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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

दृष्ट्वा स्वप्नगतं पार्थमुद्भ्रमामि ह्यचेतनः ॥ भारत! मैं एकान्तमें अर्जुनको ही देखता हूँ। स्वप्नमें भी अर्जुनको देखकर मैं अचेत और उद्भ्रान्त हो उठता हूँ।

अकारादीनि नामानि अर्जुनत्रस्तचेतसः । अश्वाश्चार्था ह्यजाश्चैव त्रासं संजनयन्ति मे ॥ मेरा हृदय अर्जुनसे इतना भयभीत हो गया है कि अश्व, अर्थ और अज आदि अकारादि नाम मेरे मनमें त्रास उत्पन्न कर देते हैं।

नास्ति पार्थदृते तात परवीराद् भयं मम । प्रह्लादं वा बलिं वापि हन्याद्धि विजयो रणे ॥ तस्मात् तेन महाराज युद्धमस्मज्जनक्षयम् । अहं तस्य प्रभावज्ञो नित्यं दुःखं वहामि च ॥ तात! अर्जुनके सिवा शत्रुपक्षके दूसरे किसी वीरसे मुझे डर नहीं लगता है। महाराज! मेरा विश्वास है कि अर्जुन युद्धमें प्रह्लाद अथवा बलिको भी मार सकते हैं; अतः उनके साथ किया हुआ युद्ध हमारे सैनिकोंके ही संहारका कारण होगा। मैं अर्जुनके प्रभावको जानता हूँ। इसीलिये सदा दुःखके भारसे दबा रहता हूँ।

पुरा हि दण्डकारण्ये मारीचस्य यथा भयम् । भवेद् रामे महावीर्ये तथा पार्थे भयं मम ॥ जैसे पूर्वकालमें दण्डकारण्यवासी महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीसे मारीचको भय हो गया था, उसी प्रकार अर्जुनसे मुझे भय हो रहा है।

धृतराष्ट्र उवाच

जानाम्येव महद् वीर्यं जिष्णोरेतद् दुरासदम् । तात वीरस्य पार्थस्य मा कार्षीस्त्वं तु विप्रियम् ॥ द्यूतं वा शस्त्रयुद्धं वा दुर्वाक्यं वा कदाचन । एतेष्वेवं कृते तस्य विग्रहश्चैव वो भवेत् ॥ तस्मात् त्वं पुत्र पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥ यश्च पार्थेन सम्बन्धाद् वर्तते च नरो भुवि । तस्य नास्ति भयं किंचित् त्रिषु लोकेषु भारत ॥ तस्मात् त्वं जिष्णुना वत्स नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥ धृतराष्ट्र बोले—बेटा! अर्जुनके महान् पराक्रमको तो मैं जानता ही हूँ। उनके इस पराक्रमका सामना करना अत्यन्त कठिन है। अतः तुम वीर अर्जुनका कोई अपराध न करो। उनके साथ द्यूतक्रीड़ा, शस्त्रयुद्ध अथवा कटु वचनका प्रयोग कभी न करो; क्योंकि इन्हींके कारण उनका तुमलोगोंके साथ विवाद हो सकता है। अतः बेटा! तुम अर्जुनके साथ सदा

स्नेहपूर्ण बर्ताव करो। भारत! जो मनुष्य इस पृथ्वीपर अर्जुनके साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रखते हुए उनसे सद्व्यवहार करता है, उसे तीनों लोकोंमें तनिक भी भय नहीं है; अतः वत्स! तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो।

दुर्योधन उवाच

द्यूते पार्थस्य कौरव्य मायया निकृतिः कृता ।
तस्माद्धि तं जहि सदा त्वन्योपायेन नो भवेत् ॥
दुर्योधन बोला— कुरुश्रेष्ठ! जूएमें हमलोगोंने अर्जुनके प्रति छल-कपटका बर्ताव किया था, अतः आप किसी दूसरे उपायसे उन्हें मार डालें। इसीसे हमलोगोंका सदा भला होगा।

धृतराष्ट्र उवाच

उपायश्च न कर्तव्यः पाण्डवान् प्रति भारत ।
पार्थान् प्रति पुरा वत्स बहूपायाः कृतास्त्वया ॥
तानुपायान् हि कौन्तेया बहुशो व्यतिचक्रमुः ॥
तस्माद्धितं जीविताय नः कुलस्य जनस्य च ।
त्वं चिकीर्षसि चेद् वत्स समित्रः सहबान्धवः ।
सभातृकस्त्वं पार्थेन नित्यं स्नेहेन वर्तय ॥
धृतराष्ट्रने कहा— भारत! पाण्डवोंके प्रति किसी अनुचित उपायका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बेटा! तुमने उन सबको मारनेके लिये पहले बहुत-से उपाय किये हैं। कुन्तीके पुत्र तुम्हारे उन सभी प्रयत्नोंका उल्लंघन करके बहुत बार आगे बढ़ गये हैं; अतः वत्स! यदि तुम अपने कुल और आत्मीयजनोंकी जीवनरक्षाके लिये किसी हितकर उपायका अवलम्बन करना चाहते हो तो मित्र, बन्धु-बान्धव तथा भाइयोंसहित तुम अर्जुनके साथ सदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करो।

वैशम्पायन उवाच

धृतराष्ट्रवचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा ।
चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु विधिना चोदितोऽब्रवीत् ॥)
वैशम्पायनजी कहते हैं— धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधन दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करके विधातासे प्रेरित हो इस प्रकार बोला।

दुर्योधन उवाच

न त्वयेदं श्रुतं राजन् यज्जगाद बृहस्पतिः ।
शक्रस्य नीतिं प्रवदन् विद्वान् देवपुरोहितः ॥ ७ ॥
दुर्योधन बोला— राजन्! देवगुरु विद्वान् बृहस्पतिजीने इन्द्रको नीतिका उपदेश करते हुए जो बात कही है, उसे शायद आपने नहीं सुना है ॥ ७ ॥

सर्वोपायैर्निहन्तव्याः शत्रवः शत्रुसूदन । पुरा युद्धाद् बलाद् वापि प्रकुर्वन्ति तवाहितम् ॥ ८ ॥ शत्रुसूदन! जो आपका अहित करते हैं, उन शत्रुओंको बिना युद्धके अथवा युद्ध करके—सभी उपायोंसे मार डालना चाहिये ॥ ८ ॥

