महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अयुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहाः ससादिनः ।। ४२ ।।
रथानामर्बुदं चापि पादाता बहवस्तथा ।
युधिष्ठिरके यहाँ तीन पद्म दस हजार हाथीसवार और घुड़सवार, एक अर्बुद (दस करोड़) रथारोही तथा असंख्य पैदल सैनिक हैं ।। ४२ ½ ।।
प्रमीयमाणमामं च पच्यमानं तथैव च ।। ४३ ।।
विसृज्यमानं चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च ।
युधिष्ठिरके यज्ञमें कहीं कच्चा अन्न तौला जा रहा था, कहीं पक रहा था, कहीं परोसा जाता था और कहीं ब्राह्मणोंके पुण्याहवाचनकी ध्वनि सुनायी पड़ती थी ।। ४३ ½ ।।
नाभुक्तवन्तं नापीतं नालङ्कृतमसत्कृतम् ।। ४४ ।।
अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने ।
मैंने युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें सभी वर्णके लोगोंमेंसे किसीको ऐसा नहीं देखा, जो खा-पीकर आभूषणोंसे विभूषित और सत्कृत न हुआ हो ।। ४४ ½ ।।
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।। ४५ ।।
त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः ।
राजा युधिष्ठिर घरमें बसनेवाले जिन अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं, उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दास-दासी उपस्थित रहते हैं ।। ४५ ½ ।।
सुप्रीताः परितुष्टाश्च ते ह्याशंसन्त्यरिक्षयम् ।। ४६ ।।
वे सब ब्राह्मण भोजनसे अत्यन्त तृप्त एवं संतुष्ट हो राजा युधिष्ठिरको उनके (काम-क्रोधादि) शत्रुओंके विनाशके लिये आशीर्वाद देते हैं ।। ४६ ।।
दशान्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ।। ४७ ।।
इसी प्रकार युधिष्ठिरके महलमें दूसरे दस हजार ऊर्ध्वरेता यति भी सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ।। ४७ ।।
अभुक्तं भुक्तवद् वापि सर्वमाकुब्जवामनम् । अभुञ्जाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद् विशाम्पते ॥ ४८ ॥ राजन्! उस यज्ञमें द्रौपदी प्रतिदिन स्वयं पहले भोजन न करके इस बातकी देखभाल करती थी कि कुबड़े और बौनोंसे लेकर सब मनुष्योंमें किसने खाया है और किसने अभीतक भोजन नहीं किया है ॥ ४८ ॥ द्वौ करौ न प्रयच्छेतां कुन्तीपुत्राय भारत । सम्बन्धिकेन पञ्चालाः सख्येनान्धकवृष्णयः ॥ ४९ ॥ भारत! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको दो ही कुलके लोग कर नहीं देते थे। सम्बन्धके कारण पांचाल और मित्रताके कारण अन्धक एवं वृष्णि ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन
दुर्योधन उवाच
आर्यास्तु ये वै राजानः सत्यसंधा महाव्रताः ।
पर्याप्तविद्या वक्तारो वेदोक्तावभृथप्लुताः ॥ १ ॥
धृतिमन्तो ह्रीनिषेवा धर्मात्मानो यशस्विनः ।
मूर्धाभिषिक्तास्ते चैनं राजानः पर्युपासते ॥ २ ॥
दक्षिणार्थं समानीता राजभिः कांस्यदोहनाः ।
आरण्या बहुसाहस्रा अपश्यंस्तत्र तत्र गाः ॥ ३ ॥
दुर्योधन बोला— पिताजी! जो राजा आर्य, सत्यप्रतिज्ञ, महाव्रती, विद्वान्, वक्ता, वेदोक्त यज्ञोंके अन्तमें अवभृथ-स्नान करनेवाले, धैर्यवान्, लज्जाशील, धर्मात्मा, यशस्वी तथा मूर्धाभिषिक्त थे, वे सभी इन धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे। राजाओंने दक्षिणामें देनेके लिये जो गौएँ मँगवायी थीं, उन सबको मैंने जहाँ-तहाँ देखा। उनके दुग्धपात्र काँसेके थे। वे सब-की-सब जंगलोंमें खुली चरनेवाली थीं तथा उनकी संख्या कई हजार थी ॥
आजहुस्तत्र सत्कृत्य स्वयमुद्यम्य भारत ।
अभिषेकार्थमव्यग्रा भाण्डमुच्चावचं नृपाः ॥ ४ ॥
बाह्लीको रथमहार्षीज्जाम्बूनदविभूषितम् ।
सुदक्षिणस्तु युयुजे श्वेतैः काम्बोजजैर्हयैः ॥ ५ ॥
भारत! राजालोग युधिष्ठिरके अभिषेकके लिये स्वयं ही प्रयत्न करके शान्तचित्त हो सत्कारपूर्वक छोटे-बड़े पात्र उठा-उठाकर ले आये थे। बाह्लीकनरेश रथ ले आये, जो सुवर्णसे सजाया गया था। सुदक्षिणने उस रथमें काम्बोजदेशके सफेद घोड़े जोत दिये ॥ ४-५ ॥
सुनीथः प्रीतिमांश्चैव ह्यनुकर्षं महाबलः ।
ध्वजं चेदिपतिश्चैवमहार्षीत् स्वयमुद्यतम् ॥ ६ ॥
