भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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सौतिरुवाच

जनमेजयस्य राजर्षेः सर्पसत्रे महात्मनः ॥ ९ ॥ समीपे पार्थिवेन्द्रस्य सम्यक् पारिक्षितस्य च । कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः ॥ १० ॥ कथिताश्चापि विधिवद् या वैशम्पायनेन वै । श्रुत्वाहं ता विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ॥ ११ ॥ **उग्रश्रवाजीने कहा—**महर्षियो! चक्रवर्ती सम्राट् महात्मा राजर्षि परीक्षित्-नन्दन जनमेजयके सर्पयज्ञमें उन्हींके पास वैशम्पायनने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा निर्मित परम पुण्यमयी चित्र-विचित्र अर्थसे युक्त महाभारतकी जो विविध कथाएँ विधिपूर्वक कही हैं, उन्हें सुनकर मैं आ रहा हूँ ॥ ९—११ ॥

बहूनि सम्परिक्रम्य तीर्थान्यायतनानि च । समन्तपञ्चकं नाम पुण्यं द्विजनिषेवितम् ॥ १२ ॥ गतवानस्मि तं देशं युद्धं यत्राभवत् पुरा । कुरूणां पाण्डवानां च सर्वेषां च महीक्षिताम् ॥ १३ ॥ मैं बहुत-से तीर्थों एवं धामोंकी यात्रा करता हुआ ब्राह्मणोंके द्वारा सेवित उस परम पुण्यमय समन्तपंचक क्षेत्र कुरुक्षेत्र देशमें गया, जहाँ पहले कौरव-पाण्डव एवं अन्य सब राजाओंका युद्ध हुआ था ॥ १२-१३ ॥

दिदृक्षुरागतस्तस्मात् समीपं भवतामिह । आयुष्मन्तः सर्व एव ब्रह्मभूता हि मे मताः । अस्मिन् यज्ञे महाभागाः सूर्यपावकवर्चसः ॥ १४ ॥ वहींसे आपलोगोंके दर्शनकी इच्छा लेकर मैं यहाँ आपके पास आया हूँ। मेरी यह मान्यता है कि आप सभी दीर्घायु एवं ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्राह्मणो! इस यज्ञमें सम्मिलित आप सभी महात्मा बड़े भाग्यशाली तथा सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी हैं ॥ १४ ॥

कृताभिषेकाः शुचयः कृतजप्याहुताग्नयः । भवन्त आसने स्वस्था ब्रवीमि किमहं द्विजाः ॥ १५ ॥ पुराणसंहिताः पुण्याः कथा धर्मार्थसंश्रिताः । इति वृत्तं नरेन्द्राणामृषीणां च महात्मनाम् ॥ १६ ॥ इस समय आप सभी स्नान, संध्या-वन्दन, जप और अग्निहोत्र आदि करके शुद्ध हो अपने-अपने आसनपर स्वस्थचित्तसे विराजमान हैं। आज्ञा कीजिये, मैं आपलोगोंको क्या सुनाऊँ? क्या मैं आपलोगोंको धर्म और अर्थके गूढ़ रहस्यसे युक्त, अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाली भिन्न-भिन्न पुराणोंकी कथा सुनाऊँ अथवा उदारचरित महानुभाव ऋषियों एवं सम्राटोंके पवित्र इतिहास? ॥ १५-१६ ॥