहीं देते)। आप सदा अपने वर्तमान कर्तव्यको भविष्यपर ही टालते रहते हैं ॥ ३ ॥
परनेयोऽग्रणीर्यस्य स मार्गान् प्रति मुह्यति । पन्थानमनुगच्छेयुः कथं तस्य पदानुगाः ॥ ४ ॥ जिस दलका अगुआ दूसरेकी बुद्धिपर चलता हो, वह अपने मार्गमें सदा मोहित होता रहता है। फिर उसके पीछे चलनेवाले लोग अपने मार्गका अनुसरण कैसे कर सकते हैं? ॥ ४ ॥
राजन् परिणतप्रज्ञो वृद्धसेवी जितेन्द्रियः । प्रतिपन्नान् स्वकार्येषु सम्मोहयसि नो भृशम् ॥ ५ ॥ राजन्! आपकी बुद्धि परिपक्व है, आप वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करते रहते हैं, आपने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा ली है, तो भी जब हमलोग अपने कार्योंमें तत्पर होते हैं, उस समय आप हमें बार-बार मोहमें ही डाल देते हैं ॥ ५ ॥
लोकवृत्ताद् राजवृत्तमन्यदाह बृहस्पतिः । तस्माद् राज्ञाप्रमत्तेन स्वार्थश्चिन्त्यः सदैव हि ॥ ६ ॥ क्षत्रियस्य महाराज जये वृत्तिः समाहिता । स वै धर्मस्त्वधर्मो वा स्ववृत्तौ का परीक्षणा ॥ ७ ॥ बृहस्पतिने राज्यव्यवहारको लोकव्यवहारसे भिन्न बताया है; अतः राजाको सावधान होकर सदा अपने प्रयोजनका ही चिन्तन करना चाहिये। महाराज! क्षत्रियकी वृत्ति विजयमें ही लगी रहती है, वह चाहे धर्म हो या अधर्म। अपनी वृत्तिके विषयमें क्या परीक्षा करनी है? ॥ ६-७ ॥
प्रकालयेद् दिशः सर्वाः प्रतोदेनेव सारथिः । प्रत्यमित्रश्रियं दीप्तां जिघृक्षुर्भरतर्षभ ॥ ८ ॥ भरतकुलभूषण! शत्रुके जगमगाती हुई राजलक्ष्मीको अपने अधिकारमें करनेकी इच्छावाला भूपाल सम्पूर्ण दिशाओंका उसी प्रकार संचालन करे, जैसे सारथि चाबुकसे घोड़ोंको हाँककर अपनी रुचिके अनुसार चलाता है ॥
प्रच्छन्नो वा प्रकाशो वा योगो योऽरिं प्रबाधते । तद् वै शस्त्रं शस्त्रविदां न शस्त्रं छेदनं स्मृतम् ॥ ९ ॥ गुप्त या प्रकट, जो उपाय शत्रुको संकटमें डाल दे, वही शस्त्रज्ञ पुरुषोंका शस्त्र है। केवल काटनेवाला शस्त्र ही शस्त्र नहीं है ॥ ९ ॥
शत्रुश्चैव हि मित्रं च न लेख्यं न च मातृका । यो वै संतापयति यं स शत्रुः प्रोच्यते नृप ॥ १० ॥ राजन्! अमुक शत्रु है और अमुक मित्र, इसका कोई लेखा नहीं है और न शत्रु-मित्रसूचक कोई अक्षर ही है। जो जिसको संताप देता है, वही उसका शत्रु कहा जाता है ॥ १० ॥
असंतोषः श्रियो मूलं तस्मात् तं कामयाम्यहम् ।
समुच्छ्रये यो यतते स राजन् परमो नयः ॥ ११ ॥
असंतोष ही लक्ष्मीकी प्राप्तिका मूल कारण है; अतः मैं असंतोष चाहता हूँ। राजन्! जो अपनी उन्नतिके लिये प्रयत्न करता है, उसका वह प्रयत्न ही सर्वोत्तम नीति है ॥
ममत्वं हि न कर्तव्यमैश्वर्ये वा धनेऽपि वा ।
पूर्वावाप्तं हरन्त्यन्ये राजधर्मं हि तं विदुः ॥ १२ ॥
ऐश्वर्य अथवा धनमें ममता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि पहलेके उपार्जित धनको दूसरे लोग बलात् छीन लेते हैं। यही राजधर्म माना गया है ॥ १२ ॥
अद्रोहसमयं कृत्वा चिच्छेद नमुचेः शिरः ।
शक्रः साभिमता तस्य रिपौ वृत्तिः सनातनी ॥ १३ ॥
इन्द्रने नमुचिसे कभी वैर न करनेकी प्रतिज्ञा करके उसपर विश्वास जमाया और मौका देखकर उसका सिर काट लिया। तात! शत्रुके प्रति इसी प्रकारका व्यवहार सदासे होता चला आया है। यह इन्द्रको भी मान्य है ॥ १३ ॥
द्वावेतौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव ।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १४ ॥
जैसे सर्प बिलमें रहनेवाले चूहों आदिको निगल जाता है, उसी प्रकार यह भूमि विरोध न करनेवाले राजा तथा परदेशमें न विचरनेवाले ब्राह्मण (संन्यासी)-को ग्रस लेती है ॥ १४ ॥
नास्ति वै जातितः शत्रुः पुरुषस्य विशाम्पते ।
येन साधारणी वृत्तिः स शत्रुर्नतरो जनः ॥ १५ ॥
नरेश्वर! मनुष्यका जन्मसे कोई शत्रु नहीं होता, जिसके साथ एक-सी जीविका होती है अर्थात् जो लोग एक ही वृत्तिसे जीवननिर्वाह करते हैं, वे ही (ईर्ष्याके कारण) आपसमें एक-दूसरेके शत्रु होते हैं, दूसरे नहीं ॥ १५ ॥
शत्रुपक्षं समृद्ध्यन्तं यो मोहात् समुपेक्षते ।
व्याधिराप्यायित इव तस्य मूलं छिनत्ति सः ॥ १६ ॥
जो निरन्तर बढ़ते हुए शत्रुपक्षकी ओरसे मोहवश उदासीन हो जाता है, बढ़े हुए रोगकी भाँति शत्रु उस उदासीन राजाकी जड़ काट डालता है ॥ १६ ॥
अल्पोऽपि ह्यरिरत्यर्थं वर्धमानः पराक्रमैः ।
वल्मीको मूलज इव ग्रसते वृक्षमन्तिकात् ॥ १७ ॥
जैसे वृक्षकी जड़में उत्पन्न हुई दीमक उसमें लगी रहनेके कारण उस वृक्षको ही खा जाती है, वैसे ही छोटा-सा भी शत्रु यदि पराक्रमसे बहुत बढ़ जाय, तो वह पहलेके प्रबल शत्रुको भी नष्ट कर डालता है ॥ १७ ॥
आजमीढ रिपोर्लक्ष्मीर्मा ते रोचिष्ट भारत ।
एष भारः सत्त्ववतां नयः शिरसि विष्ठितः ॥ १८ ॥