दाक्षिणात्यः संहननं स्रगुष्णीषे च मागधः ।
वसुदानो महेष्वासो गजेन्द्रं षष्टिहायनम् ॥ ७ ॥
मत्स्यस्त्वक्षान् हेमनद्धानेकव्य उपानहौ ।
आवन्त्यस्त्वभिषेकार्थमापो बहुविधास्तथा ॥ ८ ॥
चेकितान उपासङ्गे धनुः काश्य उपाहरत् ।
असिं च सुत्सरुं शल्यः शैक्यं काञ्चनभूषणम् ॥ ९ ॥
महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान् धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितनाने तूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया ।। ६—९ ।।
अभ्यषिञ्चत् ततो धौम्यो व्यासश्च सुमहातपाः । नारदं च पुरस्कृत्य देवलं चासितं मुनिम् ।। १० ।। तदनन्तर धौम्य तथा महातपस्वी व्यासने देवर्षि नारद, देवल और असित मुनिको आगे करके युधिष्ठिरका अभिषेक किया ।। १० ।।
प्रीतिमन्त उपातिष्ठन्नभिषेकं महर्षयः । जामदग्न्येन सहितास्तथान्ये वेदपारगाः ।। ११ ।। परशुरामजीके साथ वेदके पारंगत दूसरे विद्वान् महर्षियोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा युधिष्ठिरका अभिषेक किया ।। ११ ।।
अभिजग्मुर्महात्मानो मन्त्रवद् भूरिदक्षिणम् । महेन्द्रमिव देवेन्द्रं दिवि सप्तर्षयो यथा ।। १२ ।। जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्रके पास सप्तर्षि पधारते हैं, उसी प्रकार पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले महाराज युधिष्ठिरके पास बहुत-से महात्मा मन्त्रोच्चारण करते हुए पधारे थे ।।
अधारयच्छत्रमस्य सात्यकिः सत्यविक्रमः । धनंजयश्च व्यजने भीमसेनश्च पाण्डवः ।। १३ ।। सत्यपराक्रमी सात्यकिने युधिष्ठिरके लिये छत्र धारण किया तथा अर्जुन और भीमसेनने व्यजन डुलाये ।।
चामरे चापि शुभ्रे द्वे यमौ जगृहतुस्तथा । उपागृह्णाद् यमिन्द्राय पुराकल्पे प्रजापतिः ।। १४ ।। तमस्मै शङ्खमाहार्षीद् वारुणं कलशोदधिः । शैक्यं निष्कसहस्रेण सुकृतं विश्वकर्मणा ।। १५ ।। तेनाभिषिक्तः कृष्णेन तत्र मे कश्मलोऽभवत् । तथा नकुल और सहदेवने दो विशुद्ध चँवर हाथमें ले लिये। पूर्वकालमें प्रजापतिने इन्द्रके लिये जिस शंखको धारण किया था, वही वरुणदेवताका शंख समुद्रने युधिष्ठिरको भेंट किया था। विश्वकर्माने एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे जिस शैक्यपात्र (छींकेपर रखे हुए सुवर्णकलश)-का निर्माण किया था, उसमें स्थित समुद्रजलको शंखमें लेकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरका अभिषेक किया। उस समय वहाँ मुझे मूर्च्छा आ गयी थी ।।
गच्छन्ति पूर्वादपरं समुद्रं चापि दक्षिणम् ॥ १६ ॥ पिताजी! लोग जल लानेके लिये पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक जाते हैं, दक्षिण समुद्रकी भी यात्रा करते हैं ।। उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिभिः । तत्र स्म दध्मुः शतशः शङ्खान् मङ्गलकारकान् ॥ १७ ॥ प्राणदन्त समाध्मातास्ततो रोमाणि मेऽहृषन् । प्रापतन् भूमिपालाश्च ये तु हीनाः स्वतेजसा ॥ १८ ॥ परंतु उत्तर समुद्रतक पक्षियोंके सिवा और कोई नहीं जाता; (किंतु वहाँ भी अर्जुन पहुँच गये।) वहाँ अभिषेकके समय सैकड़ों मंगलकारी शंख एक साथ ही जोर-जोरसे बजने लगे, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ जो तेजोहीन भूपाल थे, वे भयके मारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े ।। १७-१८ ।। धृष्टद्युम्नः पाण्डवाश्च सात्यकिः केशवोऽष्टमः । सत्त्वस्था वीर्यसम्पन्ना ह्यन्योन्यप्रियदर्शनाः ।। १९ ।। धृष्टद्युम्न, पाँचों पाण्डव, सात्यकि और आठवें श्रीकृष्ण—ये ही धैर्यपूर्वक स्थिर रहे। ये सभी पराक्रमसम्पन्न तथा एक-दूसरेका प्रिय करनेवाले हैं ।। १९ ।।
विसंज्ञान् भूमिपान् दृष्ट्वा मां च ते प्राहसंस्तदा । ततः प्रहृष्टो बीभत्सुः प्रादाद्धेमविषाणिनाम् ॥ २० ॥ शतान्यनडुहां पञ्च द्विजमुख्येषु भारत ।
न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च ।। २१ ।।
न च राजा पृथुर्वैन्यो न चाप्यासीद् भगीरथः ।
ययातिर्नहुषो वापि यथा राजा युधिष्ठिरः ।। २२ ।।
वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे।
भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ
था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँट दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु,
न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट् थे,
जैसे कि आज राजा युधिष्ठिर हैं ।। २०—२२ ।।
यथातिमात्रं कौन्तेयः श्रिया परमया युतः ।
राजसूयमवाप्यैवं हरिश्चन्द्र इव प्रभुः ।। २३ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर राजसूययज्ञ पूर्ण करके अत्यन्त उच्चकोटिकी राजलक्ष्मीसे
सम्पन्न हो गये हैं। ये शक्तिशाली महाराज हरिश्चन्द्रकी भाँति सुशोभित होते हैं ।। २३ ।।
एतां दृष्ट्वा श्रियं पार्थे हरिश्चन्द्रे यथा विभो ।
कथं तु जीवितं श्रेयो मम पश्यसि भारत ।। २४ ।।
भारत! हरिश्चन्द्रकी भाँति कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी इस राजलक्ष्मीको देखकर मेरा
जीवित रहना आप किस दृष्टिसे अच्छा समझते हैं? ।। २४ ।।
अन्धेनेव युगं नद्धं विपर्यस्तं नराधिप ।
कनीयांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीयन्त एव च ।। २५ ।।
राजन्! यह युग अंधे विधातासे बँधा हुआ है। इसीलिये इसमें सब बातें उलटी हो रही
हैं। छोटे बढ़ रहे हैं और बड़े हीन दशामें गिरते जा रहे हैं ।। २५ ।।
एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामि शर्म
समीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर ।
तेनाहमेवं कृशतां गतश्च
विवर्णतां चैव सशोकतां च ।। २६ ।।
कुरुप्रवीर! ऐसा देखकर अच्छी तरह विचार करनेपर भी मुझे चैन नहीं पड़ता। इसीसे
मैं दुर्बल, कान्तिहीन और शोकमग्न हो रहा हूँ ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।
५३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक तिरपनवाँ
अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2074)
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं वै ज्येष्ठो ज्यैष्ठिनेयः पुत्र मा पाण्डवान् द्विषः ।
द्वेष्टा ह्यसुखमादत्ते यथैव निधनं तथा ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**दुर्योधन! तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो, जेठी रानीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो। बेटा! पाण्डवोंसे द्वेष मत करो; क्योंकि द्वेष करनेवाला मनुष्य मृत्युके समान कष्ट पाता है॥ १ ॥
अव्युत्पन्नं समानार्थं तुल्यमित्रं युधिष्ठिरम् ।
अद्विषन्तं कथं द्विष्यात् त्वादृशो भरतर्षभ ॥ २ ॥
युधिष्ठिर किसीके साथ छल नहीं करते, उनका धन तुम्हारे ही जैसा है। जो तुम्हारे मित्र हैं, वे उनके भी मित्र हैं और युधिष्ठिर तुमसे कभी द्वेष नहीं करते। भरतकुलतिलक! फिर तुम्हारे-जैसे पुरुषको उनसे द्वेष क्यों करना चाहिये? ॥ २ ॥
तुल्याभिजनवीर्यश्च कथं भ्रातुः श्रियं नृप ।
पुत्र कामयसे मोहान्मैवं भूः शाम्य मा शुचः ॥ ३ ॥
राजन्! तुम्हारा और युधिष्ठिरका कुल एवं पराक्रम एक-सा है। बेटा! तुम मोहवश अपने भाईकी लक्ष्मीकी इच्छा क्यों करते हो? ऐसे अधम न बनो; शान्तभावसे रहो। शोक न करो ॥ ३ ॥
अथ यज्ञविभूतिं तां काङ्क्षसे भरतर्षभ ।
ऋत्विजस्तव तन्वन्तु सप्ततन्तुं महाध्वरम् ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! यदि तुम उस यज्ञ-वैभवको पानेकी अभिलाषा रखते हो तो ऋत्विजलोग तुम्हारे लिये भी गायत्री आदि सात छन्दरूपी तन्तुओंसे युक्त राजसूय महायज्ञका अनुष्ठान करा देंगे ॥ ४ ॥
आहरिष्यन्ति राजानस्तवापि विपुलं धनम् ।
प्रीत्या च बहुमानाच्च रत्नान्याभरणानि च ॥ ५ ॥
उसमें देश-देशके राजालोग तुम्हारे लिये भी बड़े प्रेम और आदरसे रत्न, आभूषण तथा बहुत धन ले आयेंगे ॥ ५ ॥
(मही कामदुघा सा हि वीरपत्नीति चोच्यते ।
तथा वीर्याश्रिता भूमिस्तनुते हि मनोरथम् ॥
तवाप्यस्ति हि चेद् वीर्यं भोक्ष्यसे हि महीमिमाम् ॥)
बेटा! यह पृथ्वी कामधेनु है। इसे वीरपत्नी भी कहते हैं। अपने पराक्रमसे जीती हुई भूमि मनोवांछित फल प्रदान करती है। यदि तुममें भी बल और पराक्रम हो तो तुम इस पृथ्वीका यथेष्ट उपभोग कर सकते हो।
