महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्नेहपूर्ण बर्ताव करो। भारत! जो मनुष्य इस पृथ्वीपर अर्जुनके साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रखते हुए उनसे सद्व्यवहार करता है, उसे तीनों लोकोंमें तनिक भी भय नहीं है; अतः वत्स! तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो।
दुर्योधन उवाच
द्यूते पार्थस्य कौरव्य मायया निकृतिः कृता ।
तस्माद्धि तं जहि सदा त्वन्योपायेन नो भवेत् ॥
दुर्योधन बोला— कुरुश्रेष्ठ! जूएमें हमलोगोंने अर्जुनके प्रति छल-कपटका बर्ताव किया था, अतः आप किसी दूसरे उपायसे उन्हें मार डालें। इसीसे हमलोगोंका सदा भला होगा।
धृतराष्ट्र उवाच
उपायश्च न कर्तव्यः पाण्डवान् प्रति भारत ।
पार्थान् प्रति पुरा वत्स बहूपायाः कृतास्त्वया ॥
तानुपायान् हि कौन्तेया बहुशो व्यतिचक्रमुः ॥
तस्माद्धितं जीविताय नः कुलस्य जनस्य च ।
त्वं चिकीर्षसि चेद् वत्स समित्रः सहबान्धवः ।
सभातृकस्त्वं पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥
धृतराष्ट्रने कहा— भारत! पाण्डवोंके प्रति किसी अनुचित उपायका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बेटा! तुमने उन सबको मारनेके लिये पहले बहुत-से उपाय किये हैं। कुन्तीके पुत्र तुम्हारे उन सभी प्रयत्नोंका उल्लंघन करके बहुत बार आगे बढ़ गये हैं; अतः वत्स! यदि तुम अपने कुल और आत्मीयजनोंकी जीवनरक्षाके लिये किसी हितकर उपायका अवलम्बन करना चाहते हो तो मित्र, बन्धु-बान्धव तथा भाइयोंसहित तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो।
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रवचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा ।
चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु विधिना चोदितोऽब्रवीत् ॥)
वैशम्पायनजी कहते हैं— धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधन दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करके विधातासे प्रेरित हो इस प्रकार बोला।
दुर्योधन उवाच
न त्वयेदं श्रुतं राजन् यज्जगाद बृहस्पतिः ।
शक्रस्य नीतिं प्रवदन् विद्वान् देवपुरोहितः ॥ ७ ॥
दुर्योधन बोला— राजन्! देवगुरु विद्वान् बृहस्पतिजीने इन्द्रको नीतिका उपदेश करते हुए जो बात कही है, उसे शायद आपने नहीं सुना है ॥ ७ ॥