भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2067

मणिरत्नानि भास्वन्ति काञ्चनं सूक्ष्मवस्त्रकम् ॥ ३४ ॥
चोलपाण्ड्यावपि द्वारं न लेभाते ह्युपस्थितौ ।
चोल और पाण्ड्यदेशोंके नरेश चमकीले मणि-रत्न, सुवर्ण तथा महीन वस्त्र लेकर उपस्थित हुए थे; परंतु उन्हें भी भीतर जानेके लिये रास्ता नहीं मिला ॥ ३४ १/२ ॥

समुद्रसारं वैदूर्य मुक्तासङ्घांस्तथैव च ॥ ३५ ॥
शतशश्च कुथांस्तत्र सिंहलाः समुपाहरन् ।
सिंहलदेशके क्षत्रियोंने समुद्रका सारभूत वैदूर्य, मोतियोंके ढेर तथा हाथियोंके सैकड़ों झूल अर्पित किये ॥

संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचनाः ॥ ३६ ॥
ता गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ।
प्रीत्यर्थं ब्राह्मणाश्चैव क्षत्रियाश्च विनिर्जिताः ॥ ३७ ॥
उपाजहुर्विशश्चैव शूद्राः शुश्रूषवस्तथा ।
वे सिंहलदेशीय वीर मणियुक्त वस्त्रोंसे अपने शरीरोंको ढके हुए थे। उनके शरीरका रंग काला था और उनकी आँखोंके कोने लाल दिखायी देते थे। उन भेंट-सामग्रियोंको लेकर वे सब लोग दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मण, विजित क्षत्रिय, वैश्य तथा सेवाकी इच्छावाले शूद्र प्रसन्नता-पूर्वक वहाँ उपहार अर्पित करते थे ॥ ३६-३७ १/२ ॥

प्रीत्या च बहुमानाच्चाप्युपागच्छन् युधिष्ठिरम् ॥ ३८ ॥
सर्वे म्लेच्छाः सर्ववर्णा आदिमध्यान्तजास्तथा ।
सभी म्लेच्छ तथा आदि, मध्य और अन्तमें उत्पन्न सभी वर्णके लोग विशेष प्रेम और आदरके साथ युधिष्ठिरके पास भेंट लेकर आये थे ॥ ३८ १/२ ॥

नानादेशसमुत्थैश्च नानाजातिभिरेव च ॥ ३९ ॥
पर्यस्त इव लोकोऽयं युधिष्ठिरनिवेशने ।
अनेक देशोंमें उत्पन्न और विभिन्न जातिके लोगोंके आगमनसे युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें मानो यह सम्पूर्ण लोक ही एकत्र हुआ जान पड़ता था ॥ ३९ १/२ ॥

उच्चावचानुपग्राहान् राजभिः प्रापितान् बहून् ॥ ४० ॥
शत्रूणां पश्यतो दुःखान्मुमूर्षा मे व्यजायत ।
भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि पार्थिव ॥ ४१ ॥
येषामामं च पक्वं च संविधत्ते युधिष्ठिरः ।
मेरे शत्रुओंके घरमें राजाओंद्वारा लाये हुए बहुत-से छोटे-बड़े उपहारोंको देखकर दुःखसे मुझे मरनेकी इच्छा होती थी। राजन्! पाण्डवोंके वहाँ जिन लोगोंका भरण-पोषण होता है, उनकी संख्या मैं आपको बता रहा हूँ। राजा युधिष्ठिर उन सबके लिये कच्चे-पक्के भोजनकी व्यवस्था करते हैं ॥ ४०-४१ १/२ ॥