अनार्याचरितं तात परस्वस्पृहणं भृशम् ।
स्वसंतुष्टः स्वधर्मस्थो यः स वै सुखमेधते ॥ ६ ॥
अव्यापारः परार्थेषु नित्योद्योगः स्वकर्मसु ।
रक्षणं समुपात्तानामेतद् वैभवलक्षणम् ॥ ७ ॥
तात! दूसरेके धनकी स्पृहा रखना नीच पुरुषोंका काम है। जो भलीभाँति अपने धनसे संतुष्ट तथा अपने धर्ममें ही स्थित है, वही सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। दूसरेके धनको हड़पनेकी कोई चेष्टा न करना, अपने कर्तव्यको पूरा करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहना और अपनेको जो कुछ प्राप्त है, उसकी रक्षा करना—यही उत्तम वैभवका लक्षण है ॥
विपत्तिष्वव्यथो दक्षो नित्यमुत्थानवान् नरः ।
अप्रमत्तो विनीतात्मा नित्यं भद्राणि पश्यति ॥ ८ ॥
जो विपत्तिमें व्यथित नहीं होता, सदा उद्योगशील बना रहता है, जिसमें प्रमादका अभाव है तथा जिसके हृदयमें विनयरूप सद्गुण है, वह चतुर मनुष्य सदा कल्याण ही देखता है ॥ ८ ॥
बाहूनिवैतान् मा छेत्सीः पाण्डुपुत्रांस्तथैव ते ।
भ्रातॄणां तद्धनार्थं वै मित्रद्रोहं च मा कुरु ॥ ९ ॥
ये पाण्डुपुत्र तुम्हारी भुजाओंके समान हैं, इन्हें काटो मत। इसी प्रकार तुम भाइयोंके धनके लिये मित्रद्रोह न करो ॥ ९ ॥
पाण्डोः पुत्रान् मा द्विष्वेह राजं-
स्तथैव ते भ्रातृधनं समग्रम् ।
मित्रद्रोहे तात महानधर्मः
पितामहा ये तव तेऽपि तेषाम् ॥ १० ॥
राजन्! तुम पाण्डवोंसे द्वेष न करो। वे तुम्हारे भाई हैं और भाइयोंका सारा धन तुम्हारा ही है। तात! मित्रद्रोहसे बहुत बड़ा पाप होता है। देखो, जो तुम्हारे बाप-दादे हैं, वे ही उनके भी हैं ॥ १० ॥
अन्तर्वेद्यां ददद् वित्तं कामाननुभवन् प्रियान् ।
क्रीडन् स्त्रीभिर्निरातङ्कः प्रशाम्य भरतर्षभ ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! तुम यज्ञमें धन दान करो, मनको प्रिय लगनेवाले भोग भोगो और निर्भय होकर स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करते हुए शान्त रहो ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १⅓ श्लोक मिलाकर कुल १२⅓ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 2077)
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना
दुर्योधन उवाच
यस्य नास्ति निजा प्रज्ञा केवलं तु बहुश्रुतः ।
न स जानाति शास्त्रार्थं दर्वी सूपरसानिव ॥ १ ॥
दुर्योधन बोला— पिताजी! जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं है, जिसने केवल बहुत-से शास्त्रोंका श्रवणभर किया है, वह शास्त्रके तात्पर्यको नहीं समझ सकता; ठीक उसी तरह, जैसे कलछी दालके रसको नहीं जानती ॥ १ ॥
जानन् वै मोहयसि मां नावि नौरिव संयता ।
स्वार्थे किं नावधानं ते उताहो द्वेष्टि मां भवान् ॥ २ ॥
एक नौकामें बँधी हुई दूसरी नौकाके समान आप विदुरकी बुद्धिके आश्रित हैं। जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालते हैं, स्वार्थसाधनके लिये क्या आपमें तनिक भी सावधानी नहीं है अथवा आप मुझसे द्वेष रखते हैं? ॥ २ ॥
न सन्तीमे धार्तराष्ट्रा येषां त्वमनुशासिता ।
भविष्यमर्थमाख्यासि सर्वदा कृत्यमात्मनः ॥ ३ ॥
आप जिनके शासक हैं, वे धार्तराष्ट्र नहींके बराबर हैं (क्योंकि आप उन्हें स्वेच्छासे उन्नतिके पथपर बढ़ने नहीं देते)। आप सदा अपने वर्तमान कर्तव्यको भविष्यपर ही टालते रहते हैं ॥ ३ ॥
परनेयोऽग्रणीर्यस्य स मार्गान् प्रति मुह्यति । पन्थानमनुगच्छेयुः कथं तस्य पदानुगाः ॥ ४ ॥ जिस दलका अगुआ दूसरेकी बुद्धिपर चलता हो, वह अपने मार्गमें सदा मोहित होता रहता है। फिर उसके पीछे चलनेवाले लोग अपने मार्गका अनुसरण कैसे कर सकते हैं? ॥ ४ ॥
राजन् परिणतप्रज्ञो वृद्धसेवी जितेन्द्रियः । प्रतिपन्नान् स्वकार्येषु सम्मोहयसि नो भृशम् ॥ ५ ॥ राजन्! आपकी बुद्धि परिपक्व है, आप वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करते रहते हैं, आपने अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा ली है, तो भी जब हमलोग अपने कार्योंमें तत्पर होते हैं, उस समय आप हमें बार-बार मोहमें ही डाल देते हैं ॥ ५ ॥
