महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2065, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवङ्गाः कलिङ्गा मगधास्ताम्रलिप्ताः सपुण्ड्रकाः । दौवालिकाः सागरकाः पत्रोर्णाः शैशवास्तथा ॥ १८ ॥ कर्णप्रावरणाश्चैव बहवस्तत्र भारत । तत्रस्था द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात् । कृतकालाः सुबलयस्ततो द्वारमवाप्स्यथ ॥ १९ ॥ भारत! वंग, कलिंग, मगध, ताम्रलिप्त, पुण्ड्रक, दौवालिक, सागरक, पत्रोर्ण, शैशव तथा कर्णप्रावरण आदि बहुत-से क्षत्रियनरेश वहाँ दरवाजेपर खड़े थे तथा राजाज्ञासे द्वारपालगण उन सबको यह संदेश देते थे कि आपलोग अपने लिये समय निश्चित कर लें। फिर उत्तम भेंट-सामग्री अर्पित करें। इसके बाद आपलोगोंको भीतर जानेका मार्ग मिल सकेगा ॥ १८-१९ ॥
ईषादन्तान् हेमकक्षान् पद्मवर्णान् कुथावृतान् । शैलाभान् नित्यमत्तांश्चाप्यभितः काम्यकं सरः ॥ २० ॥ दत्त्वैकैको दश शतान् कुञ्जरान् कवचावृतान् । क्षमावन्तः कुलीनाश्च द्वारेण प्राविशंस्तदा ॥ २१ ॥ तदनन्तर एक-एक क्षमाशील और कुलीन राजाने काम्यक सरोवरके निकट उत्पन्न हुए एक-एक हजार हाथियोंकी भेंट देकर द्वारके भीतर प्रवेश किया। उन हाथियोंके दाँत हलदण्डके समान लंबे थे। उनको बाँधनेकी रस्सी सोनेकी बनी हुई थी। उन हाथियोंका रंग कमलके समान सफेद था। उनकी पीठपर झूल पड़ा हुआ था। वे देखनेमें पर्वताकार और उन्मत्त प्रतीत होते थे ॥ २०-२१ ॥
एते चान्ये च बहवो गणा दिग्भ्यः समागताः । अन्यैश्चोपाहृतान्यत्र रत्नानीह महात्मभिः ॥ २२ ॥ ये तथा और भी बहुत-से भूपालगण अनेक दिशाओंसे भेंट लेकर आये थे। दूसरे-दूसरे महामना नरेशोंने भी वहाँ रत्नोंकी भेंट अर्पित की थी ॥ २२ ॥
राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुगः । शतानि चत्वार्यददद्धयानां वातरंहसाम् ॥ २३ ॥ इन्द्रके अनुगामी गन्धर्वराज चित्ररथने चार सौ दिव्य अश्व दिये, जो वायुके समान वेगशाली थे ॥ २३ ॥
तुम्बुरुस्तु प्रमुदितो गन्धर्वो वाजिनां शतम् । आम्रपत्रसवर्णानामददाद्धेममालिनाम् ॥ २४ ॥ तुम्बुरु नामक गन्धर्वराजने प्रसन्नतापूर्वक सौ घोड़े भेंट किये, जो आमके पत्तेके समान हरे रंगवाले तथा सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित थे ॥ २४ ॥
कृती राजा च कौरव्य शूकराणां विशाम्पते । अददाद् गजरत्नानां शतानि सुबहून्यथ ॥ २५ ॥