भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

नेत्रोंमें ही विष भरा था। वे बड़े भयंकर, नित्य क्रोधी और अत्यन्त वेगशाली थे। गरुडने उन दोनोंको देखा ॥ ५-६ ॥ सदा संरब्धनयनौ सदा चानिमिषेक्षणौ । तयोरेकोऽपि यं पश्येत् स तूर्णं भस्मसाद् भवेत् ॥ ७ ॥ उनके नेत्रोंमें सदा क्रोध भरा रहता था। वे निरन्तर एकटक दृष्टिसे देखा करते थे (उनकी आँखें कभी बंद नहीं होती थीं)। उनमेंसे एक भी जिसे देख ले, वह तत्काल भस्म हो सकता था ॥ ७ ॥ तयोश्चक्षूंषि रजसा सुपर्णः सहसावृणोत् । ताभ्यामदृष्टरूपोऽसौ सर्वतः समताडयत् ॥ ८ ॥ सुंदर पंखोंवाले गरुडजीने सहसा धूल झोंककर उनकी आँखें बंद कर दीं और उनसे अदृश्य रहकर ही वे सब ओरसे उन्हें मारने और कुचलने लगे ॥ ८ ॥ तयोरङ्गे समाक्रम्य वैनतेयोऽन्तरिक्षगः । आच्छिनत् तरसा मध्ये सोममभ्यद्रवत् ततः ॥ ९ ॥ समुत्पाट्यामृतं तत्र वैनतेयस्ततो बली । उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान् ॥ १० ॥ आकाशमें विचरनेवाले महापराक्रमी विनता-कुमारने वेगपूर्वक आक्रमण करके उन दोनों सर्पोंके शरीरको बीचसे काट डाला; फिर वे अमृतकी ओर झपटे और चक्रको तोड़-फोड़कर अमृतके पात्रको उठाकर बड़ी तेजीके साथ वहाँसे उड़ चले ॥ ९-१० ॥ अपीत्वैवामृतं पक्षी परिगृह्याशु निःसृतः । आगच्छदपरिश्रान्त आवार्यार्कप्रभां ततः ॥ ११ ॥ उन्होंने स्वयं अमृतको नहीं पीया, केवल उसे लेकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे निकल गये और सूर्यकी प्रभाका तिरस्कार करते हुए बिना थकावटके चले आये ॥ ११ ॥ विष्णुना च तदाकाशे वैनतेयः समेयिवान् । तस्य नारायणस्तुष्टस्तेनालौल्येन कर्मणा ॥ १२ ॥ उस समय आकाशमें विनतानन्दन गरुड़की भगवान् विष्णुसे भेंट हो गयी। भगवान् नारायण गरुडके लोलुपतारहित पराक्रमसे बहुत संतुष्ट हुए थे ॥ १२ ॥ तमुवाचाव्ययो देवो वरदोऽस्मीति खेचरम् । स वव्रे तव तिष्ठेयमुपरीत्यन्तरिक्षगः ॥ १३ ॥ अतः उन अविनाशी भगवान् विष्णुने आकाशचारी गरुडसे कहा—'मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ।' अन्तरिक्षमें विचरनेवाले गरुडने यह वर माँगा—'प्रभो! मैं आपके ऊपर (ध्वजमें) स्थित होऊँ' ॥ १३ ॥ उवाच चैनं भूयोऽपि नारायणमिदं वचः । अजरश्चामरश्च स्याममृतेन विनाप्यहम् ॥ १४ ॥