लोकवृत्ताद् राजवृत्तमन्यदाह बृहस्पतिः । तस्माद् राज्ञाप्रमत्तेन स्वार्थश्चिन्त्यः सदैव हि ॥ ६ ॥ क्षत्रियस्य महाराज जये वृत्तिः समाहिता । स वै धर्मस्त्वधर्मो वा स्ववृत्तौ का परीक्षणा ॥ ७ ॥ बृहस्पतिने राज्यव्यवहारको लोकव्यवहारसे भिन्न बताया है; अतः राजाको सावधान होकर सदा अपने प्रयोजनका ही चिन्तन करना चाहिये। महाराज! क्षत्रियकी वृत्ति विजयमें ही लगी रहती है, वह चाहे धर्म हो या अधर्म। अपनी वृत्तिके विषयमें क्या परीक्षा करनी है? ॥ ६-७ ॥
प्रकालयेद् दिशः सर्वाः प्रतोदेनेव सारथिः । प्रत्यमित्रश्रियं दीप्तां जिघृक्षुर्भरतर्षभ ॥ ८ ॥ भरतकुलभूषण! शत्रुके जगमगाती हुई राजलक्ष्मीको अपने अधिकारमें करनेकी इच्छावाला भूपाल सम्पूर्ण दिशाओंका उसी प्रकार संचालन करे, जैसे सारथि चाबुकसे घोड़ोंको हाँककर अपनी रुचिके अनुसार चलाता है ॥
प्रच्छन्नो वा प्रकाशो वा योगो योऽरिं प्रबाधते । तद् वै शस्त्रं शस्त्रविदां न शस्त्रं छेदनं स्मृतम् ॥ ९ ॥ गुप्त या प्रकट, जो उपाय शत्रुको संकटमें डाल दे, वही शस्त्रज्ञ पुरुषोंका शस्त्र है। केवल काटनेवाला शस्त्र ही शस्त्र नहीं है ॥ ९ ॥
शत्रुश्चैव हि मित्रं च न लेख्यं न च मातृका । यो वै संतापयति यं स शत्रुः प्रोच्यते नृप ॥ १० ॥ राजन्! अमुक शत्रु है और अमुक मित्र, इसका कोई लेखा नहीं है और न शत्रु-मित्रसूचक कोई अक्षर ही है। जो जिसको संताप देता है, वही उसका शत्रु कहा जाता है ॥ १० ॥
असंतोषः श्रियो मूलं तस्मात् तं कामयाम्यहम् ।
समुच्छ्रये यो यतते स राजन् परमो नयः ॥ ११ ॥
असंतोष ही लक्ष्मीकी प्राप्तिका मूल कारण है; अतः मैं असंतोष चाहता हूँ। राजन्! जो अपनी उन्नतिके लिये प्रयत्न करता है, उसका वह प्रयत्न ही सर्वोत्तम नीति है ॥
ममत्वं हि न कर्तव्यमैश्वर्ये वा धनेऽपि वा ।
पूर्वावाप्तं हरन्त्यन्ये राजधर्मं हि तं विदुः ॥ १२ ॥
ऐश्वर्य अथवा धनमें ममता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि पहलेके उपार्जित धनको दूसरे लोग बलात् छीन लेते हैं। यही राजधर्म माना गया है ॥ १२ ॥
अद्रोहसमयं कृत्वा चिच्छेद नमुचेः शिरः ।
शक्रः साभिमता तस्य रिपौ वृत्तिः सनातनी ॥ १३ ॥
इन्द्रने नमुचिसे कभी वैर न करनेकी प्रतिज्ञा करके उसपर विश्वास जमाया और मौका देखकर उसका सिर काट लिया। तात! शत्रुके प्रति इसी प्रकारका व्यवहार सदासे होता चला आया है। यह इन्द्रको भी मान्य है ॥ १३ ॥
द्वावेतौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव ।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १४ ॥
जैसे सर्प बिलमें रहनेवाले चूहों आदिको निगल जाता है, उसी प्रकार यह भूमि विरोध न करनेवाले राजा तथा परदेशमें न विचरनेवाले ब्राह्मण (संन्यासी)-को ग्रस लेती है ॥ १४ ॥
नास्ति वै जातितः शत्रुः पुरुषस्य विशाम्पते ।
येन साधारणी वृत्तिः स शत्रुर्नतरो जनः ॥ १५ ॥
नरेश्वर! मनुष्यका जन्मसे कोई शत्रु नहीं होता, जिसके साथ एक-सी जीविका होती है अर्थात् जो लोग एक ही वृत्तिसे जीवननिर्वाह करते हैं, वे ही (ईर्ष्याके कारण) आपसमें एक-दूसरेके शत्रु होते हैं, दूसरे नहीं ॥ १५ ॥
शत्रुपक्षं समृद्ध्यन्तं यो मोहात् समुपेक्षते ।
व्याधिराप्यायित इव तस्य मूलं छिनत्ति सः ॥ १६ ॥
जो निरन्तर बढ़ते हुए शत्रुपक्षकी ओरसे मोहवश उदासीन हो जाता है, बढ़े हुए रोगकी भाँति शत्रु उस उदासीन राजाकी जड़ काट डालता है ॥ १६ ॥
अल्पोऽपि ह्यरिरत्यर्थं वर्धमानः पराक्रमैः ।
वल्मीको मूलज इव ग्रसते वृक्षमन्तिकात् ॥ १७ ॥
जैसे वृक्षकी जड़में उत्पन्न हुई दीमक उसमें लगी रहनेके कारण उस वृक्षको ही खा जाती है, वैसे ही छोटा-सा भी शत्रु यदि पराक्रमसे बहुत बढ़ जाय, तो वह पहलेके प्रबल शत्रुको भी नष्ट कर डालता है ॥ १७ ॥
आजमीढ रिपोर्लक्ष्मीर्मा ते रोचिष्ट भारत ।
एष भारः सत्त्ववतां नयः शिरसि विष्ठितः ॥ १८ ॥
भरतकुलभूषण! अजमीढनन्दन! आपको शत्रु की लक्ष्मी अच्छी नहीं लगनी चाहिये। हर समय न्यायको सिरपर चढ़ाये रखना भी बुद्धिमानोंके लिये भार ही है॥ १८॥
जन्मवृद्धिमिवार्थानां यो वृद्धिमभिकाङ्क्षते।
