भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 226

रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः । अद्रीणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते ॥ १५ ॥ वहाँ खूनसे लथपथ अंगवाले मरे हुए महान् असुर, जो समरभूमिमें सो रहे थे, गेरू आदि धातुओंसे रँगे हुए पर्वत-शिखरोंके समान जान पड़ते थे ॥ १५ ॥

हाहाकारः समभवत् तत्र तत्र सहस्रशः । अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति ॥ १६ ॥ संध्याके समय जब सूर्यमण्डल लाल हो रहा था, एक-दूसरेके शस्त्रोंसे कटनेवाले सहस्रों योद्धाओंका हाहाकार इधर-उधर सब ओर गूँज उठा ॥ १६ ॥

परिघैरायसैस्तीक्ष्णैः संनिकर्षे च मुष्टिभिः । निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत् ॥ १७ ॥ उस समरांगणमें दूरवर्ती देवता और दानव लोहेके तीखे परिघोंसे एक-दूसरेपर चोट करते थे और निकट आ जानेपर आपसमें मुक्का-मुक्की करने लगते थे। इस प्रकार उनके पारस्परिक आघात-प्रत्याघातका शब्द मानो सारे आकाशमें गूँज उठा ॥ १७ ॥

छिन्धि भिन्धि प्रधाव त्वं पातयाभिसरेति च । व्यश्रूयन्त महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः ॥ १८ ॥ उस रणभूमिमें चारों ओर ये ही अत्यन्त भयंकर शब्द सुनायी पड़ते थे कि 'टुकड़े-टुकड़े कर दो, चीर डालो, दौड़ो, गिरा दो और पीछा करो' ॥ १८ ॥

एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये । नरनारायणौ देवौ समाजग्मतुराहवम् ॥ १९ ॥ इस प्रकार अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध हो ही रहा था कि भगवान् विष्णुके दो रूप नर और नारायणदेव भी युद्धभूमिमें आ गये ॥ १९ ॥

तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि । चिन्तयामास तच्चक्रं विष्णुर्दानवसूदनम् ॥ २० ॥ भगवान् नारायणने वहाँ नरके हाथमें दिव्य धनुष देखकर स्वयं भी दानवसंहारक दिव्य चक्रका चिन्तन किया ॥ २० ॥

ततोऽम्बराच्चिन्तितमात्रमागतं महाप्रभं चक्रममित्रतापनम् । विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं सुदर्शनं संयति भीमदर्शनम् ॥ २१ ॥ चिन्तन करते ही शत्रुओंको संताप देनेवाला अत्यन्त तेजस्वी चक्र आकाशमार्गसे उनके हाथमें आ गया। वह सूर्य एवं अग्निके समान जाज्वल्यमान हो रहा था। उस मण्डलाकार चक्रकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती थी। उसका नाम तो सुदर्शन था, किंतु वह युद्धमें शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था ॥ २१ ॥