ते वयं पाण्डवधनैः सर्वान् सम्पूज्य पार्थिवान् । यदि तान् योधयिष्यामः किं वै नः परिहास्यति ॥ ९ ॥ महाराज! यदि हम पाण्डवोंके धनसे सब राजाओंका सत्कार करके उन्हें साथ ले पाण्डवोंसे युद्ध करें, तो हमारा क्या बिगड़ जायगा? ॥ ९ ॥

अहीनाशीविषान् क्रुद्धान् नाशाय समुपस्थितान् । कृत्वा कण्ठे च पृष्ठे च कः समुत्स्रष्टुमर्हति ॥ १० ॥ क्रोधमें भरकर काटनेके लिये उद्यत हुए विषधर सर्पोंको अपने गलेमें लटकाकर अथवा पीठपर चढ़ाकर कौन मनुष्य उन्हें उसी अवस्थामें छोड़ सकता है? ॥ १० ॥

आत्तशस्त्रा रथगताः कुपितास्तात पाण्डवाः । निःशेषं वः करिष्यन्ति क्रुद्धा ह्याशीविषा इव ॥ ११ ॥ तात! अस्त्र-शस्त्रोंको लेकर रथमें बैठे हुए पाण्डव कुपित होकर क्रुद्ध विषधर सर्पोंकी भाँति आपके कुलका संहार कर डालेंगे ॥ ११ ॥

संनद्धो ह्यर्जुनो याति विधूत्य परमेषुधी । गाण्डीवं मुहुरदत्ते निःश्वसंश्च निरीक्षते ॥ १२ ॥ गदां गुर्वीं समुद्यम्य त्वरितश्च वृकोदरः । स्वरथं योजयित्वाऽऽशु निर्यात इति नः श्रुतम् ॥ १३ ॥ हमने सुना है, अर्जुन कवच धारण करके दो उत्तम तूणीर पीठपर लटकाये हुए जाते हैं। वे बार-बार गाण्डीव धनुष हाथमें लेते हैं और लम्बी साँसें खींचकर इधर-उधर देखते हैं। इसी प्रकार भीमसेन शीघ्र ही अपना रथ जोतकर भारी गदा उठाये बड़ी उतावलीके साथ यहाँसे निकलकर गये हैं ॥ १२-१३ ॥

नकुलः खड्गमादाय चर्म चाप्यर्धचन्द्रवत् । सहदेवश्च राजा च चक्रुराकारमिङ्गितैः ॥ १४ ॥ नकुल अर्धचन्द्रविभूषित ढाल एवं तलवार लेकर जा रहे हैं। सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरने भी विभिन्न चेष्टाओंद्वारा यह व्यक्त कर दिया है कि वे लोग क्या करना चाहते हैं? ॥ १४ ॥

ते त्वास्थाय रथान् सर्वे बहुशस्त्रपरिच्छदान् । अभिघ्नन्तो रथव्रातान् सेनायोगाय निर्ययुः ॥ १५ ॥ वे सब लोग अनेक शस्त्र आदि सामग्रियोंसे सम्पन्न रथोंपर बैठकर शत्रुपक्षके रथियोंका संहार करनेके उद्देश्यसे सेना एकत्र करनेके लिये गये हैं ॥ १५ ॥

न क्षंस्यन्ते तथास्माभिर्जातु विप्रकृता हि ते । द्रौपद्याश्च परिक्लेशं कस्तेषां क्षन्तुमर्हति ॥ १६ ॥ हमने उनका तिरस्कार किया है, अतः वे इसके लिये हमें कभी क्षमा न करेंगे। द्रौपदीको जो कष्ट दिया गया है, उसे उनमेंसे कौन चुपचाप सह लेगा? ॥ १६ ॥

पुनर्दीव्यं भद्रं ते वनवासाय पाण्डवैः । एवमेतान् वशे कर्तुं शक्ष्यामः पुरुषर्षभ ॥ १७ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! आपका भला हो, हम चाहते हैं कि वनवासकी शर्त रखकर पाण्डवोंके साथ फिर एक बार जूआ खेलें। इस प्रकार इन्हें हम अपने वशमें कर सकेंगे ॥ १७ ॥

ते वा द्वादश वर्षाणि वयं वा द्यूतनिर्जिताः । प्रविशेम महारण्यमजिनैः प्रतिवासिताः ॥ १८ ॥ जूएमें हार जानेपर वे या हम मृगचर्म धारण करके महान् वनमें प्रवेश करें और बारह वर्षतक वनमें ही निवास करें ॥ १८ ॥

त्रयोदशं च सजने अज्ञाताः परिवत्सरम् । ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥ १९ ॥ निवसेम वयं ते वा तथा द्यूतं प्रवर्ताम् । अक्षानुप्त्वा पुनर्धूतमिदं कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥ २० ॥ तेरहवें वर्षमें लोगोंकी जानकारीसे दूर किसी नगरमें रहें। यदि तेरहवें वर्ष किसीकी जानकारीमें आ जायँ तो फिर दुबारा बारह वर्षतक वनवास करें। हम हारें तो हम ऐसा करें और उनकी हार हो तो वे। इसी शर्तपर फिर जूएका खेल आरम्भ हो। पाण्डव पासे फेंककर जूआ खेलें ॥

एतत् कृत्यतमं राजन्नस्माकं भरतर्षभ । अयं हि शकुनिर्वेद सविद्यामक्षसम्पदम् ॥ २१ ॥ भरतकुलभूषण महाराज! यही हमारा सबसे महान् कार्य है। ये शकुनि मामा विद्यासहित पासे फेंकनेकी कलाको अच्छी तरह जानते हैं ॥ २१ ॥

दृढ़मूला वयं राज्ये मित्राणि परिगृह्य च । सारवद् विपुलं सैन्यं सत्कृत्य च दुरासदम् ॥ २२ ॥ (हमारी विजय होनेपर) हमलोग बहुत-से मित्रोंका संग्रह करके बलशाली, दुर्धर्ष एवं विशाल सेनाका पुरस्कार आदिके द्वारा सत्कार करते हुए इस राज्यपर अपनी जड़ जमा लेंगे ॥ २२ ॥