एधते ज्ञातिषु स वै सद्यो वृद्धिर्हि विक्रमः॥ १९॥
जो जन्मकालसे शरीर आदिकी वृद्धिके समान धनवृद्धिकी भी अभिलाषा करता है, वह कुटुम्बीजनोंमें बहुत आगे बढ़ जाता है। पराक्रम करना तत्काल उन्नतिका कारण है॥ १९॥
नाप्राप्य पाण्डवैश्वर्यं संशयो मे भविष्यति।
अवाप्स्ये वा श्रियं तां हि शयिष्ये वा हतो युधि॥ २०॥
जबतक मैं पाण्डवोंकी सम्पत्तिको प्राप्त न कर लूँ, तबतक मेरे मनमें दुविधा ही रहेगी। इसलिये या तो मैं पाण्डवोंकी उस सम्पत्तिको ले लूँगा अथवा युद्धमें मरकर सो जाऊँगा (तभी मेरी दुविधा मिटेगी)॥ २०॥
एतादृशस्य किं मेऽद्य जीवितेन विशाम्पते।
वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वयं त्वस्थिरवृद्धयः॥ २१॥
महाराज! आज जो मेरी दशा है, इसमें मेरे जीवित रहनेसे क्या लाभ? पाण्डव प्रतिदिन उन्नति कर रहे हैं और हम लोगोंकी वृद्धि (उन्नति) अस्थिर है—अधिक कालतक टिकनेवाली नहीं जान पड़ती है॥ २१॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५५॥
अध्याय (पृष्ठ 2081)
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना
शकुनिरुवाच
यां त्वमेतां श्रियं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रे युधिष्ठिरे ।
तप्यसे तां हरिष्यामि द्यूतेन जयतां वर ॥ १ ॥
शकुनि बोला— विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ दुर्योधन! तुम पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी जिस लक्ष्मीको देखकर संतप्त हो रहे हो, उसका मैं द्यूतके द्वारा अपहरण कर लूँगा ॥
आहूयतां परं राजन् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अगत्व संशयमहमयुद्ध्वा च चमूमुखे ॥ २ ॥
अक्षान् क्षिपन्नक्षतः सन् विद्वानविदुषो जये ।
ग्लहान् धनूंषि मे विद्धि शरानक्षांश्च भारत ॥ ३ ॥
परंतु राजन्! तुम कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको बुला लो। मैं किसी संशयमें पड़े बिना, सेनाके सामने युद्ध किये बिना केवल पासे फेंककर स्वयं किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही पाण्डवोंको जीत लूँगा; क्योंकि मैं द्यूतविद्याका ज्ञाता हूँ और पाण्डव इस कलासे अनभिज्ञ हैं। भारत! दावोंको मेरे धनुष समझो और पासोंको मेरे बाण ॥ २-३ ॥
अक्षाणां हृदयं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्तरम् ॥ ४ ॥
पासोंका जो हृदय (मर्म) है, उसीको मेरे धनुषकी प्रत्यंचा समझो और जहाँसे पासे फेंके जाते हैं, वह स्थान ही मेरा रथ है ॥ ४ ॥
दुर्योधन उवाच
अयमुत्सहते राजञ्छ्रियमाहर्तुमक्षवित् ।
द्यूतेन पाण्डुपुत्रेभ्यस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ५ ॥
दुर्योधन बोला— राजन्! ये मामाजी पासे फेंकनेकी कलामें निपुण हैं। ये द्यूतके द्वारा पाण्डवोंसे उनकी सम्पत्ति ले लेनेका उत्साह रखते हैं। उसके लिये इन्हें आज्ञा दीजिये ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
स्थितोऽस्मि शासने भ्रातुर्विदुरस्य महात्मनः ।
तेन संगम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम् ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्र बोले— बेटा! मैं अपने भाई महात्मा विदुरकी सम्मतिके अनुसार चलता हूँ। उनसे मिलकर यह जान सकूँगा कि इस कार्यके विषयमें क्या निश्चय करना चाहिये? ।। ६ ।।
दुर्योधन उवाच
व्यपनेष्यति ते बुद्धिं विदुरो मुक्तसंशयः ।
पाण्डवानां हिते युक्तो न तथा मम कौरव ॥ ७ ॥
दुर्योधन बोला— पिताजी! विदुर सब प्रकारसे संशयरहित हैं। वे आपकी बुद्धिको जूएके निश्चयसे हटा देंगे। कुरुनन्दन! वे जैसे पाण्डवोंके हितमें संलग्न रहते हैं, वैसे मेरे हितमें नहीं ।। ७ ।।
नारभेतान्यसामर्थ्यात् पुरुषः कार्यमात्मनः ।
मतिसाम्यं द्वयोर्नास्ति कार्येषु कुरुनन्दन ॥ ८ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह अपना कार्य दूसरेके बलपर न करे। कुरुराज! किसी भी कार्यमें दो पुरुषोंकी राय पूर्णरूपसे नहीं मिलती ।। ८ ।।
भयं परिहरन् मन्द आत्मानं परिपालयन् ।
वर्षासु क्लिन्नकटवत् तिष्ठन्नेवावसीदति ॥ ९ ॥
