भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

इतना कहकर वे भगवान् नारायणसे फिर यों बोले—'भगवन्! मैं अमृत पीये बिना ही अजर-अमर हो जाऊँ' ।। १४ ।। एवमस्त्विति तं विष्णुरुवाच विनतासुतम् । प्रतिगृह्य वरौ तौ च गरुडो विष्णुमब्रवीत् ।। १५ ।। तब भगवान् विष्णुने विनतानन्दन गरुडसे कहा—'एवमस्तु'—ऐसा ही हो। वे दोनों वर ग्रहण करके गरुडने भगवान् विष्णुसे कहा— ।। १५ ।। भवतेऽपि वरं दद्यां वृणोतु भगवानपि । तं वव्रे वाहनं विष्णुर्गरुत्मन्तं महाबलम् ।। १६ ।। 'देव! मैं भी आपको वर देना चाहता हूँ। भगवान् भी कोई वर माँगें।' तब श्रीहरिने महाबली गरुत्मान्‌से अपना वाहन होनेका वर माँगा ।। १६ ।। ध्वजं च चक्रे भगवानुपरि स्थास्यसीति तम् । एवमस्त्विति तं देवमुक्त्वा नारायणं खगः ।। १७ ।। वव्राज तरसा वेगाद् वायुं स्पर्धन् महाजवः । तं व्रजन्तं खगश्रेष्ठं वज्रेणेन्द्रोऽभ्यताडयत् ।। १८ ।। हरन्तममृतं रोषाद् गरुडं पक्षिणां वरम् । भगवान् विष्णुने गरुडको अपना ध्वज बना लिया—उन्हें ध्वजके ऊपर स्थान दिया और कहा—'इस प्रकार तुम मेरे ऊपर रहोगे।' तदनन्तर उन भगवान् नारायणसे 'एवमस्तु' कहकर पक्षी गरुड वहाँसे वेग-पूर्वक चले गये। महान् वेगशाली गरुड उस समय वायुसे होड़ लगाते चल रहे थे। पक्षियोंके सरदार उन खगश्रेष्ठ गरुडको अमृतका अपहरण करके लिये जाते देख इन्द्रने रोषमें भरकर उनके ऊपर वज्रसे आघात किया ।। १७-१८ १/२ ।। तमुवाचेन्द्रमाक्रन्दे गरुडः पततां वरः ।। १९ ।। प्रहसञ्श्लक्ष्णया वाचा तथा वज्रसमाहतः । ऋषेर्मानं करिष्यामि वज्रं यस्यास्थिसम्भवम् ।। २० ।। वज्रस्य च करिष्यामि तवैव च शतक्रतो । एतत् पत्रं त्यजाम्येकं यस्यान्तं नोपलप्स्यसे ।। २१ ।। विहंगप्रवर गरुडने उस युद्धमें वज्राहत होकर भी हँसते हुए मधुर वाणीमें इन्द्रसे कहा—'देवराज! जिनकी हड्डीसे यह वज्र बना है, उन महर्षिका सम्मान मैं अवश्य करूँगा। शतक्रतो! ऋषिके साथ-साथ तुम्हारा और तुम्हारे वज्रका भी आदर करूँगा; इसीलिये मैं अपनी एक पाँख, जिसका तुम कहीं अन्त नहीं पा सकोगे, त्याग देता हूँ ।। १९—२१ ।। न च वज्रनिपातेन रुजा मेऽस्तीह काचन । एवमुक्त्वा ततः पत्रमुत्ससर्ज स पक्षिराट् ।। २२ ।। 'तुम्हारे वज्रके प्रहारसे मेरे शरीरमें कुछ भी पीड़ा नहीं हुई है।' ऐसा कहकर पक्षिराजने अपना एक पंख गिरा दिया ।। २२ ।।