महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपराजितास्ते पतयो नैव सन्ति ॥ ४ ॥ यज्ञसेनकुमारी! नकुल हार गये, भीमसेन, युधिष्ठिर, सहदेव तथा अर्जुन भी पराजित होकर दास बन गये। अब तुम दासी हो चुकी हो। वे हारे हुए पाण्डव अब तुम्हारे पति नहीं हैं॥ ४॥ प्रयोजनं जन्मनि किं न मन्यते पराक्रमं पौरुषं चैव पार्थः। पाञ्चाल्यस्य द्रुपदस्यात्मजामिमां सभामध्ये यो व्यदेवीद् ग्लहेषु ॥ ५॥ क्या कुन्तीकुमार युधिष्ठिर इस जीवनमें पराक्रम और पुरुषार्थकी आवश्यकता नहीं समझते, जिन्होंने सभामें इस द्रुपदराजकुमारी कृष्णाको दाँवपर लगाकर जूएका खेल किया? ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी भृशं निशश्वास तदाऽऽर्तरूपः। राजानुगो धर्मपाशानुबद्धो दहन्निवैनं क्रोधसंरक्तदृष्टिः ॥ ६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कर्णकी वह बात सुनकर अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए भीमसेन बड़ी वेदनाका अनुभव करते हुए उस समय जोर-जोरसे उच्छ्वास लेने लगे। वे राजा युधिष्ठिरके अनुगामी होकर धर्मके पाशमें बँधे हुए थे। क्रोधसे उनके नेत्र रक्तवर्ण हो रहे थे। वे युधिष्ठिरको दग्ध करते हुए-से बोले ॥ ६ ॥
भीम उवाच
नाहं कुप्ये सूतपुत्रस्य राज- न्नेष सत्यं दासधर्मः प्रदिष्टः। किं विद्विषो वै मामेवं व्याहरेयु- र्नदिवीस्त्वं यद्यनया नरेन्द्र ॥ ७ ॥ **भीमसेनने कहा—**राजन्! मुझे सूतपुत्र कर्णपर क्रोध नहीं आता। सचमुच ही दासधर्म वही है, जो उसने बताया है। महाराज! यदि आप इस द्रौपदीको दाँवपर लगाकर जूआ न खेलते तो क्या ये शत्रु हमलोगोंसे ऐसी बातें कह सकते थे? ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
भीमसेनवचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा। युधिष्ठिरमुवाचेदं तूष्णीम्भूतमचेतनम् ॥ ८ ॥