महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंये सब अद्भुत बातें देखकर दानव निराश हो गये और अमृत तथा लक्ष्मीके लिये उन्होंने देवताओंके साथ महान् वैर बाँध लिया ।। ४४ ।।
ततो नारायणो मायां मोहिनीं समुपाश्रितः । स्त्रीरूपमद्भुतं कृत्वा दानवानभिसंश्रितः ।। ४५ ।। उसी समय भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय ले मनोहारिणी स्त्रीका अद्भुत रूप बनाकर, दानवोंके पास पदार्पण किया ।। ४५ ।।
ततस्तदमृतं तस्यै ददुस्ते मूढचेतसः । स्त्रियै दानवदैतेयाः सर्वे तद्गतमानसाः ।। ४६ ।। समस्त दैत्यों और दानवोंने उस मोहिनीपर अपना हृदय निछावर कर दिया। उनके चित्तमें मूढ़ता छा गयी। अतः उन सबने स्त्रीरूपधारी भगवान्को वह अमृत सौंप दिया ।। ४६ ।।
(सा तु नारायणी माया धारयन्ती कमण्डलुम् । आस्यमानेषु दैत्येषु पङ्क्त्या च प्रति दानवैः । देवानपाययद् देवी न दैत्यांस्ते च चुक्रुशुः ॥) भगवान् नारायणकी वह मूर्तिमती माया हाथमें कलश लिये अमृत परोसने लगी। उस समय दानवोंसहित दैत्य पंगत लगाकर बैठे ही रह गये, परंतु उस देवीने देवताओंको ही अमृत पिलाया; दैत्योंको नहीं दिया, इससे उन्होंने बड़ा कोलाहल मचाया।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि अमृतमन्थनेऽष्टादशोऽध्यायः ।। १८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें अमृतमन्थनविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)