महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'पक्षिप्रवर! भरा हुआ कलश, ब्राह्मण, गौएँ तथा और जो कुछ भी मांगलिक वस्तुएँ हैं, वे तुम्हारे लिये कल्याणकारी होंगी ।। ३४ ।। युध्यमानस्य संग्रामे देवैः सार्धं महाबल । ऋचो यजूंषि सामानि पवित्राणि हवींषि च ।। ३५ ।। रहस्यानि च सर्वाणि सर्वे वेदाश्च ते बलम् । इत्युक्तो गरुडः पित्रा गतस्तं हृदमन्तिकात् ।। ३६ ।। 'महाबली पक्षिराज! संग्राममें देवताओंके साथ युद्ध करते समय ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, पवित्र हविष्य, सम्पूर्ण रहस्य तथा सभी वेद तुम्हें बल प्रदान करें।' पिताके ऐसा कहनेपर गरुड उस सरोवरके निकट गये ।। ३५-३६ ।। अपश्यन्निर्मलजलं नानापक्षिसमाकुलम् । स तत् स्मृत्वा पितुर्वाक्यं भीमवेगोऽन्तरिक्षगः ।। ३७ ।। नखेन गजमेकेन कूर्ममेकेन चाक्षिपत् । समुत्पपात चाकाशं तत उच्चैर्विहंगमः ।। ३८ ।। उन्होंने देखा, सरोवरका जल अत्यन्त निर्मल है और नाना प्रकारके पक्षी इसमें सब ओर चहचहा रहे हैं। तदनन्तर भयंकर वेगशाली अन्तरिक्षगामी गरुडने पिताके वचनका स्मरण करके एक पंजेसे हाथीको और दूसरेसे कछुएको पकड़ लिया। फिर वे पक्षिराज आकाशमें ऊँचे उड़ गये ।। ३७-३८ ।। सोऽलम्बं तीर्थमासाद्य देववृक्षानुपागमत् । ते भीताः समकम्पन्त तस्य पक्षानिलाहताः ।। ३९ ।। न नो भञ्ज्यादिति तदा दिव्याः कनकशाखिनः । प्रचलाङ्गान् स तान् दृष्ट्वा मनोरथफलद्रुमान् ।। ४० ।। अन्यानतुलरूपाङ्गानुपचक्राम खेचरः । काञ्चनै राजतैश्चैव फलैर्वैदूर्यशाखिनः । सागराम्बुपरिक्षिप्तान् भ्राजमानान् महाद्रुमान् ।। ४१ ।। उड़कर वे फिर अलम्बतीर्थमें जा पहुँचे। वहाँ (मेरुगिरिपर) बहुत-से दिव्य वृक्ष अपनी सुवर्णमय शाखा-प्रशाखाओंके साथ लहलहा रहे थे। जब गरुड उनके पास गये, तब उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर वे सभी दिव्य वृक्ष इस भयसे कम्पित हो उठे कि कहीं ये हमें तोड़ न डालें। गरुड रुचिके अनुसार फल देनेवाले उन कल्पवृक्षोंको काँपते देख अनुपम रूप-रंग तथा अंगोंवाले दूसरे-दूसरे महावृक्षोंकी ओर चल दिये। उनकी शाखाएँ वैदूर्य मणिकी थीं और वे सुवर्ण तथा रजतमय फलोंसे सुशोभित हो रहे थे। वे सभी महावृक्ष समुद्रके जलसे अभिषिक्त होते रहते थे ।। ३९—४१ ।। तमुवाच खगश्रेष्ठं तत्र रौहिणपादपः । अतिप्रवृद्धः सुमहानापतन्तं मनोजवम् ।। ४२ ।।