ते च त्रयोदशं वर्षं पारयिष्यन्ति चेद् व्रतम् । जेष्यामस्तान् वयं राजन् रोचतां ते परंतप ॥ २३ ॥ यदि वे तेरहवें वर्षके अज्ञातवासकी प्रतिज्ञा पूर्ण कर लेंगे तो हम उन्हें युद्धमें परास्त कर देंगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! आप हमारे इस प्रस्तावको पसंद करें ॥ २३ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

तूर्णं प्रत्यानयस्वैतान् कामं व्यध्वगतानपि ।
आगच्छन्तु पुनर्द्यूतमिदं कुर्वन्तु पाण्डवाः ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— बेटा! पाण्डवलोग दूर चले गये हों, तो भी तुम्हारी इच्छा हो, तो उन्हें तुरंत बुला लो। समस्त पाण्डव यहाँ आयें और इस नये दाँवपर फिर जूआ खेलें ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो द्रोणः सोमदत्तो बाह्लीकश्चैव गौतमः ।
विदुरो द्रोणपुत्रश्च वैश्यापुत्रश्च वीर्यवान् ॥ २५ ॥
भूरिश्रवाः शान्तनवो विकर्णश्च महारथः ।
मा द्यूतमित्यभाषन्त शमोऽस्त्विति च सर्वशः ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बाह्लीक, कृपाचार्य, विदुर, अश्वत्थामा, पराक्रमी युयुत्सु, भूरिश्रवा, पितामह भीष्म तथा महारथी विकर्ण सबने एक स्वरसे इस निर्णयका विरोध करते हुए कहा—‘अब जूआ नहीं होना चाहिये, तभी सर्वत्र शान्ति बनी रह सकती है’ ॥ २५-२६ ॥

अकामानां च सर्वेषां सुहृदामर्थदर्शिनाम् ।
अकरोत् पाण्डवाह्वानं धृतराष्ट्रः सुतप्रियः ॥ २७ ॥
भावी अर्थको देखने और समझनेवाले सुहृद् अपनी अनिच्छा प्रकट करते ही रह गये; किंतु दुर्योधनादि पुत्रोंके प्रेममें आकर धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको बुलानेका आदेश दे ही दिया ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि युधिष्ठिरप्रत्यानयने
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठिरप्रत्यानयनविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६७ ½ श्लोक मिलाकर कुल ९४ ½ श्लोक हैं।]

अध्याय (पृष्ठ 2204)

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना

वैशम्पायन उवाच

अथाब्रवीन्महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ।
पुत्रहार्दाद् धर्मयुक्ता गान्धारी शोककर्शिता ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय भावी अनिष्टकी आशंकासे धर्मपरायणा गान्धारी पुत्र-स्नेहवश शोकसे कातर हो उठी और राजा धृतराष्ट्रसे इस प्रकार बोली— ॥ १ ॥

जाते दुर्योधने क्षत्ता महामतिरभाषत ।
नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः ॥ २ ॥

‘आर्यपुत्र! दुर्योधनके जन्म लेनेपर परम बुद्धिमान् विदुरजीने कहा था—यह बालक अपने कुलका नाश करनेवाला होगा; अतः इसे त्याग देना चाहिये ॥ २ ॥

व्यनदज्जातमात्रो हि गोमायुरिव भारत ।
अन्तो नूनं कुलस्यास्य कुरवस्तन्निबोधत ॥ ३ ॥

‘भारत! इसने जन्म लेते ही गीदड़की भाँति ‘हुँआ-हुँआ’ का शब्द किया था; अतः यह अवश्य ही इस कुलका अन्त करनेवाला होगा। कौरवो! आपलोग भी इस बातको अच्छी तरह समझ लें ॥ ३ ॥

मा निमज्जीः स्वदोषेण महाप्सु त्वं हि भारत ।
मा बालानामशिष्टनामभिमंस्था मतिं प्रभो ॥ ४ ॥

‘भरतकुलतिलक! आप अपने ही दोषसे इस कुलको विपत्तिके महासागरमें न डुबाइये। प्रभो! इन उद्दण्ड बालकोंकी हाँ-में-हाँ न मिलाइये ॥ ४ ॥

मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि ।
बद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद् धमेच्छान्तं च पावकम् ॥ ५ ॥
शमे स्थितान् को नु पार्थान् कोपयेद् भरतर्षभ ।
स्मरन्तं त्वामाजमीढ स्मारयिष्याम्यहं पुनः ॥ ६ ॥

‘इस कुलके भयंकर विनाशमें स्वयं ही कारण न बनिये। भरतश्रेष्ठ! बँधे हुए पुलको कौन तोड़ेगा? बुझी हुई वैरकी आगको फिर कौन भड़कायेगा? कुन्तीके शान्तिपरायण पुत्रोंको फिर कुपित करनेका साहस कौन करेगा? अजमीढकुलके रत्न! आप सब कुछ जानते और याद रखते हैं, तो भी मैं पुनः आपको स्मरण दिलाती रहूँगी ॥ ५-६ ॥

शास्त्रं न शास्ति दुर्बुद्धिं श्रेयसे चेतराय च । न वै वृद्धो बालमतिर्भवेद् राजन् कथंचन ॥ ७ ॥ ‘राजन्! जिसकी बुद्धि खोटी है, उसे शास्त्र भी भला-बुरा कुछ नहीं सिखा सकता। मन्दबुद्धि बालक वृद्धों-जैसा विवेकशील किसी प्रकार नहीं हो सकता ॥ ७ ॥

त्वन्नेत्राः सन्तु ते पुत्रा मा त्वां दीर्णाः प्रहासिषुः । तस्मादयं मद्वचनात् त्यज्यतां कुलपांसनः ॥ ८ ॥ ‘आपके पुत्र आपके ही नियन्त्रणमें रहें, ऐसी चेष्टा कीजिये। ऐसा न हो कि वे सभी मर्यादाका त्याग करके प्राणोंसे हाथ धो बैठें और आपको इस बुढ़ापेमें छोड़कर चल बसें। इसलिये आप मेरी बात मानकर इस कुलांगार दुर्योधनको त्याग दें ॥ ८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2206)

