महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायनजी कहते हैं— भीमसेनका यह कथन सुनकर उस समय राजा दुर्योधनने मौन एवं अचेतकी-सी दशामें बैठे हुए युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ।। ८ ।। भीमार्जुनौ यमौ चैव स्थितौ ते नृप शासने । प्रश्नं ब्रूहि च कृष्णां त्वमजितां यदि मन्यसे ।। ९ ।। ‘नरेश! भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव आपकी आज्ञाके अधीन हैं। आप ही द्रौपदीके प्रश्नपर कुछ बोलिये। क्या आप कृष्णाको हारी हुई नहीं मानते हैं?’ ।। ९ ।। एवमुक्त्वा तु कौन्तेयमपोह्य वसनं स्वकम् । स्मयन्नवेक्ष्य पाञ्चालीमैश्वर्यमदमोहितः ।। १० ।। कदलीस्तम्भसदृशं सर्वलक्षणसंयुतम् । गजहस्तप्रतीकाशं वज्रप्रतिमगौरवम् ।। ११ ।। अभ्युत्स्मयित्वा राधेयं भीममाधर्षयन्निव । द्रौपद्याः प्रेक्षमाणायाः सव्यमूरुमदर्शयत् ।। १२ ।। कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर ऐश्वर्यमदसे मोहित हुए दुर्योधनने इशारेसे राधानन्दन कर्णको बढ़ावा देते और भीमसेनका तिरस्कार-सा करते हुए अपनी जाँघका वस्त्र हटाकर द्रौपदीकी ओर मुसकराते हुए देखा। उसने केलेके खंभेके समान मोटी, समस्त लक्षणोंसे सुशोभित, हाथीकी सूँडके सदृश चढ़ाव-उतारवाली और वज्रके समान कठोर अपनी बायीं जाँघ द्रौपदीकी दृष्टिके सामने करके दिखायी ।। १०—१२ ।। भीमसेनस्तमालोक्य नेत्रे उत्फाल्य लोहिते । प्रोवाच राजमध्ये तं सभां विश्रावयन्निव ।। १३ ।। उसे देखकर भीमसेनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे आँखें फाड़-फाड़कर देखते और सारी सभाको सुनाते हुए-से राजाओंके बीचमें बोले— ।। १३ ।। पितृभिः सह सालोक्यं मा स्म गच्छेद वृकोदरः । यद्येतमूरूं गदया न भिन्द्यां ते महाहवे ।। १४ ।। ‘दुर्योधन! यदि महासमरमें तेरी इस जाँघको मैं अपनी गदासे न तोड़ डालूँ तो मुझ भीमसेनको अपने पूर्वजोंके साथ उन्हींके समान पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो’ ।। १४ ।। क्रुद्धस्य तस्य सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यः पावकार्चिषः । वृक्षस्येव विनिश्चेरुः कोटरेभ्यः प्रदह्यतः ।। १५ ।। उस समय क्रोधमें भरे हुए भीमसेनके रोम-रोमसे आगकी चिनगारियाँ निकल रही थीं; ठीक उसी तरह, जैसे जलते हुए वृक्षके कोटरोंसे आगकी लपटें निकलती दिखायी देती हैं ।। १५ ।।
विदुर उवाच
परं भयं पश्यत भीमसेनात्