महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुनकर जलके भीतर शयन करनेवाला विशालकाय कछुआ भी पानीसे ऊपर उठता है। उस समय वह सारे सरोवरको मथ डालता है ॥ २५—२७ ॥ यं दृष्ट्वा वेष्टितकरः पतत्येष गजो जलम् । दन्तहस्ताग्रलाङ्गूलपादवेगेन वीर्यवान् ॥ २८ ॥ विक्षोभयंस्ततो नागः सरो बहुझषाकुलम् । कूर्मोऽप्यभ्युद्यतशिरा युद्धायाभ्येति वीर्यवान् ॥ २९ ॥ उसे देखते ही यह पराक्रमी हाथी अपनी सूँड़ लपेटे हुए जलमें टूट पड़ता है तथा दाँत, सूँड़, पूँछ और पैरोंके वेगसे असंख्य मछलियोंसे भरे हुए समूचे सरोवरमें हलचल मचा देता है। उस समय पराक्रमी कच्छप भी सिर उठाकर युद्धके लिये निकट आ जाता है ॥ २८-२९ ॥ षडुच्छ्रितो योजनानि गजस्तद्द्विगुणायतः । कूर्मस्त्रियोजनोत्सेधो दशयोजनमण्डलः ॥ ३० ॥ हाथीका शरीर छः योजन ऊँचा और बारह योजन लंबा है। कछुआ तीन योजन ऊँचा और दस योजन गोल है ॥ ३० ॥ तावुभौ युद्धसम्मत्तौ परस्परवधैषिणौ । उपयुज्याशु कर्मेदं साधयेप्सितमात्मनः ॥ ३१ ॥ वे दोनों एक-दूसरेको मारनेकी इच्छासे युद्धके लिये मतवाले बने रहते हैं। तुम शीघ्र जाकर उन्हीं दोनोंको भोजनके उपयोगमें लाओ और अपने इस अभीष्ट कार्यका साधन करो ॥ ३१ ॥ महाभ्रघनसंकाशं तं भुक्त्वामृतमानय । महागिरिसमप्रख्यं घोररूपं च हस्तिनम् ॥ ३२ ॥ कछुआ महान् मेघ-खण्डके समान है और हाथी भी महान् पर्वतके समान भयंकर है। उन्हीं दोनोंको खाकर अमृत ले आओ ॥ ३२ ॥
सौतिरुवाच
इत्युक्त्वा गरुडं सोऽथ माङ्गल्यमकरोत् तदा । युध्यतः सह देवैस्ते युद्धे भवतु मङ्गलम् ॥ ३३ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी! कश्यपजी गरुडसे ऐसा कहकर उस समय उनके लिये मंगल मनाते हुए बोले—'गरुड! युद्धमें देवताओंके साथ लड़ते हुए तुम्हारा मंगल हो ॥ ३३ ॥ पूर्णकुम्भो द्विजा गावो यच्चान्यत् किंचिदुत्तमम् । शुभं स्वस्त्ययनं चापि भविष्यति तवाण्डज ॥ ३४ ॥