मूर्ख मनुष्य भयका त्याग और आत्मरक्षा करते हुए भी यदि चुपचाप बैठा रहे, उद्योग न करे, तो वह वर्षाकालमें भींगी हुई चटाईके समान नष्ट हो जाता है ।। ९ ।।
न व्याधयो नापि यमः प्राप्तुं श्रेयः प्रतीक्षते ।
यावदेव भवेत् कल्पस्तावच्छ्रेयः समाचरेत् ॥ १० ॥
रोग अथवा यमराज इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करते कि इसने श्रेय प्राप्त कर लिया या नहीं। अतः जबतक अपनेमें सामर्थ्य हो, तभीतक अपने हितका साधन कर लेना चाहिये ।। १० ।।
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वथा पुत्र बलिभिर्विग्रहो मे न रोचते ।
वैरं विकारं सृजति तद् वै शस्त्रमनायसम् ॥ ११ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— बेटा! मुझे तो बलवानोंके साथ विरोध करना किसी प्रकार भी अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वैर-विरोध बड़ा भारी झगड़ा खड़ा कर देता है, जो (कुलके विनाशके लिये) बिना लोहेका शस्त्र है ।। ११ ।।
अनर्थमर्थं मन्यसे राजपुत्र
संग्रन्थनं कलहस्याति घोरम् ।
तद् वै प्रवृत्तं तु यथा कथंचित्
सृजेदसीन् निशितान् सायकांश्च ॥ १२ ॥
राजकुमार! तुम द्यूतरूपी अनर्थको ही अर्थ मान रहे हो। यह जूआ कलहको ही गूँथनेवाला एवं अत्यन्त भयंकर है। यदि किसी प्रकार यह शुरू हो गया तो तीखी तलवारों और बाणोंकी भी सृष्टि कर देगा ।। १२ ।।
दुर्योधन उवाच
द्यूते पुराणैर्व्यवहारः प्रणीत- स्तत्रात्ययो नास्ति न सम्प्रहारः । तद् रोचतां शकुनेर्वाक्यमद्य सभां क्षिप्रं त्वमिहाज्ञापयस्व ।। १३ ।।
**दुर्योधन बोला—**पिताजी! पुराने लोगोंने भी द्यूतक्रीड़ाका व्यवहार किया है। उसमें न तो दोष है और न युद्ध ही होता है। अतः आप शकुनि मामाकी बात मान लीजिये और शीघ्र ही यहाँ (द्यूतके लिये) सभामण्डप बन जानेकी आज्ञा दीजिये ।। १३ ।।
स्वर्गद्वारं दीव्यतां नो विशिष्टं तद्वर्तिनां चापि तथैव युक्तम् । भवेदेवं ह्यात्मना तुल्यमेव दुरोदरं पाण्डवैस्त्वं कुरुष्व ।। १४ ।।
यह जूआ हम खेलनेवालोंके लिये एक विशिष्ट स्वर्गीय सुखका द्वार है। उसके आस-पास बैठनेवाले लोगोंके लिये भी वह वैसा ही सुखद होता है। इस प्रकार इसमें पाण्डवोंको भी हमारे समान ही सुख प्राप्त होगा। अतः आप पाण्डवोंके साथ द्यूतक्रीड़ाकी व्यवस्था कीजिये ।।
धृतराष्ट्र उवाच
वाक्यं न मे रोचते यत् त्वयोक्तं यत् ते प्रियं तत् क्रियतां नरेन्द्र । पश्चात् तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक्यं न हीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम् ।। १५ ।।
**धृतराष्ट्रने कहा—**बेटा! तुमने जो बात कही है, वह मुझे अच्छी नहीं लगती। नरेन्द्र! जैसी तुम्हारी रुचि हो, वैसा करो। जूएका आरम्भ करनेपर मेरी बातोंको याद करके तुम पीछे पछताओगे; क्योंकि ऐसी बातें जो तुम्हारे मुखसे निकली हैं, धर्मानुकूल नहीं कही जा सकतीं ।। १५ ।।
दृष्टं ह्येतद् विदुरेणैव सर्वं विपश्चिता बुद्धिविद्यानुगेन । तदेवैतदवशस्याभ्युपैति महद् भयं क्षत्रियजीवघाति ।। १६ ।।
बुद्धि और विद्याका अनुसरण करनेवाले विद्वान् विदुरने यह सब परिणाम पहलेसे ही देख लिया था। क्षत्रियोंके लिये विनाशकारी वही यह महान् भय मुझ विवशके सामने आ रहा है ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी दैवं मत्वा परमं दुस्तरं च । शशासोच्चैः पुरुषान् पुत्रवाक्ये स्थितो राजा दैवसम्मूढचेताः ।। १७ ।। सहस्रस्तम्भां हेमवैडूर्यचित्रां शतद्वारां तोरणस्फाटिकाख्याम् । सभामग्र्यां क्रोशमात्रायतां मे तद्विस्तारामाशु कुर्वन्तु युक्ताः ।। १८ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने दैवको परम दुस्तर माना और दैवके प्रतापसे ही उनके चित्तपर मोह छा गया। वे कर्तव्याकर्तव्यका निर्णय करनेमें असमर्थ हो गये। फिर पुत्रकी बात मानकर उन्होंने सेवकोंको आज्ञा दी कि शीघ्र ही तत्पर होकर तोरणस्फाटिक नामक सभा तैयार कराओ। उसमें सुवर्ण तथा वैदूर्यसे जटिल एक हजार खम्भे और सौ दरवाजे हों। उस सुन्दर सभाकी लंबाई और चौड़ाई एक-एक कोसकी होनी चाहिये ।। १७-१८ ।।
