महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंठहरा दें। फिर पांचालि! तुम दास्यभावसे मुक्त कर दी जाओगी ॥ ४ ॥ धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा स्वयं चेदं कथयत्विन्द्रकल्पः । ईशो वा ते ह्यनीशोऽथ वैष वाक्यादस्य क्षिप्रमेकं भजस्व ॥ ५ ॥ ये धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिर इन्द्रके समान तेजस्वी तथा सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। तुमको दाँवपर रखनेका इन्हें अधिकार था या नहीं? ये स्वयं ही कह दें; फिर इन्हींके कथनानुसार तुम शीघ्र दासीपन या अदासीपन किसी एकका आश्रय लो ॥ ५ ॥ सर्वे हीमे कौरवेयाः सभायां दुःखान्तरे वर्तमानास्तवैव । न विब्रुवन्त्यार्यसत्त्वा यथावत् पतींश्च ते समवेक्ष्याल्पभाग्यान् ॥ ६ ॥ द्रौपदी! ये सभी उत्तम स्वभाववाले कुरुवंशी इस सभामें तुम्हारे लिये ही दुःखी हैं और तुम्हारे मन्दभाग्य पतियोंको देखकर तुम्हारे प्रश्नका ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पाते हैं ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः सभ्याः कुरुराजस्य तस्य वाक्यं सर्वे प्रशंसुस्तथोच्चैः । चेलावेधांश्चापि चक्रुर्नदन्तो हाहेत्यासीदपि चैवार्तनादः ॥ ७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर एक ओर सभी सभासदोंने कुरुराज दुर्योधनके उस कथनकी उच्च स्वरसे भूरि-भूरि प्रशंसा की और गर्जना करते हुए वे वस्त्र हिलाने लगे तथा वहीं दूसरी ओर हाहाकार और आर्तनाद होने लगा ॥ ७ ॥ श्रुत्वा तु वाक्यं सुमनोहरं त- द्धर्षश्चासीत् कौरवाणां सभायाम् । सर्वे चासन् पार्थिवाः प्रीतिमन्तः कुरुश्रेष्ठं धार्मिकं पूजयन्तः ॥ ८ ॥ दुर्योधनका वह मनोहर वचन सुनकर उस समय सभामें कौरवोंको बड़ा हर्ष हुआ। अन्य सब राजा भी बड़े प्रसन्न हुए तथा दुर्योधनको कौरवोंमें श्रेष्ठ और धार्मिक कहते हुए उसका आदर करने लगे ॥ ८ ॥ युधिष्ठिरं च ते सर्वे समुदैक्षन्त पार्थिवाः । किं नु वक्ष्यति धर्मज्ञ इति साचीकृताननाः ॥ ९ ॥