महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतद् विज्ञाय हृतं सर्पाः प्रतिमायाकृतं च तत् ॥ २२ ॥ इसके अनन्तर अमृत पीनेकी इच्छावाले सर्प स्नान, जप और मंगल-कार्य करके प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर आये, जहाँ कुशके आसनपर अमृत रखा गया था। आनेपर उन्हें मालूम हुआ कि कोई उसे हर ले गया। तब सर्पोंने यह सोचकर संतोष किया कि यह हमारे कपटपूर्ण बर्तावका बदला है ।। २१-२२ ।।
सोमस्थानमिदं चेति दर्भांस्ते लिलिहुस्तदा । ततो द्विधाकृता जिह्वाः सर्पाणां तेन कर्मणा ॥ २३ ॥ फिर यह समझकर कि यहाँ अमृत रखा गया था, इसलिये सम्भव है इसमें उसका कुछ अंश लगा हो, सर्पोंने उस समय कुशोंको चाटना शुरू किया। ऐसा करनेसे सर्पोंकी जीभके दो भाग हो गये ।। २३ ।।
अभवंश्चामृतस्पर्शाद् दर्भास्तेऽथ पवित्रिणः । एवं तदमृतं तेन हृतमाहृतमेव च । द्विजिह्वाश्च कृताः सर्पा गरुडेन महात्मना ॥ २४ ॥ तभीसे पवित्र अमृतका स्पर्श होनेके कारण कुशोंकी 'पवित्री' संज्ञा हो गयी। इस प्रकार महात्मा गरुडने देवलोकसे अमृतका अपहरण किया और सर्पोंके समीपतक उसे पहुँचाया; साथ ही सर्पोंको द्विजिह्व (दो जिह्वाओंसे युक्त) बना दिया ।। २४ ।।
ततः सुपर्णः परमप्रहर्षवान् विहृत्य मात्रा सह तत्र कानने । भुजङ्गभक्षः परमार्चितः खगै- रहीनकीर्तिर्विनतामनन्दयत् ॥ २५ ॥ उस दिनसे सुन्दर पंखवाले गरुड अत्यन्त प्रसन्न हो अपनी माताके साथ रहकर वहाँ वनमें इच्छानुसार घूमने-फिरने लगे। वे सर्पोंको खाते और पक्षियोंसे सादर सम्मानित होकर अपनी उज्ज्वल कीर्ति चारों ओर फैलाते हुए माता विनताको आनन्द देने लगे ।। २५ ।।
इमां कथां यः शृणुयान्नरः सदा पठेत वा द्विजगणमुख्यसंसदि । असंशयं त्रिदिवमियात् स पुण्यभाक् महात्मनः पतगपतेः प्रकीर्तनात् ॥ २६ ॥ जो मनुष्य इस कथाको श्रेष्ठ द्विजोंकी उत्तम गोष्ठीमें सदा पढ़ता अथवा सुनता है, वह पक्षिराज महात्मा गरुडके गुणोंका गान करनेसे पुण्यका भागी होकर निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