भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2201

सर्वोपायैर्निहन्तव्याः शत्रवः शत्रुसूदन । पुरा युद्धाद् बलाद् वापि प्रकुर्वन्ति तवाहितम् ॥ ८ ॥ शत्रुसूदन! जो आपका अहित करते हैं, उन शत्रुओंको बिना युद्धके अथवा युद्ध करके—सभी उपायोंसे मार डालना चाहिये ॥ ८ ॥

ते वयं पाण्डवधनैः सर्वान् सम्पूज्य पार्थिवान् । यदि तान् योधयिष्यामः किं वै नः परिहास्यति ॥ ९ ॥ महाराज! यदि हम पाण्डवोंके धनसे सब राजाओंका सत्कार करके उन्हें साथ ले पाण्डवोंसे युद्ध करें, तो हमारा क्या बिगड़ जायगा? ॥ ९ ॥

अहीनाशीविषान् क्रुद्धान् नाशाय समुपस्थितान् । कृत्वा कण्ठे च पृष्ठे च कः समुत्स्रष्टुमर्हति ॥ १० ॥ क्रोधमें भरकर काटनेके लिये उद्यत हुए विषधर सर्पोंको अपने गलेमें लटकाकर अथवा पीठपर चढ़ाकर कौन मनुष्य उन्हें उसी अवस्थामें छोड़ सकता है? ॥ १० ॥

आत्तशस्त्रा रथगताः कुपितास्तात पाण्डवाः । निःशेषं वः करिष्यन्ति क्रुद्धा ह्याशीविषा इव ॥ ११ ॥ तात! अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर रथमें बैठे हुए पाण्डव कुपित होकर क्रुद्ध विषधर सर्पोंकी भाँति आपके कुलका संहार कर डालेंगे ॥ ११ ॥

संनद्धो ह्यर्जुनो याति विधूत्य परमेषुधी । गाण्डीवं मुहुरदत्ते निःश्वसंश्च निरीक्षते ॥ १२ ॥ गदां गुर्वीं समुद्यम्य त्वरितश्च वृकोदरः । स्वरथं योजयित्वाऽऽशु निर्यात इति नः श्रुतम् ॥ १३ ॥ हमने सुना है, अर्जुन कवच धारण करके दो उत्तम तूणीर पीठपर लटकाये हुए जाते हैं। वे बार-बार गाण्डीव धनुष हाथमें लेते हैं और लम्बी साँसें खींचकर इधर-उधर देखते हैं। इसी प्रकार भीमसेन शीघ्र ही अपना रथ जोतकर भारी गदा उठाये बड़ी उतावलीके साथ यहाँसे निकलकर गये हैं ॥ १२-१३ ॥

नकुलः खड्गमादाय चर्म चाप्यर्धचन्द्रवत् । सहदेवश्च राजा च चक्रुराकारमिङ्गितैः ॥ १४ ॥ नकुल अर्धचन्द्रविभूषित ढाल एवं तलवार लेकर जा रहे हैं। सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरने भी विभिन्न चेष्टाओंद्वारा यह व्यक्त कर दिया है कि वे लोग क्या करना चाहते हैं? ॥ १४ ॥

ते त्वास्थाय रथान् सर्वे बहुशस्त्रपरिच्छदान् । अभिघ्नन्तो रथव्रातान् सेनायोगाय निर्ययुः ॥ १५ ॥ वे सब लोग अनेक शस्त्र आदि सामग्रियोंसे सम्पन्न रथोंपर बैठकर शत्रुपक्षके रथियोंका संहार करनेके उद्देश्यसे सेना एकत्र करनेके लिये गये हैं ॥ १५ ॥