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गान्धारीका धृतराष्ट्रको समझाना

तथा ते न कृतं राजन् पुत्रस्नेहान्नराधिप ।
तस्य प्राप्तं फलं विद्धि कुलान्तकरणाय यत् ॥ ९ ॥
‘महाराज! आपको जो करना चाहिये था, वह आपने पुत्रस्नेहवश नहीं किया। अतः समझ लीजिये, उसीका यह फल प्राप्त हुआ है, जो समूचे कुलके विनाशका कारण होने जा रहा है ॥ ९ ॥
शमेन धर्मेण नयेन युक्ता
या ते बुद्धिः सास्तु ते मा प्रमादीः ।
प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्री-
र्मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान् ॥ १० ॥
‘शान्ति, धर्म तथा उत्तम नीतिसे युक्त जो आपकी बुद्धि थी, वह बनी रहे। आप प्रमाद मत कीजिये। क्रूरतापूर्ण कर्मोंसे प्राप्त की हुई लक्ष्मी विनाशशील होती है और कोमलतापूर्ण बर्तावसे बढ़ी हुई धन-सम्पत्ति पुत्र-पौत्रोंतक चली जाती है’ ॥ १० ॥
अथाब्रवीन्महाराजो गान्धारीं धर्मदर्शिनीम् ।
अन्तः कामं कुलस्यास्तु न शक्नोमि निवारितुम् ॥ ११ ॥
तब महाराज धृतराष्ट्रने धर्मपर दृष्टि रखनेवाली गान्धारीसे कहा—‘देवि! इस कुलका अन्त भले ही हो जाय, परंतु मैं दुर्योधनको रोक नहीं सकता ॥ ११ ॥
यथेच्छन्ति तथैवास्तु प्रत्यागच्छन्तु पाण्डवाः ।
पुनर्ध्यूतं च कुर्वन्तु मामकाः पाण्डवैः सह ॥ १२ ॥
‘ये सब जैसा चाहते हैं, वैसा ही हो। पाण्डव लौट आयें और मेरे पुत्र उनके साथ फिर जूआ खेलें’ ॥ १२ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि गान्धारीवाक्ये
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक
पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2208)

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः

सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुनः जूआ खेलना और हारना

वैशम्पायन उवाच

ततो व्यध्वगतं पार्थं प्रातिकामी युधिष्ठिरम् ।
उवाच वचनाद् राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थके मार्गमें बहुत दूरतक चले गये थे। उस समय बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे प्रातिकामी उनके पास गया और इस प्रकार बोला— ॥ १ ॥

उपास्तीर्णा सभा राजन्नक्षानुप्त्वा युधिष्ठिर ।
एहि पाण्डव दीव्येति पिता त्वाहेति भारत ॥ २ ॥

‘भरतकुलभूषण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! आपके पिता राजा धृतराष्ट्रने यह आदेश दिया है कि तुम लौट आओ। हमारी सभा फिर सदस्योंसे भर गयी है और तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। तुम पासे फेंककर जूआ खेलो’ ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच

धातुर्नियोगाद् भूतानि प्राप्नुवन्ति शुभाशुभम् ।

न निवृत्तिस्तयोरस्ति देवितव्यं पुनर्यदि ॥ ३ ॥ युधिष्ठिरने कहा— समस्त प्राणी विधाताकी प्रेरणासे शुभ और अशुभ फल प्राप्त करते हैं। उन्हें कोई टाल नहीं सकता। जान पड़ता है, मुझे फिर जूआ खेलना पड़ेगा ॥ ३ ॥

अक्षद्यूते समाह्वानं नियोगात् स्थविरस्य च । जानन्नपि क्षयकरं नातिक्रमितुमुत्सहे ॥ ४ ॥ वृद्ध राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे जूएके लिये यह बुलावा हमारे कुलके विनाशका कारण है, यह जानते हुए भी मैं उनकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

असम्भवे हेममयस्य जन्तो- स्तथापि रामो लुलुभे मृगाय । प्रायः समासन्नपराभवानां धियो विपर्यस्ततरा भवन्ति ॥ ५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! किसी जानवरका शरीर सुवर्णका हो, यह सम्भव नहीं; तथापि श्रीराम स्वर्णमय प्रतीत होनेवाले मृगके लिये लुभा गये। जिनका पतन या पराभव निकट होता है, उनकी बुद्धि प्रायः अत्यन्त विपरीत हो जाती है ॥ ५ ॥

इति ब्रुवन् निववृते भ्रातृभिः सह पाण्डवः । जानंश्च शकुनेर्मायां पार्थो द्यूतमियात् पुनः ॥ ६ ॥ ऐसा कहते हुए पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भाइयोंके साथ पुनः लौट पड़े। वे शकुनिकी मायाको जानते थे, तो भी जूआ खेलनेके लिये चले आये ॥ ६ ॥

विविशुस्ते सभां तां तु पुनरेव महारथाः । व्यथयन्ति स्म चेतांसि सुहृदां भरतर्षभाः ॥ ७ ॥ यथोपजोषमासीनाः पुनर्धूतप्रवृत्तये । सर्वलोकविनाशाय दैवेनोपनिपीडिताः ॥ ८ ॥ महारथी भरतश्रेष्ठ पाण्डव पुनः उस सभामें प्रविष्ट हुए। उन्हें देखकर सुहृदोंके मनमें बड़ी पीड़ा होने लगी। प्रारब्धके वशीभूत हुए कुन्तीकुमार सम्पूर्ण लोकोंके विनाशके लिये पुनः द्यूतक्रीड़ा आरम्भ करनेके उद्देश्यसे चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गये ॥ ७-८ ॥

शकुनिरुवाच

अमुञ्चत् स्थविरो यद् वो धनं पूजितमेव तत् । महाधनं ग्लहं त्वेकं शृणु भो भरतर्षभ ॥ ९ ॥ शकुनिने कहा— राजन्! भरतश्रेष्ठ! हमारे बूढ़े महाराजने आपको जो सारा धन लौटा दिया है, वह बहुत अच्छा किया है। अब जूएके लिये एक ही दाँव रखा जायगा उसे सुनिये

