भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2068

अयुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहाः ससादिनः ।। ४२ ।।
रथानामर्बुदं चापि पादाता बहवस्तथा ।
युधिष्ठिरके यहाँ तीन पद्म दस हजार हाथीसवार और घुड़सवार, एक अर्बुद (दस करोड़) रथारोही तथा असंख्य पैदल सैनिक हैं ।। ४२ ½ ।।
प्रमीयमाणमामं च पच्यमानं तथैव च ।। ४३ ।।
विसृज्यमानं चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च ।
युधिष्ठिरके यज्ञमें कहीं कच्चा अन्न तौला जा रहा था, कहीं पक रहा था, कहीं परोसा जाता था और कहीं ब्राह्मणोंके पुण्याहवाचनकी ध्वनि सुनायी पड़ती थी ।। ४३ ½ ।।
नाभुक्तवन्तं नापीतं नालङ्कृतमसत्कृतम् ।। ४४ ।।
अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने ।
मैंने युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें सभी वर्णके लोगोंमेंसे किसीको ऐसा नहीं देखा, जो खा-पीकर आभूषणोंसे विभूषित और सत्कृत न हुआ हो ।। ४४ ½ ।।
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।। ४५ ।।
त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ।
राजा युधिष्ठिर घरमें बसनेवाले जिन अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं, उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दास-दासी उपस्थित रहते हैं ।। ४५ ½ ।।
सुप्रीताः परितुष्टाश्च ते ह्याशंसन्त्यरिक्षयम् ।। ४६ ।।
वे सब ब्राह्मण भोजनसे अत्यन्त तृप्त एवं संतुष्ट हो राजा युधिष्ठिरको उनके (काम-क्रोधादि) शत्रुओंके विनाशके लिये आशीर्वाद देते हैं ।। ४६ ।।
दशान्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ।। ४७ ।।
इसी प्रकार युधिष्ठिरके महलमें दूसरे दस हजार ऊर्ध्वरेता यति भी सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ।। ४७ ।।