महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 221, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंजज्ञाते तौ तदा ब्रह्मन् सर्वकामफलप्रदौ ॥) श्रीः सुरा चैव सोमश्च तुरगश्च मनोजवः । यतो देवास्ततो जग्मुरादित्यपथमाश्रिताः ॥ ३७ ॥ ब्रह्मन्! महामुने! वहाँ सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाले पारिजात वृक्ष एवं सुरभि गौकी उत्पत्ति हुई। फिर लक्ष्मी, सुरा, चन्द्रमा तथा मनके समान वेगशाली उच्चैःश्रवा घोड़ा—ये सब सूर्यके मार्ग आकाशका आश्रय ले, जहाँ देवता रहते हैं, उस लोकमें चले गये ॥ ३७ ॥
धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत । श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति ॥ ३८ ॥ इसके बाद दिव्य शरीरधारी धन्वन्तरि देव प्रकट हुए। वे अपने हाथमें श्वेत कलश लिये हुए थे, जिसमें अमृत भरा था ॥ ३८ ॥
एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा दानवानां समुत्थितः । अमृतार्थे महान् नादो ममेदमिति जल्पताम् ॥ ३९ ॥ यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखकर दानवोंमें अमृतके लिये कोलाहल मच गया। वे सब कहने लगे 'यह मेरा है, यह मेरा है' ॥ ३९ ॥
श्वेतैर्दन्तैश्चतुर्भिस्तु महाकायस्ततः परम् । ऐरावतो महानागोऽभवद् वज्रभृता धृतः ॥ ४० ॥ तत्पश्चात् श्वेत रंगके चार दाँतोंसे सुशोभित विशालकाय महानाग ऐरावत प्रकट हुआ, जिसे वज्रधारी इन्द्रने अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४० ॥
अतिनिर्मथनादेव कालकूटस्ततः परः । जगदावृत्य सहसा सधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ४१ ॥ तदनन्तर अत्यन्त वेगसे मथनेपर कालकूट महाविष उत्पन्न हुआ, वह धूमयुक्त अग्निकी भाँति एकाएक सम्पूर्ण जगत्को घेरकर जलाने लगा ॥ ४१ ॥
त्रैलोक्यं मोहितं यस्य गन्धमाघ्राय तद् विषम् । प्राग्रसल्लोकरक्षार्थं ब्रह्मणो वचनाच्छिवः ॥ ४२ ॥ उस विषकी गन्ध सूँघते ही त्रिलोकीके प्राणी मूर्च्छित हो गये। तब ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीशंकरने त्रिलोकीकी रक्षाके लिये उस महान् विषको पी लिया ॥ ४२ ॥
दधार भगवान् कण्ठे मन्त्रमूर्तिमहेश्वरः । तदाप्रभृति देवस्तु नीलकण्ठ इति श्रुतिः ॥ ४३ ॥ मन्त्रमूर्ति भगवान् महेश्वरने विषपान करके उसे अपने कण्ठमें धारण कर लिया। तभीसे महादेवजी नीलकण्ठके नामसे विख्यात हुए, ऐसी जनश्रुति है ॥ ४३ ॥
एतत् तदद्भुतं दृष्ट्वा निराशा दानवाः स्थिताः । अमृतार्थे च लक्ष्म्यर्थे महान्तं वैरमाश्रिताः ॥ ४४ ॥