महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! शूकरदेशके पुण्यात्मा राजाने कई सौ गजरत्न भेंट किये ॥ २५ ॥ विराटेन तु मत्स्येन बल्यर्थं हेममालिनाम् । कुञ्जराणां सहस्रे द्वे मत्तानां समुपाहृते ॥ २६ ॥ मत्स्यदेशके राजा विराटने सुवर्णमालाओंसे विभूषित दो हजार मतवाले हाथी उपहारके रूपमें दिये ॥ २६ ॥ पांशुराष्ट्राद् वसुदानो राजा षड्विंशतिं गजान् । अश्वानां च सहस्रे द्वे राजन् काञ्चनमालिनाम् ॥ २७ ॥ जवसत्त्वोपपन्नानां वयस्थानां नराधिप । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवेभ्यो न्यवेदयत् ॥ २८ ॥ राजन्! राजा वसुदानने पांशुदेशसे छब्बीस हाथी, वेग और शक्तिसे सम्पन्न दो हजार सुवर्णमालाभूषित जवान घोड़े और सब प्रकारकी दूसरी भेंट-सामग्री भी पाण्डवोंको समर्पित की ॥ २७-२८ ॥ यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश । दासानामयुतं चैव सदाराणां विशाम्पते । गजयुक्ता महाराज रथाः षड्विंशतिस्तथा ॥ २९ ॥ राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थं वै निवेदितम् । राजन्! राजा द्रुपदने चौदह हजार दासियाँ, दस हजार सपत्नीक दास, हाथी जुते हुए छब्बीस रथ तथा अपना सम्पूर्ण राज्य कुन्तीपुत्रोंको यज्ञके लिये समर्पित किया था ॥ वासुदेवोऽपि वार्ष्णेयो मानं कुर्वन् किरीटिनः ॥ ३० ॥ अददाद् गजमुख्यानां सहस्राणि चतुर्दश । आत्मा हि कृष्णः पार्थस्य कृष्णस्यात्मा धनंजयः ॥ ३१ ॥ वृष्णिकुलभूषण वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने भी अर्जुनका आदर करते हुए चौदह हजार उत्तम हाथी दिये। श्रीकृष्ण अर्जुनके आत्मा हैं और अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं ॥ यद् ब्रूयादर्जुनः कृष्णं सर्वं कुर्यादसंशयम् । कृष्णो धनंजयस्यार्थे स्वर्गलोकमपि त्यजेत् ॥ ३२ ॥ अर्जुन श्रीकृष्णसे जो कह देंगे, वह सब वे निःसंदेह पूर्ण करेंगे। श्रीकृष्ण अर्जुनके लिये परमधामको भी त्याग सकते हैं ॥ ३२ ॥ तथैव पार्थः कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत् । सुरभींश्चन्दनरसान् हेमकुम्भसमास्थितान् ॥ ३३ ॥ मलयाद् दर्दुरारच्चैव चन्दनागुरुसंचयान् । इसी प्रकार अर्जुन भी श्रीकृष्णके लिये अपने प्राणोंतकका त्याग कर सकते हैं। मलय तथा दर्दुरपर्वतसे वहाँके राजालोग सोनेके घड़ोंमें रखे हुए सुगन्धित चन्दन-रस तथा चन्दन एवं अगुरुके ढेर भेंटके लिये लेकर आये थे ॥ ३३ १/२ ॥