महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदागतं ज्वलितहुताशनप्रभं भयंकरं करिकरबाहुरच्युतः । मुमोच वै प्रबलवदुग्रवेगवान् महाप्रभं परनगरावदारणम् ॥ २२ ॥
वहाँ आया हुआ वह भयंकर चक्र प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। उसमें शत्रुओंके बड़े-बड़े नगरोंको विध्वंस कर डालनेकी शक्ति थी। हाथीकी सूँड़के समान विशाल भुजदण्डवाले उग्रवेगशाली भगवान् नारायणने उस महातेजस्वी एवं महाबलशाली चक्रको दानवोंके दलपर चलाया ॥ २२ ॥
तदन्तकज्वलनसमानवर्चसं पुनः पुनर्न्यपतत वेगवत्तदा । विदारयद् दितिदनुजान् सहस्रशः करेरितं पुरुषवरेण संयुगे ॥ २३ ॥
उस महासमरमें पुरुषोत्तम श्रीहरिके हाथोंसे संचालित हो वह चक्र प्रलयकालीन अग्निके समान जाज्वल्यमान हो उठा और सहस्रों दैत्यों तथा दानवोंको विदीर्ण करता हुआ बड़े वेगसे बारम्बार उनकी सेनापर पड़ने लगा ॥ २३ ॥
दहत् क्वचिज्ज्वलन इवावलेलिहत् प्रसह्य तानसुरगणान् न्यकृन्तत । प्रवेरितं वियति मुहुः क्षितौ तथा पपौ रणे रुधिरमथो पिशाचवत् ॥ २४ ॥
श्रीहरिके हाथोंसे चलाया हुआ सुदर्शन चक्र कभी प्रज्वलित अग्निकी भाँति अपनी लपलपाती लपटोंसे असुरोंको चाटता हुआ भस्म कर देता और कभी हठपूर्वक उनके टुकड़े-टुकड़े कर डालता था। इस प्रकार रणभूमिके भीतर पृथ्वी और आकाशमें घूम-घूमकर वह पिशाचकी भाँति बार-बार रक्त पीने लगा ॥ २४ ॥
तथासुरा गिरिभिरदीनचेतसो मुहुर्मुहुः सुरगणमर्दयंस्तदा । महाबला विगलितमेघवर्चसः सहस्रशो गगनमभिप्रपद्य ह ॥ २५ ॥
इसी प्रकार उदार एवं उत्साहभरे हृदयवाले महाबली असुर भी, जो जलरहित बादलोंके समान श्वेत रंगके दिखायी देते थे, उस समय सहस्रोंकी संख्यामें आकाशमें उड़-उड़कर शिलाखण्डोंकी वर्षासे बार-बार देवताओंको पीड़ित करने लगे ॥ २५ ॥
अथाम्बराद् भयजननाः प्रपेदिरे सपादपा बहुविधमेघरूपिणः । महाद्रयः परिगलिताग्रसानवः