— ॥ ९ ॥
वयं वा द्वादशाब्दानि युष्माभिर्धूतनिर्जिताः ।
प्रविशेम महारण्यं रौरवाजिनवाससः ॥ १० ॥
‘यदि आपने हमलोगोंको जूएमं हरा दिया तो हम मृगचर्म धारण करके महान् वनमें प्रवेश करेंगे ॥ १० ॥
त्रयोदशं च सजने अज्ञाताः परिवत्सरम् ।
ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥ ११ ॥
‘और बारह वर्ष वहाँ रहेंगे एवं तेरहवाँ वर्ष हम जनसमूहमें लोगोंसे अज्ञात रहकर पूरा करेंगे और यदि हम तेरहवें वर्षमें लोगोंकी जानकारीमें आ जायँ तो फिर दुबारा बारह वर्ष वनमें रहेंगे ॥ ११ ॥
अस्माभिर्निर्जिता यूयं वने द्वादश वत्सरान् ।
वसंध्वं कृष्णया सार्धमजिनैः प्रतिवासिताः ॥ १२ ॥
‘यदि हम जीत गये तो आपलोग द्रौपदीके साथ बारह वर्षोंतक मृगचर्म धारण करते हुए वनमें रहें ॥ १२ ॥
त्रयोदशं च सजने अज्ञाताः परिवत्सरम् ।
ज्ञाताश्च पुनरन्यानि वने वर्षाणि द्वादश ॥ १३ ॥
‘आपको भी तेरहवाँ वर्ष जनसमूहमें लोगोंसे अज्ञात रहकर व्यतीत करना पड़ेगा और यदि ज्ञात हो गये तो फिर दुबारा बारह वर्ष वनमें रहना होगा ॥ १३ ॥
त्रयोदशे च निर्वृत्ते पुनरेव यथोचितम् ।
स्वराज्यं प्रतिपत्तव्यमितरैरथवेतरैः ॥ १४ ॥
‘तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर हम या आप फिर वनसे आकर यथोचित रीतिसे अपना-अपना राज्य प्राप्त कर सकते हैं’ ॥ १४ ॥
अनेन व्यवसायेन सहास्माभिर्युधिष्ठिर ।
अक्षानुप्त्वा पुनर्ध्यूतमेहि दीव्यस्व भारत ॥ १५ ॥
भरतवंशी युधिष्ठिर! इसी निश्चयके साथ आप आइये और पुनः पासा फेंककर हमलोगोंके साथ जूआ खेलिये ॥ १५ ॥
अथ सभ्याः सभामध्ये समुच्छ्रितकरास्तदा ।
ऊचुरूद्विग्नमनसः संवेगात् सर्व एव हि ॥ १६ ॥
यह सुनकर सब सभासदोंने सभामें अपने हाथ ऊपर उठाकर अत्यन्त उद्विग्नचित्त हो बड़ी घबराहटके साथ कहा ॥

<p align="center">सभ्या ऊचुः</p>

अहो धिग् बान्धवा नैनं बोधयन्ति महत् भयम् ।

बुद्ध्या बुध्येन्न वा बुध्येदयं वै भरतर्षभः ॥ १७ ॥ **सभासद् बोले—**अहो धिक्कार है! ये भाई-बन्धु भी युधिष्ठिरको उनके ऊपर आनेवाले महान् भयकी बात नहीं समझाते। पता नहीं, ये भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपनी बुद्धिके द्वारा इस भयको समझें या न समझें ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

जनप्रवादान् सुबहूञ्छृण्वन्नपि नराधिपः । ह्रिया च धर्मसंयोगात् पार्थो द्यूतमियात् पुनः ॥ १८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! लोगोंकी तरह-तरहकी बातें सुनते हुए भी राजा युधिष्ठिर लज्जाके कारण तथा धृतराष्ट्रके आज्ञापालनस्वरूप धर्मकी दृष्टिसे पुनः जूआ खेलनेके लिये उद्यत हो गये ॥ १८ ॥

जानन्नपि महाबुद्धिः पुनर्द्यूतमवर्तयत् । अप्यासन्नो विनाशः स्यात् कुरूणामिति चिन्तयन् ॥ १९ ॥ परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर जूएका परिणाम जानते थे, तो भी यह सोचकर कि सम्भवतः कुरुकुलका विनाश बहुत निकट है, वे द्यूतक्रीड़ामें प्रवृत्त हो गये ॥ १९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं वै मद्विधो राजा स्वधर्ममनुपालयन् । आहूतो विनिवर्तेत दीव्यामि शकुने त्वया ॥ २० ॥ **युधिष्ठिर बोले—**शकुने! स्वधर्मपालनमें संलग्न रहनेवाला मेरे-जैसा राजा जूएके लिये बुलाये जानेपर कैसे पीछे हट सकता था, अतः मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ॥ २० ॥

(वैशम्पायन उवाच

एवं दैवबलाविष्टो धर्मराजो युधिष्ठिरः । भीष्मद्रोणैर्वार्यमाणो विदुरेण च धीमता ॥ युयुत्सुना कृपेणाथ सञ्जयेन च भारत । गान्धार्या पृथा चैव भीमार्जुनयमैस्तथा ॥ विकर्णेन च वीरेण द्रौपद्या द्रौणिना तथा । सोमदत्तेन च तथा बाह्लीकेन च धीमता ॥ वार्यमाणोऽपि सततं न च राजा नियच्छति ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय धर्मराज युधिष्ठिर प्रारब्धके वशीभूत हो गये थे। महाराज! उन्हें भीष्म, द्रोण और बुद्धिमान् विदुरजी दुबारा जूआ खेलनेसे रोक रहे थे। युयुत्सु, कृपाचार्य तथा संजय भी मना कर रहे थे। गान्धारी, कुन्ती, भीम, अर्जुन,

नकुल, सहदेव, वीर विकर्ण, द्रौपदी, अश्वत्थामा, सोमदत्त तथा बुद्धिमान् बाह्लीक भी बारंबार रोक रहे थे तो भी राजा युधिष्ठिर भावीके वश होनेके कारण जूएसे नहीं हटे।

