भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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कथनानुसार यह वर भी माँगता हूँ कि महाबली सर्प मेरे भोजनकी सामग्री हो जायँ'॥ १२-१३॥ तथेत्युक्त्वान्वगच्छत् तं ततो दानवसूदनः। देवदेवं महात्मानं योगिनामीश्वरं हरिम्॥ १४॥ तब दानवशत्रु इन्द्र 'तथास्तु' कहकर योगीश्वर देवाधिदेव परमात्मा श्रीहरिके पास गये॥ १४॥ स चान्वमोदत् तं चार्थं यथोक्तं गरुडेन वै। इदं भूयो वचः प्राह भगवांस्त्रिदशेश्वरः॥ १५॥ हरिष्यामि विनिक्षिप्तं सोममित्यनुभाष्य तम्। आजगाम ततस्तूर्णं सुपर्णो मातुरन्तिकम्॥ १६॥ श्रीहरिने भी गरुडकी कही हुई बातका अनुमोदन किया। तदनन्तर स्वर्गलोकके स्वामी भगवान् इन्द्र पुनः गरुडको सम्बोधित करके इस प्रकार बोले—'तुम जिस समय इस अमृतको कहीं रख दोगे उसी समय मैं इसे हर ले आऊँगा' (ऐसा कहकर इन्द्र चले गये)। फिर सुन्दर पंखवाले गरुड तुरंत ही अपनी माताके समीप आ पहुँचे॥ १५-१६॥ अथ सर्पानुवाचेदं सर्वान् परमहृष्टवत्। इदमानीतममृतं निक्षेप्स्यामि कुशेषु वः॥ १७॥ स्नाता मंगलसंयुक्तास्ततः प्राश्नीत पन्नगाः। भवद्भिरिदमासीनैर्यदुक्तं तद्वचस्तदा॥ १८॥ अदासी चैव मातेयमद्यप्रभृति चास्तु मे। यथोक्तं भवतामेतद् वचो मे प्रतिपादितम्॥ १९॥ तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न-से होकर वे समस्त सर्पोंसे इस प्रकार बोले—'पन्नगो! मैंने तुम्हारे लिये यह अमृत ला दिया है। इसे कुशोंपर रख देता हूँ। तुम सब लोग स्नान और मंगल-कर्म (स्वस्ति-वाचन आदि) करके इस अमृतका पान करो। अमृतके लिये भेजते समय तुमने यहाँ बैठकर मुझसे जो बातें कही थीं, उनके अनुसार आजसे मेरी ये माता दासीपनसे मुक्त हो जायँ; क्योंकि तुमने मेरे लिये जो काम बताया था, उसे मैंने पूर्ण कर दिया है'॥ १७—१९॥ ततः स्नातुं गताः सर्पाः प्रत्युक्त्वा तं तथेत्युत। शक्रोऽप्यमृतमाक्षिप्य जगाम त्रिदिवं पुनः॥ २०॥ तब सर्पगण 'तथास्तु' कहकर स्नानके लिये गये। इसी बीचमें इन्द्र वह अमृत लेकर पुनः स्वर्गलोकको चले गये॥ २०॥ अथागतास्तमुद्देशं सर्पाः सोमार्थिनस्तदा। स्नाताश्च कृतजप्याश्च प्रहृष्टाः कृतमंगलाः॥ २१॥ यत्रैतदमृतं चापि स्थापितं कुशसंस्तरे।