भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

चिरारब्धमिदं चापि सागरस्यापि मन्थनम् ॥ ३० ॥ तब देवतालोग वहाँ बैठे हुए वरदायक ब्रह्माजीसे बोले—'ब्रह्मन्! भगवान् नारायणके अतिरिक्त हम सभी देवता और दानव बहुत थक गये हैं; किंतु अभीतक वह अमृत प्रकट नहीं हो रहा है। इधर समुद्रका मन्थन आरम्भ हुए बहुत समय बीत चुका है' ॥ २९-३० ॥

ततो नारायणं देवं ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । विधत्स्वैषां बलं विष्णो भवानत्र परायणम् ॥ ३१ ॥ यह सुनकर ब्रह्माजीने भगवान् नारायणसे यह बात कही—'सर्वव्यापी परमात्मन्! इन्हें बल प्रदान कीजिये, यहाँ एकमात्र आप ही सबके आश्रय हैं' ॥ ३१ ॥

विष्णुरुवाच

बलं ददामि सर्वेषां कर्मैतद् ये समास्थिताः । क्षोभ्यतां कलशः सर्वैर्मन्दरः परिवर्त्यताम् ॥ ३२ ॥ श्रीविष्णु बोले—जो लोग इस कार्यमें लगे हुए हैं, उन सबको मैं बल दे रहा हूँ। सब लोग पूरी शक्ति लगाकर मन्दराचलको घुमावें और इस सागरको क्षुब्ध कर दें ॥ ३२ ॥

सौतिरुवाच

नारायणवचः श्रुत्वा बलिनस्ते महोदधेः । तत् पयः सहिता भूयश्चक्रिरे भृशमाकुलम् ॥ ३३ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी! भगवान् नारायणका वचन सुनकर देवताओं और दानवोंका बल बढ़ गया। उन सबने मिलकर पुनः वेगपूर्वक महासागरका वह जल मथना आरम्भ किया और उस समस्त जलराशिको अत्यन्त क्षुब्ध कर डाला ॥ ३३ ॥

ततः शतसहस्रांशुर्मथ्यमानात्तु सागरात् । प्रसन्नात्मा समुत्पन्नः सोमः शीतांशुरुज्ज्वलः ॥ ३४ ॥ फिर तो उस महासागरसे अनन्त किरणोंवाले सूर्यके समान तेजस्वी, शीतल प्रकाशसे युक्त, श्वेतवर्ण एवं प्रसन्नात्मा चन्द्रमा प्रकट हुआ ॥ ३४ ॥

श्रीरनन्तरमुत्पन्ना घृतात् पाण्डुरवासिनी । सुरादेवी समुत्पन्ना तुरगः पाण्डुरस्तथा ॥ ३५ ॥ तदनन्तर उस घृतस्वरूप जलसे श्वेतवस्त्रधारिणी लक्ष्मीदेवीका आविर्भाव हुआ। इसके बाद सुरादेवी और श्वेत अश्व प्रकट हुए ॥ ३५ ॥

कौस्तुभस्तु मणिर्दिव्य उत्पन्नो घृतसम्भवः । मरीचिविकचः श्रीमान् नारायण उरोगतः ॥ ३६ ॥ फिर अनन्त किरणोंसे समुज्ज्वल दिव्य कौस्तुभमणिका उस जलसे प्रादुर्भाव हुआ, जो भगवान् नारायणके वक्षःस्थलपर सुशोभित हुई ॥ ३६ ॥

(पारिजातश्च तत्रैव सुरभिश्च महामुने ।