भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2199

दृष्ट्वा स्वप्नगतं पार्थमुद्भ्रमामि ह्यचेतनः ॥ भारत! मैं एकान्तमें अर्जुनको ही देखता हूँ। स्वप्नमें भी अर्जुनको देखकर मैं अचेत और उद्भ्रान्त हो उठता हूँ।

अकारादीनि नामानि अर्जुनत्रस्तचेतसः । अश्वाश्चार्था ह्यजाश्चैव त्रासं संजनयन्ति मे ॥ मेरा हृदय अर्जुनसे इतना भयभीत हो गया है कि अश्व, अर्थ और अज आदि अकारादि नाम मेरे मनमें त्रास उत्पन्न कर देते हैं।

नास्ति पार्थदृते तात परवीराद् भयं मम । प्रह्लादं वा बलिं वापि हन्याद्धि विजयो रणे ॥ तस्मात् तेन महाराज युद्धमस्मज्जनक्षयम् । अहं तस्य प्रभावज्ञो नित्यं दुःखं वहामि च ॥ तात! अर्जुनके सिवा शत्रुपक्षके दूसरे किसी वीरसे मुझे डर नहीं लगता है। महाराज! मेरा विश्वास है कि अर्जुन युद्धमें प्रह्लाद अथवा बलिको भी मार सकते हैं; अतः उनके साथ किया हुआ युद्ध हमारे सैनिकोंके ही संहारका कारण होगा। मैं अर्जुनके प्रभावको जानता हूँ। इसीलिये सदा दुःखके भारसे दबा रहता हूँ।

पुरा हि दण्डकारण्ये मारीचस्य यथा भयम् । भवेद् रामे महावीर्ये तथा पार्थे भयं मम ॥ जैसे पूर्वकालमें दण्डकारण्यवासी महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीसे मारीचको भय हो गया था, उसी प्रकार अर्जुनसे मुझे भय हो रहा है।

धृतराष्ट्र उवाच

जानाम्येव महद् वीर्यं जिष्णोरेतद् दुरासदम् । तात वीरस्य पार्थस्य मा कार्षीस्त्वं तु विप्रियम् ॥ द्यूतं वा शस्त्रयुद्धं वा दुर्वाक्यं वा कदाचन । एतेष्वेवं कृते तस्य विग्रहश्चैव वो भवेत् ॥ तस्मात् त्वं पुत्र पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥ यश्च पार्थेन सम्बन्धाद् वर्तते च नरो भुवि । तस्य नास्ति भयं किंचित् त्रिषु लोकेषु भारत ॥ तस्मात् त्वं जिष्णुना वत्स नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥ धृतराष्ट्र बोले—बेटा! अर्जुनके महान् पराक्रमको तो मैं जानता ही हूँ। उनके इस पराक्रमका सामना करना अत्यन्त कठिन है। अतः तुम वीर अर्जुनका कोई अपराध न करो। उनके साथ द्यूतक्रीड़ा, शस्त्रयुद्ध अथवा कटु वचनका प्रयोग कभी न करो; क्योंकि इन्हींके कारण उनका तुमलोगोंके साथ विवाद हो सकता है। अतः बेटा! तुम अर्जुनके साथ सदा