शकुनिरुवाच

गवाश्वं बहुधेनूकमपर्यन्तमजाविकम् ।
गजाः कोशो हिरण्यं च दासीदासाश्च सर्वशः ॥ २१ ॥
शकुनिने कहा—राजन्! हमलोगोंके पास बैल, घोड़े और बहुत-सी दुधारू गौएँ हैं। भेड़ और बकरियोंकी तो गिनती ही नहीं है। हाथी, खजाना, दास-दासी तथा सुवर्ण सब कुछ हैं ॥ २१ ॥

एष नो ग्लह एवैको वनवासाय पाण्डवाः ।
यूयं वयं वा विजिता वसेम वनमाश्रिताः ॥ २२ ॥
फिर भी (इन्हें छोड़कर) एकमात्र वनवासका निश्चय ही हमारा दाँव है। पाण्डवो! आपलोग या हम, जो भी हारेंगे, उन्हें वनमें जाकर रहना होगा ॥ २२ ॥

त्रयोदशं च वै वर्षमज्ञाताः सजने तथा ।
अनेन व्यवसायेन दीव्याम पुरुषर्षभाः ॥ २३ ॥
केवल तेरहवें वर्ष हमें किसी जनसमूहमें अज्ञात-भावसे रहना होगा। नरश्रेष्ठगण! हम इसी निश्चयके साथ जूआ खेलें ॥ २३ ॥

समुत्क्षेपेण चैकेन वनवासाय भारत ।
प्रतिजग्राह तं पार्थो ग्लहं जग्राह सौबलः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ २४ ॥
भारत! वनवासकी शर्त रखकर केवल एक ही बार पासा फेंकनेसे जूएका खेल पूरा हो जायगा। युधिष्ठिरने उसकी बात स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् सुबलपुत्र शकुनिने पासा हाथमें उठाया और उसे फेंककर युधिष्ठिरसे कहा—मेरी जीत हो गयी ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि पुनर्युधिष्ठिरपराभवे
षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठिरपराभवविषयक
छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २७ १/३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 2213)

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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

दुःशासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा

वैशम्पायन उवाच

ततः पराजिताः पार्था वनवासाय दीक्षिताः ।
अजिनान्युत्तरीयाणि जगृहुश्च यथाक्रमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर जूएमें हारे हुए कुन्तीके पुत्रोंने वनवासकी दीक्षा ली और क्रमशः सबने मृगचर्मको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण किया ॥ १ ॥

अजिनैः संवृतान् दृष्ट्वा हृतराज्यानरिंदमान् ।
प्रस्थितान् वनवासाय ततो दुःशासनोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
जिनका राज्य छिन गया था, वे शत्रुदमन पाण्डव जब मृगचर्मसे अपने अंगोंको ढँककर वनवासके लिये प्रस्थित हुए, उस समय दुःशासनने सभामें उनको लक्ष्य करके कहा — ॥ २ ॥

प्रवृत्तं धार्तराष्ट्रस्य चक्रं राज्ञो महात्मनः ।
पराजिताः पाण्डवेया विपत्तिं परमां गताः ॥ ३ ॥
‘धृतराष्ट्रपुत्र महामना राजा दुर्योधनका समस्त भूमण्डलपर एकछत्र राज्य हो गया। पाण्डव पराजित होकर बड़ी भारी विपत्तिमें पड़ गये ॥ ३ ॥

अद्यैव ते सम्प्रयाताः समैर्वर्त्मभिरस्थलैः ।
गुणज्येष्ठास्तथा श्रेष्ठाः श्रेयांसो यद् वयं परैः ॥ ४ ॥
‘आज वे पाण्डव समान मार्गोंसे, जिनपर आये हुओंकी भीड़के कारण जगह नहीं रही है, वनको चले जा रहे हैं। हमलोग अपने प्रतिपक्षियोंसे गुण और अवस्था दोनोंमें बड़े हैं। अतः हमारा स्थान उनसे बहुत ऊँचा है ॥ ४ ॥

नरकं पातिताः पार्था दीर्घकालमनन्तकम् ।
सुखाच्च हीना राज्याच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः ॥ ५ ॥
धनेन मत्ता ये ते स्म धार्तराष्ट्रान् प्रहासिषुः ।
ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवा ॥ ६ ॥
‘कुन्तीके पुत्र दीर्घकालतकके लिये अनन्त दुःखरूप नरकमें गिरा दिये गये। ये सदाके लिये सुखसे वंचित तथा राज्यसे हीन हो गये हैं। जो लोग पहले अपने धनसे उन्मत्त हो धृतराष्ट्रपुत्रोंकी हँसी उड़ाया करते थे, वे ही पाण्डव आज पराजित हो अपने धन-वैभवसे हाथ धोकर वनमें जा रहे हैं ॥ ५-६ ॥

चित्रान् सन्नाहानवमुच्य पार्था वासांसि दिव्यानि च भानुमन्ति । विवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे यथा ग्लहं सौबलस्याभ्युपेताः ॥ ७ ॥

‘सभी पाण्डव अपने शरीरपर जो विचित्र कवच और चमकीले दिव्य वस्त्र हैं, उन सबको उतारकर मृगचर्म धारण कर लें; जैसा कि सुबलपुत्र शकुनिके भावको स्वीकार करके ये लोग जूआ खेले हैं ॥ ७ ॥

न सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा इत्येव ये भावितबुद्धयः सदा । ज्ञास्यन्ति तेऽऽत्मानमिमेऽद्य पाण्डवा विपर्यये षण्ढतिला इवाफलाः ॥ ८ ॥

‘जो अपनी बुद्धिमें सदा यही अभिमान लिये बैठे थे कि हमारे-जैसे पुरुष तीनों लोकोंमें नहीं हैं, वे ही पाण्डव आज विपरीत अवस्थामें पहुँचकर थोथे तिलों-की भाँति निःसत्त्व हो गये हैं। अब इन्हें अपनी स्थितिका ज्ञान होगा ॥ ८ ॥

इदं हि वासो यदि वेदृशानां मनस्विनां रौरवमाहवेषु । अदीक्षितानामजिनानि यद्वद् बलीयसां पश्यत पाण्डवानाम् ॥ ९ ॥

‘इन मनस्वी और बलवान् पाण्डवोंका यह मृगचर्ममय वस्त्र तो देखो, जिसे यज्ञमें महात्मालोग धारण करते हैं। मुझे तो इनके शरीरपर ये मृगचर्म यज्ञकी दीक्षाके अधिकारसे रहित जंगली कोलभीलोंके चर्ममय वस्त्रके समान ही प्रतीत होते हैं ॥ ९ ॥

