महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभुक्तं भुक्तवद् वापि सर्वमाकुब्जवामनम् । अभुञ्जाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद् विशाम्पते ॥ ४८ ॥ राजन्! उस यज्ञमें द्रौपदी प्रतिदिन स्वयं पहले भोजन न करके इस बातकी देखभाल करती थी कि कुबड़े और बौनोंसे लेकर सब मनुष्योंमें किसने खाया है और किसने अभीतक भोजन नहीं किया है ॥ ४८ ॥ द्वौ करौ न प्रयच्छेतां कुन्तीपुत्राय भारत । सम्बन्धिकेन पञ्चालाः सख्येनान्धकवृष्णयः ॥ ४९ ॥ भारत! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको दो ही कुलके लोग कर नहीं देते थे। सम्बन्धके कारण पांचाल और मित्रताके कारण अन्धक एवं वृष्णि ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