भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2174

फिर वे सब नरेश मुँह घुमाकर राजा युधिष्ठिरकी ओर इस आशासे देखने लगे कि देखें, ये धर्मज्ञ पाण्डुकुमार क्या कहते हैं? ।। ९ ।। किं नु वक्ष्यति बीभत्सुरजितो युधि पाण्डवः । भीमसेनो यमौ चोभौ भृशं कौतूहलान्विताः ।। १० ।। युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुन किस प्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं? भीमसेन, नकुल तथा सहदेव भी क्या कहते हैं? इसके लिये उन राजाओंके मनमें बड़ी उत्कण्ठा थी ।। १० ।। तस्मिन्नुपरते शब्दे भीमसेनोऽब्रवीदिदम् । प्रगृह्य रुचिरं दिव्यं भुजं चन्दनचर्चितम् ।। ११ ।। वह कोलाहल शान्त होनेपर भीमसेन अपनी चन्दनचर्चित सुन्दर दिव्य भुजा उठाकर इस प्रकार बोले ।। ११ ।।

भीमसेन उवाच

यद्येष गुरुरस्माकं धर्मराजो महामनाः । न प्रभुः स्यात् कुलस्यास्य न वयं मर्षयेमहि ।। १२ ।। भीमसेनने कहा— यदि ये महामना धर्मराज युधिष्ठिर हमारे पितृतुल्य तथा इस पाण्डुकुलके स्वामी न होते तो हम कौरवोंका यह अत्याचार कदापि सहन नहीं करते ।। ईशो नः पुण्यतपसां प्राणानामपि चेश्वरः । मन्यतेऽजितमात्मानं यद्येष विजिता वयम् ।। १३ ।। न हि मुच्येत मे जीवन् पदा भूमिमुपस्पृशन् । मर्त्यधर्मा परामृश्य पाञ्चाल्या मूर्धजानिमान् ।। १४ ।। पश्यध्वं ह्यायतौ वृत्तौ भुजौ मे परिघाविव । नैतयोरन्तरं प्राप्य मुच्येतापि शतक्रतुः ।। १५ ।। ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता ।। १३-१५ ।। धर्मपाशसितस्त्वेवं नाधिगच्छामि संकटम् । गौरवेण विरुद्धश्च निग्रहादर्जुनस्य च ।। १६ ।। मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, बड़े भाईके गौरवने मुझे रोक रखा है और अर्जुन भी मना कर रहा है, इसीलिये मैं इस संकटसे पार नहीं हो पाता ।। १६ ।।

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