श्रुत्वा तस्य त्वरिता निर्विशङ्काः प्राज्ञा दक्षास्तां तदा चक्रुराशु । सर्वद्रव्याण्युपजहुः सभायां सहस्रशः शिल्पिनश्चैव युक्ताः ।। १९ ।। उनकी यह आज्ञा सुनकर तेज काम करनेवाले चतुर एवं बुद्धिमान् सहस्रों शिल्पी निर्भीक होकर काममें लग गये। उन्होंने शीघ्र ही वह सभा तैयार कर दी और उसमें सब तरहकी वस्तुएँ यथास्थान सजा दीं ।। १९ ।।
कालेनाल्पेनाथ निष्ठां गतां तां सभां रम्यां बहुरत्नां विचित्राम् । चित्रैर्हैमैरासनैरभ्युपेता- माचख्युस्ते तस्य राज्ञः प्रतीताः ।। २० ।। थोड़े ही समयमें तैयार हुई उस असंख्य रत्नोंसे सुशोभित रमणीय एवं विचित्र सभाको अद्भुत सोनेके आसनोंद्वारा सजा दिया गया। तत्पश्चात् विश्वस्त सेवकोंने राजा धृतराष्ट्रको उस सभाभवनके तैयार हो जानेकी सूचना दी ।।
ततो विद्वान् विदुरं मन्त्रिमुख्य- मुवाचेदं धृतराष्ट्रो नरेन्द्रः । युधिष्ठिरं राजपुत्रं च गत्वा मद्वाक्येन क्षिप्रमिहानयस्व ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् विद्वान् राजा धृतराष्ट्रने मन्त्रियोंमें प्रधान विदुरको यह आज्ञा दी कि तुम राजकुमार युधिष्ठिरके पास जाकर मेरी आज्ञासे उन्हें शीघ्र यहाँ लिवा लाओ ॥
सभेयं मे बहुरत्ना विचित्रा शय्यासनैरुपपन्ना महार्हैः । सा दृश्यतां भ्रातृभिः सार्धमेत्य सुहृद्द्यूतं वर्ततामत्र चेति ॥ २२ ॥ उनसे कहना, 'मेरी यह विचित्र सभा अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित है। इसे बहुमूल्य शय्याओं और आसनोंद्वारा सजाया गया है। युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंके साथ यहाँ आकर इसे देखो और इसमें सुहृदोंकी द्यूतक्रीड़ा प्रारम्भ हो' ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरके बुलानेसे सम्बन्ध रखनेवाला छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2086)
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
विदुर और धृतराष्ट्रकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
मतमाज्ञाय पुत्रस्य धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
मत्वा च दुस्तरं दैवमेतद् राजंश्चकार ह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अपने पुत्र दुर्योधनका मत जानकर राजा धृतराष्ट्रने दैवको दुस्तर माना और यह कार्य किया ॥ १ ॥
अन्यायेन तथोक्तस्तु विदुरो विदुषां वरः ।
नाभ्यनन्दद् वचो भ्रातुर्वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २ ॥
विद्वानोंमें श्रेष्ठ विदुरने धृतराष्ट्रका वह अन्यायपूर्ण आदेश सुनकर भाईकी उस बातका अभिनन्दन नहीं किया और इस प्रकार कहा ॥ २ ॥
विदुर उवाच
नाभिनन्दे नृपते प्रैषमेतं
मैवं कृथाः कुलनाशाद् बिभेमि ।
पुत्रैर्भिन्नैः कलहस्ते ध्रुवं स्या-
देतच्छङ्के द्यूतकृते नरेन्द्र ॥ ३ ॥
विदुर बोले—महाराज! मैं आपके इस आदेशका अभिनन्दन नहीं करता, आप ऐसा काम मत कीजिये। इससे मुझे समस्त कुलके विनाशका भय है। नरेन्द्र! पुत्रोंमें भेद होनेपर निश्चय ही आपको कलहका सामना करना पड़ेगा। इस जूएके कारण मुझे ऐसी आशंका हो रही है ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
नेह क्षत्तः कलहस्तप्स्यते मां
न चेद् दैवं प्रतिलोमं भविष्यत् ।
धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं
सर्वं जगच्चेष्टति न स्वतन्त्रम् ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—विदुर! यदि दैव प्रतिकूल न हो, तो मुझे कलह भी कष्ट नहीं दे सकेगा। विधाताका बनाया हुआ यह सम्पूर्ण जगत् दैवके अधीन होकर ही चेष्टा कर रहा है, स्वतन्त्र नहीं है ॥ ४ ॥
तदद्य विदुर प्राप्य राजानं मम शासनात् ।
क्षिप्रमानय दुर्धर्षं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५ ॥
इसलिये विदुर! तुम मेरी आज्ञासे आज राजा युधिष्ठिरके पास जाकर उन दुर्धर्ष कुन्तीकुमार युधिष्ठिरको यहाँ शीघ्र बुला ले आओ ॥ ५ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरके बुलानेसे सम्बन्ध रखनेवाला सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