महाप्राज्ञः सौमकिर्यज्ञसेनः कन्यां पाञ्चालीं पाण्डवेभ्यः प्रदाय । अकार्षीद् वै सुकृतं नेह किंचित् क्लीबाः पार्थाः पतयो याज्ञसेन्याः ॥ १० ॥

‘महाबुद्धिमान् सोमकवंशी राजा द्रुपदने अपनी कन्या पांचालीको पाण्डवोंके लिये देकर कोई अच्छा काम नहीं किया। द्रौपदीके पति ये कुन्तीपुत्र निरे नपुंसक ही हैं ॥ १० ॥

सूक्ष्मप्रावारानजिनोत्तरीयान् दृष्ट्वारण्ये निर्धनानप्रतिष्ठान् । कां त्वं प्रीतिं लप्स्यसे याज्ञसेनि पतिं वृणीष्वेह यमन्यमिच्छसि ॥ ११ ॥

‘द्रौपदी! जो सुन्दर महीन कपड़े पहना करते थे, उन्हीं पाण्डवोंको वनमें निर्धन, अप्रतिष्ठित और मृगचर्मकी चादर ओढ़े देख तुम्हें क्या प्रसन्नता होगी? अब तुम किसी अन्य

पुरुषको, जिसे चाहो, अपना पति बना लो ।। ११ ।। एते हि सर्वे कुरवः समेताः क्षान्ता दान्ताः सुद्रविणोपपन्नाः । एषां वृणीष्वैकतमं पतित्वे न त्वां तपेत् कालविपर्ययोऽयम् ।। १२ ।। ‘ये समस्त कौरव क्षमाशील, जितेन्द्रिय तथा उत्तम धन-वैभवसे सम्पन्न हैं। इन्हींमेंसे किसीको अपना पति चुन लो, जिससे यह विपरीत काल (निर्धनावस्था) तुम्हें संतप्त न करे ।। १२ ।।

यथाफलाः षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगाः । तथैव पाण्डवाः सर्वे यथा काकयवा अपि ।। १३ ।। ‘जैसे थोथे तिल बोनेपर फल नहीं देते हैं, जैसे केवल चर्ममय मृग व्यर्थ हैं तथा जैसे काकयव (तंदुलरहित तृणधान्य) निष्प्रयोजन होते हैं, उसी प्रकार समस्त पाण्डवोंका जीवन निरर्थक हो गया है ।। १३ ।।

किं पाण्डवांस्ते पतितानुपास्य मोघः श्रमः षण्ढतिलानुपास्य । एवं नृशंसः परुषाणि पार्था- नश्रावयद् धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ।। १४ ।। ‘थोथे तिलोंकी भाँति इन पतित और नपुंसक पाण्डवोंकी सेवा करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा, व्यर्थका परिश्रम ही तो उठाना पड़ेगा।’ इस प्रकार धृतराष्ट्रके नृशंस पुत्र दुःशासनने पाण्डवोंको बहुत-से कठोर वचन सुनाये ।। १४ ।।

तद् वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी निर्भर्त्स्योच्चैः संनिगृह्यैव रोषात् । उवाच चैनं सहसैवोपगम्य सिंहो यथा हैमवतः शृगालम् ।। १५ ।। यह सब सुनकर भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। जैसे हिमालयकी गुफामें रहनेवाला सिंह गीदड़के पास जाय, उसी प्रकार वे सहसा दुःशासनके पास जा पहुँचे और रोषपूर्वक उसे रोककर जोर-जोरसे फटकारते हुए बोले ।। १५ ।।

भीमसेन उवाच

क्रूर पापजनैर्जुष्टमकृतार्थं प्रभाषसे । गान्धारविद्याया हि त्वं राजमध्ये विकत्थसे ।। १६ ।।

**भीमसेनने कहा—**क्रूर एवं नीच दुःशासन! तू पापी मनुष्योंद्वारा प्रयुक्त होनेवाली ओछी बातें बक रहा है। अरे! तू अपने बाहुबलसे नहीं, शकुनिकी छल-विद्याके प्रभावसे आज राजाओंकी मण्डलीमें अपने मुँहसे अपनी बड़ाई कर रहा है ॥ १६ ॥
यथा तुदसि मर्माणि वाक्शरैरिह नो भृशम् ।
तथा स्मारयिता तेऽहं कृन्तन् मर्माणि संयुगे ॥ १७ ॥
जैसे यहाँ तू अपने वचनरूपी बाणोंसे हमारे मर्मस्थानोंमें अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है, उसी प्रकार जब युद्धमें मैं तेरा हृदय विदीर्ण करने लगूँगा, उस समय तेरी कही हुई इन बातोंकी याद दिलाऊँगा ॥ १७ ॥
ये च त्वामनुवर्तन्ते क्रोधलोभवशानुगाः ।
गोप्तारः सानुबन्धांस्तान् नेतास्मि यमसादनम् ॥ १८ ॥
जो लोग क्रोध और लोभके वशीभूत हो तुम्हारे रक्षक बनकर पीछे-पीछे चलते हैं, उन्हें उनके सम्बन्धियोंसहित यमलोक भेज दूँगा ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणमजिनैर्विवासितं
दुःशासनस्तं परिनृत्यति स्म ।
मध्ये कुरूणां धर्मनिबद्धमार्गं
गौर्गौरिति स्माह्वयन् मुक्तलज्जः ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मृगचर्म धारण किये भीमसेनको ऐसी बातें करते देख निर्लज्ज दुःशासन कौरवोंके बीचमें उनकी हँसी उड़ाते हुए नाचने लगा और 'ओ बैल! ओ बैल' कहकर उन्हें पुकारने लगा। उस समय भीमका मार्ग धर्मराज युधिष्ठिरने रोक रखा था (अन्यथा वे दुःशासनको जीता न छोड़ते) ॥ १९ ॥

भीमसेन उवाच
नृशंस परुषं वक्तुं शक्यं दुःशासन त्वया ।
निकृत्या हि धनं लब्ध्वा को विकत्थितुमर्हति ॥ २० ॥
**भीमसेन बोले—**ओ नृशंस दुःशासन! तेरे ही मुखसे ऐसी कठोर बातें निकल सकती हैं, तेरे सिवा दूसरा कौन है, जो छल-कपटसे धन पाकर इस तरह आप ही अपनी प्रशंसा करेगा ॥ २० ॥
मैव स्म सुकृताँल्लोकान् गच्छेत् पार्थो वृकोदरः ।
यदि वक्षो हि ते भित्त्वा न पिबेच्छोणितं रणे ॥ २१ ॥
मेरी बात सुन ले। यह कुन्तीपुत्र भीमसेन यदि युद्धमें तेरी छाती फाड़कर तेरा रक्त न पीये तो इसे पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो ॥ २१ ॥
धार्तराष्ट्रान् रणे हत्वा मिषतां सर्वधन्विनाम् ।

शमं गन्तास्मि नचिरात् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। २२ ।। मैं तुझसे सच्ची बात कह रहा हूँ, शीघ्र ही वह समय आनेवाला है, जब कि समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मैं युद्धमें धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका वध करके शान्ति प्राप्त करूँगा ।। २२ ।।

वैशम्पायन उवाच

तस्य राजा सिंहगतेः सखेलं
दुर्योधनो भीमसेनस्य हर्षात् ।
गतिं स्वगत्यानुचकार मन्दो
निर्गच्छतां पाण्डवानां सभायाः ।। २३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब पाण्डवलोग सभाभवनसे निकले, उस समय मन्दबुद्धि राजा दुर्योधन हर्षमें भरकर सिंहके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले भीमसेनकी खिल्ली उड़ाते हुए उनकी चालकी नकल करने लगा ।। २३ ।।
नैतावता कृतमित्यब्रवीत् तं
वृकोदरः संनिवृत्तार्धकायः ।
शीघ्रं हि त्वां निहतं सानुबन्धं
संस्मार्याहं प्रतिवक्ष्यामि मूढ ।। २४ ।।
यह देख भीमसेनने अपने आधे शरीरको पीछेकी ओर मोड़कर कहा—'ओ मूढ़! केवल दुःशासनके रक्तपान-द्वारा ही मेरा कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता है। तुझे भी सम्बन्धियोंसहित शीघ्र ही यमलोक भेजकर तेरे इस परिहासकी याद दिलाते हुए इसका समुचित उत्तर दूँगा' ।। २४ ।।
एवं समीक्ष्यात्मनि चावमानं
नियम्य मन्युं बलवान् स मानी ।
राजानुगः संसदि कौरवाणां
विनिष्क्रामन् वाक्यमुवाच भीमः ।। २५ ।।
इस प्रकार अपना अपमान होता देख बलवान् एवं मानी भीमसेन क्रोधको किसी प्रकार रोककर राजा युधिष्ठिरके पीछे कौरवसभासे निकलते हुए इस प्रकार बोले ।। २५ ।।

भीमसेन उवाच

अहं दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनंजयः ।
शकुनिं चाक्षकितवं सहदेवो हनिष्यति ।। २६ ।।
भीमसेनने कहा— मैं दुर्योधनका वध करूँगा, अर्जुन कर्णका संहार करेंगे और इस जुआरी शकुनिको सहदेव मार डालेंगे ।। २६ ।।
इदं च भूयो वक्ष्यामि सभामध्ये बृहद् वचः ।

सत्यं देवाः करिष्यन्ति यन्नो युद्धं भविष्यति ।। २७ ।।
सुयोधनमिमं पापं हन्तास्मि गदया युधि ।
शिरः पादेन चास्याहमधिष्ठास्यामि भूतले ।। २८ ।।
साथ ही इस भरी सभामें मैं पुनः एक बहुत बड़ी बात कह रहा हूँ। मेरा यह विश्वास है कि देवतालोग मेरी यह बात सत्य कर दिखायेंगे। जब हम कौरव और पाण्डवोंमें युद्ध होगा, उस समय इस पापी दुर्योधनको मैं गदासे मार गिराऊँगा तथा रणभूमिमें पड़े हुए इस पापीके मस्तकको पैरसे ठुकराऊँगा ।। २७-२८ ।।
वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मनः ।
दुःशासनस्य रुधिरं पातास्मि मृगराडिव ।। २९ ।।
और यह जो केवल बात बनानेमें बहादुर क्रूर-स्वभाववाला दुरात्मा दुःशासन है, इसकी छातीका खून उसी प्रकार पी लूँगा, जैसे सिंह किसी मृगका रक्त पान करता है ।। २९ ।।

अर्जुन उवाच
नैवं वाचा व्यवसितं भीम विज्ञायते सताम् ।
इतश्चतुर्दशे वर्षे द्रष्टारो यद् भविष्यति ।। ३० ।।
**अर्जुनने कहा—**आर्य भीमसेन! साधु पुरुष जो कुछ करना चाहते हैं, उसे इस प्रकार वाणीद्वारा सूचित नहीं करते। आजसे चौदहवें वर्षमें जो घटना घटित होगी, उसे स्वयं ही लोग देखेंगे ।। ३० ।।

भीमसेन उवाच
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः ।
दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ।। ३१ ।।
**भीमसेन बोले—**यह भूमि दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि तथा चौथे दुःशासनके रक्तका निश्चय ही पान करेगी ।।

अर्जुन उवाच
असूयितारं द्रष्टारं प्रवक्तारं विकत्थनम् ।
भीमसेन नियोगात् ते हन्ताहं कर्णमाहवे ।। ३२ ।।
**अर्जुनने कहा—**भैया भीमसेन! जो हमलोगोंके दोष ही ढूँढ़ा करता है, हमारे दुःख देखकर प्रसन्न होता है, कौरवोंको बुरी सलाहें देता है और व्यर्थ बढ़-बढ़कर बातें बनाता है, उस कर्णको मैं आपकी आज्ञासे अवश्य युद्धमें मार डालूँगा ।। ३२ ।।
अर्जुनः प्रतिजानीते भीमस्य प्रियकाम्यया ।
कर्णं कर्णानुगांश्चैव रणे हन्तास्मि पत्रिभिः ।। ३३ ।।